# स्वतंत्रता से 9 दिन पूर्व 6 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन जब राष्ट्रध्वज पर नाराज हुए महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने खारिज किया ब्रिटिश प्रस्ताव

> देश की आजादी से ठीक नौ दिन पहले 6 अगस्त 1947 को लाहौर में दंगों का जायजा लेने पहुंचे महात्मा गांधी नए तिरंगे से चरखा हटाए जाने पर असंतुष्ट दिखे, वहीं दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू ने सरकारी इमारतों पर यूनियन जैक फहराने के ब्रिटिश सुझाव को अस्वीकार कर दिया।

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-08-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/svatntrata-se-9-dina-purva-6-agasta-1947-ka-vaha-aitihasika-dina-jaba-rashtradhvaja-para-naraja-hue-mahatma-gandhi-aura-jawaharlal-14458 · **Language:** Hindi
**Tags:** 6 अगस्त 1947, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रीय ध्वज, अशोक चक्र, लॉर्ड माउंटबेटन, यूनियन जैक, भारत का विभाजन

15 अगस्त 1947 को मिलने वाली आजादी में अब केवल नौ दिनों का समय शेष बचा था। एक तरफ पूरा देश औपनिवेशिक शासन के अंत और स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा होकर खुशियां मनाने की तैयारी कर रहा था, तो दूसरी ओर देश के विभाजन की घोषणा के साथ उपजी सांप्रदायिक हिंसा तेजी से फैल रही थी। पंजाब, बंगाल तथा सीमावर्ती इलाकों में बिगड़ते हालातों के बीच लाखों निर्दोष नागरिक अपनी सदियों पुरानी जड़ों को छोड़कर विस्थापन का दंश झेलने को विवश थे। इसी अशांत एवं चुनौतीपूर्ण माहौल में 6 अगस्त 1947 का दिन देश के तीन प्रमुख निर्माताओं महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. भीमराव आंबेडकर के अलग-अलग ऐतिहासिक कदमों तथा चिंताओं का साक्षी बना। जहां लाहौर में जलते बस्तियों के बीच पहुंचे महात्मा गांधी नए राष्ट्रीय ध्वज के प्रारूप की जानकारी पाकर व्यथित हो उठे, वहीं देश की राजधानी दिल्ली में पंडित जवाहरलाल नेहरू लॉर्ड माउंटबेटन के एक विवादित प्रस्ताव का कड़ा उत्तर तैयार कर रहे थे। उसी दौरान मुंबई में डॉ. भीमराव आंबेडकर देश भर से आ रही हिंसा की खबरों से भावी भारत की स्थिरता को लेकर गहरे चिंतन में डूबे हुए थे।

## लाहौर में हिंसा का तांडव और महात्मा गांधी का शांति दौरा
विभाजन की लकीर खिंचते ही पंजाब क्षेत्र भीषण सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया था। लाहौर, जो ऐतिहासिक रूप से हिंदू, सिख और मुस्लिम संस्कृतियों के सद्भाव एवं साझा विरासत का एक प्रमुख केंद्र माना जाता था, उस दौरान हिंसा की भीषण आग में झुलस रहा था। उस दौर के आंकड़ों के अनुसार लाहौर शहर में करीब 40 प्रतिशत आबादी हिंदू और सिख समुदायों की थी। हालांकि, लगातार भड़कती हिंसा, आगजनी और असुरक्षा के माहौल के कारण वहां से लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो चुका था। ऐसे विकट समय में 6 अगस्त 1947 की सुबह महात्मा गांधी रावलपिंडी के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के उपरांत वाघा छावनी होते हुए लाहौर के लिए रवाना हुए। दोपहर लगभग डेढ़ बजे उनका काफिला लाहौर पहुंचा, जहां स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उनके ठहराव का प्रबंध एक हिंदू बहुल मोहल्ले के मकान में किया था।

