# विपक्ष की बैठक के बाद पीएम पद के सवाल को टाल गईं ममता बनर्जी, 2029 की दावेदारी पर टिकीं निगाहें

> दिल्ली में विपक्षी गठबंधन की साझा बैठक के तुरंत बाद जब मीडिया ने राहुल गांधी के 2029 में प्रधानमंत्री पद के चेहरे होने पर सवाल दागा, तो तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने सीधा उत्तर देने से परहेज किया। इस सियासी चुप्पी के बाद गठबंधन के नेतृत्व को लेकर जारी अंदरूनी खींचतान पर भारतीय जनता पार्टी ने भी तीखा प्रहार किया है।

**Type:** article · **Category:** दिल्ली · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/delhi/vipaksha-ki-baithaka-ke-bada-pm-pada-ke-savala-ko-tala-gain-mamata-banerjee-2029-ki-davedari-para-tikin-nigahen-40278 · **Language:** Hindi
**Tags:** ममता बनर्जी, राहुल गांधी, इंडिया गठबंधन, शिवराज सिंह चौहान, चुनाव आयोग, लोकसभा चुनाव 2029

राजधानी दिल्ली में बुधवार को विपक्षी दलों के गठबंधन की एक उच्चस्तरीय बैठक संपन्न हुई, जिसका मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मुद्दों पर साझा रणनीति तैयार करना था। इस मंच पर सभी सहयोगी दलों ने एकजुटता प्रदर्शित करने का भरसक प्रयास किया। हालांकि, बैठक खत्म होते ही जैसे ही तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी बाहर निकलीं, पत्रकारों ने सीधे 2029 के आम चुनाव में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर सवाल दाग दिया। इस सवाल पर ममता बनर्जी का रुख खासा चौंकाने वाला रहा और गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर जारी पुरानी खींचतान एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गई।

पत्रकारों ने जब उनसे साफ लहजे में यह जानना चाहा कि क्या अगले आम चुनाव में राहुल गांधी विपक्ष का नेतृत्व करेंगे या फिर वे खुद इस शीर्ष पद की दावेदार होंगी, तो तृणमूल कांग्रेस नेता ने मामले को सीधा टाल दिया। उन्होंने पहले हल्के तंजिया अंदाज में कहा कि आप उम्मीदवार होंगे, और फिर इस विषय पर आगे कुछ भी बोलने से साफ इनकार करते हुए केवल इतना जोड़ा कि कल होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही स्थिति स्पष्ट की जाएगी। उनके इस टालमटोल भरे जवाब से साफ संकेत मिलता है कि गठबंधन के घटक दलों के बीच भावी नेतृत्व को लेकर किसी भी तरह की एकराय नहीं बन पाई है।

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## गठबंधन के भीतर नेतृत्व पर बनी पुरानी असहजता
विपक्षी मोर्चे के गठन के शुरुआती दौर से ही भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के मुकाबले किसी एक सर्वमान्य चेहरे को तय करने की बहस सबसे बड़ी चुनौती बनी रही है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी को स्वाभाविक रूप से पूरे विपक्ष का मुख्य चेहरा और प्रमुख आवाज मानकर पेश करता आया है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे मजबूत क्षेत्रीय दल चुनाव से पहले किसी एक नाम पर मुहर लगाने के पक्ष में कभी नहीं दिखे।

ममता बनर्जी पहले भी कई बार सार्वजनिक रूप से यह राय रख चुकी हैं कि किसी व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने के बजाय सभी दलों को मिलकर सामूहिक रूप से चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। एक दौर ऐसा भी रहा जब ममता बनर्जी, राहुल गांधी को विपक्ष के मुख्य नेता के तौर पर स्वीकार करने को सहजता से तैयार नहीं दिखती थीं। अब जबकि कांग्रेस अधिक आक्रामक मुद्रा में है और राहुल गांधी की सियासी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, तब भी क्षेत्रीय दलों का यह सतर्क अंदाज दर्शाता है कि वे कांग्रेस के पूर्ण प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

## विपक्ष की असहजता पर भारतीय जनता पार्टी का पलटवार
इस पूरे घटनाक्रम के तुरंत बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने विपक्षी खेमे पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस स्थिति पर तंज कसते हुए कहा कि विपक्षी गठबंधन के घटक दल खुद ही राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने से पीछे हट रहे हैं। उनका कहना था कि जब गठबंधन के सबसे करीबी सहयोगी ही राहुल गांधी के नेतृत्व पर खुला समर्थन देने से हिचक रहे हैं और कैमरे के सामने सवाल पूछे जाने पर चुप्पी साध रहे हैं, तो देश की जनता उन पर किस आधार पर विश्वास करेगी। भारतीय जनता पार्टी ने जोर देकर कहा कि यह मोर्चा बिना किसी स्पष्ट नीति और बिना किसी निश्चित नेता के एक बिखरा हुआ गठबंधन मात्र है।

