विपक्ष की महारैली के बाद केंद्र पर बरसे कपिल सिब्बल, 2017 से चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर का लगाया आरोप दिल्ली के ऐतिहासिक मैदान में विपक्षी मोर्चे के शक्ति प्रदर्शन के बाद कपिल सिब्बल ने सरकार की चुनावी फंडिंग नीतियों और कानून-व्यवस्था के रवैये पर कड़े सवाल दागे हैं. राजधानी के रामलीला मैदान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के विरोध में विपक्षी गठबंधन के विशाल जुटान के बाद सियासी पारा पूरी तरह चढ़ चुका है. इस बड़े शक्ति प्रदर्शन में उमड़े जनसमूह के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सत्तापक्ष पर सीधा राजनीतिक हमला बोला है. सिब्बल ने न केवल चुनावी तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए, बल्कि हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान उपजे हालातों और राजनीतिक फंडिंग के पूरे ढांचे को कठघरे में खड़ा किया है. रामलीला मैदान का नजारा और सिब्बल का प्रत्यक्ष अनुभव सिब्बल ने बताया कि मैदान और उसके आसपास उमड़े विशाल जनसमूह को उन्होंने स्वयं देखा, क्योंकि वे खुद बस के जरिए वहां पहुंचे थे. इलाके में इतनी व्यापक संख्या में लोग जमा थे कि रामलीला मैदान तक पहुंचने में उन्हें तकरीबन एक से डेढ़ घंटे का वक्त लग गया. जब वे आयोजन स्थल पर पहुंचे, तो चारों तरफ सुरक्षा बैरिकेड्स लगे हुए थे और मैदान का हर एक कोना खचाखच भरा हुआ था. सिब्बल के आकलन के अनुसार, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के आह्वान पर लगभग 5 से 6 लाख नागरिक वहां पहुंचे थे. उन्होंने विशेष तौर पर रेखांकित किया कि इतने विशाल जुटान के बावजूद यह पूरा आयोजन असाधारण रूप से शांतिपूर्ण रहा. इतने बड़े पैमाने पर लोग इकट्ठा होने पर भी कहीं से किसी भी तरह की अप्रिय घटना, उपद्रव या अव्यवस्था की कोई खबर सामने नहीं आई, जो नागरिकों के लोकतांत्रिक अनुशासन को दर्शाती है. विरोधियों के अभियानों पर तंज और जंतर-मंतर की घटनाओं पर सवाल सत्तारूढ़ दल द्वारा चलाए गए जवाबी कार्यक्रमों पर कटाक्ष करते हुए सिब्बल ने दोनों आयोजनों के आकार की तुलना की. उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां रामलीला मैदान में लाखों साधारण नागरिक अपने अधिकारों के लिए एकत्र थे, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष महज 100 से 200 समर्थकों की मौजूदगी के साथ अपनी 'लोकतंत्र बचाओ' पदयात्रा निकालने पहुंचे थे. इस भारी अंतर का उल्लेख करते हुए उन्होंने जनता के वास्तविक समर्थन का दावा किया. इसके साथ ही सिब्बल ने जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए युवा आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि जब 5 से 6 लाख की भारी भीड़ बिना किसी गड़बड़ी के शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठा सकती है, तो जंतर-मंतर पर पहली बार उतरे युवाओं के प्रदर्शन में अचानक अशांति कैसे फैल गई. सिब्बल ने सीधा आरोप लगाया कि वह हिंसा प्रायोजित थी ताकि युवाओं के वैध आक्रोश को बदनाम किया जा सके. उनके अनुसार, माहौल खराब करके उसका दोष बेकसूर युवाओं पर मढ़ना एक पुरानी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है. शांतिपूर्ण जनआंदोलनों का ऐतिहासिक संदर्भ भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि देश का इतिहास कभी भी फ्रांस, स्पेन या अल्बानिया जैसे हिंसक संघर्षों जैसा नहीं रहा है. भारत की जमीन हमेशा से अहिंसक और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की गवाह रही है. उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्षी मोर्चे का यह लोकतांत्रिक संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक गठबंधन अपने बुनियादी राजनीतिक और संवैधानिक लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर लेता. 2017 से चुनावी फंडिंग और 'वोट चोरी' का पूरा घटनाक्रम चुनावी व्यवस्था और चंदे की निष्पक्षता पर विस्तृत चर्चा करते हुए सिब्बल ने सिलसिलेवार ढंग से अपनी बात रखी. उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया में असमानता और जनादेश की कथित चोरी की असल शुरुआत साल 2017 में हुई थी. सिब्बल के अनुसार, उस दौरान वित्त कानून में संशोधन करके कॉरपोरेट जगत और कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को असीमित चंदा देने का कानूनी रास्ता खोल दिया गया था, जिससे वित्तीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया. इसके बाद के घटनाक्रम को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि साल 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लागू की गई. इस योजना के जरिए अकेले बीजेपी के खाते में 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की भारी धनराशि पहुंची. सिब्बल का तर्क है कि धनबल के इस असीमित और एकतरफा प्रवाह ने लोकतांत्रिक चुनावों में बराबरी के अवसर को खत्म कर दिया, जिसे उन्होंने