यात्रा के दौरान सड़कों और बस्तियों का दृश्य देखकर बापू का हृदय द्रवित हो उठा। शहर की गलियों में जगह-जगह जले हुए मकान, राख का ढेर बन चुकी दुकानें और पूरी तरह उजड़े हुए बाजार नजर आ रहे थे। उपद्रवियों ने कई धार्मिक स्थलों को भी भारी नुकसान पहुंचाया था, जिसमें एक प्रसिद्ध मंदिर का मुख्य द्वार उखाड़कर सड़क पर फेंक दिया गया था। इस भयावह मंजर को देखकर महात्मा गांधी गहरे शोक में डूब गए। वहां पहुंचकर उन्होंने अत्यंत अल्पाहार ग्रहण किया और थोड़ा विश्राम करने के पश्चात स्थानीय निवासियों तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। उनका एकमात्र उद्देश्य हिंसा की इस लहर को तुरंत रोकना और भयभीत लोगों के भीतर सुरक्षा तथा आपसी विश्वास की भावना पुनः जागृत करना था।

## राष्ट्रीय ध्वज के नए प्रारूप पर बापू का कड़ा एतराज
लाहौर प्रवास के दौरान ही जब सहयोगियों ने महात्मा गांधी को सूचित किया कि स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अंतिम स्वरूप तय कर लिया गया है, तो वे चौंक उठे। उन्हें बताया गया कि ध्वज के केंद्र में स्थित पारंपरिक चरखे को हटाकर उसकी जगह सम्राट अशोक के प्रतीक 'अशोक चक्र' को स्थान दिया गया है। इस बदलाव का समाचार मिलते ही गांधी जी अत्यधिक दुखी और नाराज हुए। उन्होंने अपने एक सहयोगी से संवाद करते हुए स्पष्ट किया कि यद्यपि सम्राट अशोक ने आगे चलकर बौद्ध धर्म अंगीकार कर अहिंसा का मार्ग चुना था, परंतु उनके शुरुआती जीवन का बड़ा हिस्सा युद्ध और हिंसा से जुड़ा रहा था। ऐसे शासक के किसी भी चिह्न को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीक में शामिल करना उन्हें नैतिक रूप से तार्किक नहीं लगा।

गांधी जी के दृष्टिकोण में चरखा केवल सूत कातने का साधन मात्र नहीं था, बल्कि वह स्वदेशी आंदोलन, आत्मनिर्भरता और संपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा वैचारिक आधार था। उनका दृढ विश्वास था कि भारत के राष्ट्रध्वज में चरखे का स्थान अक्षुण्ण रहना चाहिए। अपनी असहमति व्यक्त करते हुए महात्मा गांधी ने कहा, **"अगर राष्ट्रध्वज के मध्य में चरखा विद्यमान नहीं होगा, तो मैं इस ध्वज को कभी प्रणाम नहीं करूंगा।"** उन्होंने जोर देकर कहा कि इस ध्वज की मौलिक अवधारणा सबसे पहले उनके द्वारा ही प्रस्तुत की गई थी, इसलिए चरखे के बिना वे किसी अन्य ध्वज की कल्पना भी नहीं कर सकते। हालांकि बाद में संविधान सभा द्वारा अशोक चक्र युक्त तिरंगे को ही भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अंगीकार किया गया, जो आज भी भारत की आन, बान और शान का प्रतीक है। बैठक की समाप्ति के बाद बापू के निर्देशों पर सहयोगियों ने एक आधिकारिक वक्तव्य तैयार किया जिसे समाचार पत्रों को जारी किया गया।

## लॉर्ड माउंटबेटन के प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरू का स्पष्ट रुख
जिस समय महात्मा गांधी लाहौर में शांति स्थापना के प्रयासों में जुटे थे, उसी दिन 6 अगस्त 1947 को दिल्ली में 17 यॉर्क रोड स्थित अपने आवास पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भेजे गए पत्र का जवाब लिख रहे थे। लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने पत्राचार में सुझाव दिया था कि आजादी के बाद भी कुछ विशेष राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अवसरों पर भारतीय सरकारी भवनों पर भारतीय तिरंगे के साथ-साथ ब्रिटेन के राष्ट्रीय ध्वज 'यूनियन जैक' को भी संयुक्त रूप से फहराया जाना चाहिए। माउंटबेटन का तर्क था कि यह दोनों देशों के बीच बने रहने वाले ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक होगा। इस हेतु माउंटबेटन की ओर से नौ विशिष्ट तिथियों की एक सूची भी संलग्न की गई थी, जिसमें प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वीरगति प्राप्त सैनिकों का स्मरण दिवस, राष्ट्रमंडल दिवस तथा अन्य सैन्य अवसर शामिल थे।