## संयुक्त आंदोलन की घोषणा के बीच अंदरूनी खींचतान की चुनौती
इस बैठक के दौरान विपक्षी दलों ने कुछ ठोस रणनीतिक कदमों पर सहमति जरूर बनाई है। इनमें आगामी 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के दफ्तर तक विरोध मार्च निकालने और पूरे देश में साझा आंदोलन शुरू करने की योजना प्रमुख है। इसके बावजूद विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की असली परीक्षा साझा मुद्दों से ज्यादा नेतृत्व के चयन पर ही निर्भर करेगी। राज्यों में सक्रिय क्षेत्रीय दलों का मानना है कि राज्यों के स्तर पर उनका मजबूत जनाधार ही भाजपा को सीधी चुनावी चुनौती देने में सक्षम है। ऐसे में किसी केंद्रीय पार्टी के एकतरफा नेतृत्व को स्वीकार करना उनके अपने क्षेत्रीय राजनीतिक वजूद के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। ममता बनर्जी का हालिया रुख यह दिखाता है कि 2029 की चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने से पहले गठबंधन को अपने अंदरूनी मतभेदों और शीर्ष पद की महत्वाकांक्षाओं से निपटना होगा।

## इसका आप पर असर
इस राजनीतिक घटनाक्रम का सीधा असर विपक्षी दलों की चुनावी रणनीति और देश के राजनीतिक विमर्श पर दिखाई देगा।

- **राष्ट्रीय स्तर पर:** विपक्षी मोर्चे के भीतर नेतृत्व को लेकर स्पष्टता न होने से आम मतदाताओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी रह सकती है। आने वाले चुनावों में जब तक साझा नेतृत्व और एजेंडे पर अंतिम मुहर नहीं लगती, तब तक मतदाताओं के सामने एक स्पष्ट राष्ट्रीय विकल्प की रूपरेखा धुंधली ही रहेगी।
- **आगामी आंदोलन पर:** दलों ने 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग के दफ्तर तक मार्च करने का फैसला किया है। इससे राजधानी के महत्वपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था सख्त होने और यातायात प्रभावित होने की संभावना रहेगी।
- **क्षेत्रीय राजनीति पर:** तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के स्वतंत्र रुख से राज्यों में सीटों के तालमेल की बातचीत और अधिक जटिल हो सकती है। राज्य स्तर के कार्यकर्ताओं को साझा अभियानों के दौरान स्पष्ट दिशा-निर्देशों का इंतजार करना पड़ेगा।
- **सत्तारूढ़ दल के अभियान पर:** इस खींचतान से भारतीय जनता पार्टी को विपक्षी मोर्चे की स्थिरता पर लगातार सवाल उठाने का मौका मिलेगा। राजनीतिक रैलियों और सार्वजनिक मंचों पर इस नेतृत्व विहीनता को मुख्य चुनावी हथियार बनाया जाएगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह घटनाक्रम विपक्षी गठबंधन की बैठक के ठीक बाद मीडिया के अप्रत्याशित सवालों और क्षेत्रीय क्षत्रपों की स्वायत्त राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण सामने आया।

- **सीधे सवाल पर असहजता:** बैठक से बाहर आते ही पत्रकारों ने सीधे 2029 में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर सवाल पूछ लिया, जिसके लिए कोई पूर्व-सहमति नहीं बनी थी। किसी तय योजना के अभाव में तृणमूल कांग्रेस नेता ने तुरंत जवाब देने के बजाय बात को प्रेस कॉन्फ्रेंस तक टालना बेहतर समझा।
- **क्षेत्रीय वजूद का सवाल:** तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल राज्यों में अपने मजबूत जनाधार के बल पर राजनीति करते हैं और वे चुनाव से पहले किसी एक राष्ट्रीय चेहरे की अधीनता स्वीकार करने से बचते हैं। पहले भी कई मौकों पर ममता बनर्जी बिना किसी पूर्व-घोषित पीएम चेहरे के सामूहिक रूप से चुनाव लड़ने की वकालत कर चुकी हैं।
- **कांग्रेस की बढ़ती दावेदारी:** हाल के दिनों में राहुल गांधी की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता और कांग्रेस के आक्रामक रुख के कारण क्षेत्रीय दलों के भीतर अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखने की चिंता बढ़ गई है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए सहयोगी दल समय-समय पर स्वतंत्र रुख जाहिर करते रहते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक किस मुख्य विषय पर बुलाई गई थी?
यह बैठक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई थी।

### 2. राहुल गांधी की 2029 की उम्मीदवारी पर ममता बनर्जी ने क्या जवाब दिया?
उन्होंने सीधे तौर पर कोई जवाब नहीं दिया और सवाल टालते हुए कहा कि वे कल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस पर बात करेंगी।

### 3. बैठक में विपक्ष ने किस आगामी कार्यक्रम पर सहमति जताई है?
विपक्षी दलों ने 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च निकालने और राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है।

### 4. केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले पर क्या टिप्पणी की?
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब गठबंधन के अपने साथी ही राहुल गांधी को नेता मानने से कतरा रहे हैं, तो जनता उन पर कैसे भरोसा करेगी।

### 5. प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर ममता बनर्जी का पहले क्या रुख रहा है?
वे पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि चुनाव से पहले किसी चेहरे की घोषणा करने के बजाय सभी दलों को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए।

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