वोट और जनादेश की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा आघात करार दिया. उनके इस विस्तृत बयान से साफ है कि आने वाले समय में चुनावी सुधार, फंडिंग और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक व कानूनी जंग और तेज होने वाली है. इसका आप पर असर इस राजनीतिक खींचतान और बयानों का सीधा संबंध देश की चुनावी व्यवस्था, नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता से है. • राष्ट्रीय स्तर पर: राजनीतिक दलों को मिलने वाले कॉरपोरेट चंदे और चुनावी नियमों की निष्पक्षता पर सवाल उठने से भविष्य में पारदर्शी कानूनों की मांग तेज हो सकती है. इसके परिणामस्वरूप आम मतदाताओं में वोटर लिस्ट के सत्यापन और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर जागरूकता बढ़ेगी. • दिल्ली और प्रदर्शन स्थलों पर: राजधानी में प्रमुख स्थलों पर राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन सख्त कदम उठा सकता है. इससे नई दिल्ली के मध्यवर्ती इलाकों में यात्रा करने वाले आम यात्रियों और नौकरीपेशा लोगों को रूट डायवर्जन और बैरिकेडिंग का सामना करना पड़ सकता है. • युवाओं और नागरिक आंदोलनों के लिए: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के कानूनी अधिकारों और धरने के दौरान सुरक्षा जवाबदेही पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है. छात्र संगठनों और नागरिक समूहों को अपने आंदोलनों की अनुमति और प्रशासनिक सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्कता बरतनी होगी. • मतदाताओं की सक्रियता: मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठने से नागरिकों को अपने वोटर पहचान पत्र और स्थानीय सूची की जांच करने की प्रेरणा मिलेगी. चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल के जरिए लोग अपने मतदाता पंजीकरण की पुष्टि समय रहते कर सकते हैं. ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक टकराव विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और कॉरपोरेट फंडिंग के नियमों को लेकर उठाए गए सवालों के बाद पैदा हुआ है. • विपक्षी महारैली का आयोजन: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर के विरोध में विपक्षी मोर्चे ने एकजुट होकर रामलीला मैदान में शक्ति प्रदर्शन किया. इस बड़े आयोजन का मकसद चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को सीधे जनता के बीच ले जाना था. • चुनावी फंडिंग नियमों में बदलाव: साल 2017 में वित्त कानून में किए गए संशोधनों ने कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा राजनीतिक दलों को असीमित चंदा देने का मार्ग प्रशस्त किया था. इसके बाद 2018 में शुरू हुई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के जरिए सत्तापक्ष को 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि मिलने का तथ्य इस राजनीतिक असंतोष की अहम वजह बना. • जंतर-मंतर पर हालिया अशांति: युवाओं के हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों को लेकर विपक्ष का मानना है कि असहमति की आवाजों को दबाने के लिए जानबूझकर माहौल खराब किया गया. इस पृष्ठभूमि ने सरकार की प्रशासनिक निष्पक्षता पर राजनीतिक बहस को और भड़का दिया. सवाल-जवाब 1. कपिल सिब्बल ने रामलीला मैदान की रैली को लेकर क्या दावा किया? उन्होंने बताया कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए मैदान में 5 से 6 लाख लोग पहुंचे थे और इतना विशाल जुटान पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा. 2. सिब्बल ने बीजेपी के कार्यक्रम की तुलना किस प्रकार की? उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान में लाखों नागरिक थे, जबकि बीजेपी अध्यक्ष की 'लोकतंत्र बचाओ' पदयात्रा में केवल 100 से 200 लोग ही मौजूद थे. 3. जंतर-मंतर पर हुई हिंसा को लेकर सिब्बल ने क्या आरोप लगाया? उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर युवाओं के प्रदर्शन में हुई हिंसा सरकार द्वारा कराई गई थी ताकि निर्दोष युवाओं पर इसका दोष मढ़ा जा सके. 4. सिब्बल के अनुसार चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की शुरुआत कब और कैसे हुई? उन्होंने कहा कि 2017 में वित्त कानून में बदलाव कर कॉरपोरेट चंदे की सीमा हटाई गई और 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड लाकर इस असंतुलन को बढ़ाया गया. 5. इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के जरिए बीजेपी को कितना चंदा मिलने का दावा किया गया? सिब्बल के अनुसार इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के माध्यम से अकेले बीजेपी के खाते में 6,000 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा पहुंचा. https://trendkia.com/delhi/vipaksha-ki-maharaili-ke-bada-kendra-para-barase-kapil-sibal-2017-se-chunavi-prakriya-men-heraphera-ka-lagaya-aropa-55183 TrendKia — Har trend, sabse pehle.