पंडित नेहरू ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि यदि इस सूची का उद्देश्य भारत के भीतर स्थित सार्वजनिक और सरकारी भवनों पर भारतीय राष्ट्रध्वज के साथ यूनियन जैक फहराना है, तो उन्हें इस पर बहुत गंभीर आपत्ति है। नेहरू ने दृढ़ता से कहा कि 15 अगस्त यानी भारत के स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर देश की किसी भी सरकारी इमारत पर ब्रिटेन का झंडा फहराना सर्वथा अनुचित होगा। उस गौरवशाली दिन केवल और केवल भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा ही लहराएगा। हालांकि, कूटनीतिक शिष्टाचार बनाए रखते हुए उन्होंने यह छूट अवश्य दी कि यदि उस दिन लंदन स्थित 'इंडिया हाउस' की इमारत पर यूनियन जैक फहराया जाता है, तो उस पर भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी।

## विभाजन की मानवीय त्रासदी पर डॉ. भीमराव आंबेडकर की चिंताएं
उसी ऐतिहासिक 6 अगस्त 1947 के दिन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में डॉ. भीमराव आंबेडकर अपने निवास स्थान पर विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों और सामाजिक प्रतिनिधियों से मुलाकात कर रहे थे। यद्यपि उनसे मिलने वालों का लगातार तांता लगा हुआ था, परंतु पंजाब और बंगाल से आ रही हिंसक झड़पों तथा बड़े पैमाने पर जन-धन की हानि की खबरें उन्हें लगातार विचलित कर रही थीं। संविधान निर्माण प्रक्रिया में व्यस्त डॉ. आंबेडकर विभाजन के कारण उपजने वाले सामाजिक और मानवीय दुष्प्रभावों को लेकर बेहद चिंतित थे। वे इस बात को भली-भांति समझते थे कि सीमाओं का यह बंटवारा न केवल भूभाग का विभाजन है, बल्कि इससे लाखों परिवारों का भविष्य, सुरक्षा और सामाजिक ताना-बाना गंभीर संकट में पड़ रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. 6 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी कहां गए थे?
6 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी दंगा प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लेने और शांति स्थापित करने के लिए लाहौर पहुंचे थे।

### 2. राष्ट्रीय ध्वज के नए बदलाव पर महात्मा गांधी क्यों नाराज थे?
गांधी जी राष्ट्रध्वज के केंद्र से चरखा हटाकर अशोक चक्र लगाए जाने से असंतुष्ट थे, क्योंकि वे चरखे को स्वदेशी आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा प्रतीक मानते थे।

### 3. लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू को क्या सुझाव दिया था?
माउंटबेटन ने स्वतंत्रता दिवस सहित 9 विशेष मौकों पर भारतीय सरकारी इमारतों पर तिरंगे के साथ ब्रिटेन का झंडा यूनियन जैक फहराने का प्रस्ताव दिया था।

### 4. माउंटबेटन के यूनियन जैक प्रस्ताव पर नेहरू की क्या प्रतिक्रिया थी?
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय इमारतों पर यूनियन जैक फहराने से साफ इनकार कर दिया, हालांकि उन्होंने लंदन स्थित इंडिया हाउस पर इसे फहराने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

### 5. 6 अगस्त 1947 को डॉ. भीमराव आंबेडकर किस बात से चिंतित थे?
डॉ. भीमराव आंबेडकर मुंबई में अपने आवास पर देशभर से आ रही सांप्रदायिक हिंसा की खबरों और विभाजन के कारण उत्पन्न होने वाली मानवीय त्रासदी को लेकर गहरे चिंतित थे।

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