# रसोई के कचरे से बनाएं इको-फ्रेंडली बायो एंजाइम, फरीदाबाद की सुचिता साहू ने दिखाया केमिकल फ्री सफाई का आसान तरीका

> फरीदाबाद की सुचिता साहू ने रसोई से निकलने वाले फलों के छिलकों से प्राकृतिक बायो एंजाइम और क्लीनर बनाने की अनूठी तकनीक तैयार की है, जिससे घर की सफाई बिना केमिकल के हो सकती है।

**Type:** article · **Category:** DIY · **Published:** 2026-07-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/diy/rasoi-ke-kachare-se-banaen-iko-phrendali-bayo-enjaima-faridabad-ki-suchita-sahu-ne-dikhaya-kemikala-phri-saphai-ka-asana-tarika-11727 · **Language:** Hindi
**Tags:** बायो एंजाइम, फरीदाबाद, सुचिता साहू, किचन वेस्ट मैनेजमेंट, इको फ्रेंडली क्लीनर, प्राकृतिक सफाई, स्मार्ट सिटी

फरीदाबाद को एक स्वच्छ और आधुनिक स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में शहरवासियों की व्यक्तिगत भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रही है। अक्सर देखा जाता है कि घरों की रसोई से निकलने वाले गीले कचरे और फलों के छिलकों को लोग खुले में या सड़कों के किनारे फेंक देते हैं, जिससे सड़ांध और गंदगी बढ़ती है। हालांकि अगर इसी जैविक कचरे को सही तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए, तो न केवल शहर को कचरा मुक्त बनाया जा सकता है, बल्कि पर्यावरण को भी रासायनिक प्रदूषण से बचाया जा सकता है। फरीदाबाद की निवासी सुचिता साहू ने इसी सोच को अपनाकर एक मिसाल कायम की है और रसोई के बचे हुए छिलकों से कई उपयोगी घरेलू उत्पाद बनाकर कचरा प्रबंधन की नई राह दिखाई है।

## रसोई के कचरे से बायो एंजाइम बनाने का आसान तरीका
सुचिता साहू के अनुसार रसोई में दैनिक उपयोग के बाद बचे संतरे, मौसमी, पपीते और अन्य खट्टे व मीठे फलों के छिलके कोई बेकार सामग्री नहीं हैं। इन्हें डस्टबिन में फेंकने के बजाय सात से आठ प्रकार के बहुउपयोगी सफाई उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। बायो एंजाइम बनाने की विधि बेहद सरल है और इसे बिना किसी विशेष उपकरण के कोई भी व्यक्ति अपने घर में आसानी से तैयार कर सकता है। इसके लिए एक निश्चित अनुपात का पालन करना होता है, जिसमें 300 ग्राम फलों के छिलके, 100 ग्राम गुड़ और 1 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है।

इस मिश्रण को एक एयरटाइट प्लास्टिक के जार में भरकर अच्छी तरह बंद कर दिया जाता है। फरमेंटेशन या किण्वन की प्रक्रिया के दौरान जार के भीतर प्राकृतिक रूप से गैस बनती है। इसलिए शुरुआती 20 से 25 दिनों तक प्रतिदिन जार का ढक्कन थोड़ा सा खोलकर जमा हुई गैस को बाहर निकालना जरूरी होता है। इसके बाद जार को किसी छायादार स्थान पर सुरक्षित रख दिया जाता है। लगभग 90 दिन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जो तरल पदार्थ तैयार होता है, उसे ही बायो एंजाइम कहा जाता है।

## केमिकल क्लीनर का सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प
बाजार में मिलने वाले बहुचर्चित रासायनिक क्लीनर घरों के फर्श और बर्तनों को तो साफ कर देते हैं, लेकिन उनमें मौजूद हानिकारक रसायन इंसान के स्वास्थ्य और घर के वातावरण पर बुरा असर डालते हैं। इसके विपरीत घर पर बना बायो एंजाइम पूरी तरह से प्राकृतिक, विषरहित और पर्यावरण के अनुकूल होता है। इसका उपयोग घर के फर्श की पोंछा लगाने, रसोई के बर्तनों की सफाई करने और टॉयलेट को कीटाणुरहित करने के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

यह बायो एंजाइम सिर्फ जिद्दी दाग-धब्बों और दुर्गंध को ही दूर नहीं करता, बल्कि घर के अंदर की हवा और वातावरण को भी तरोताजा बनाए रखने में मदद करता है। इसके अलावा, सफाई के बाद बचे हुए पानी का उपयोग पौधों में डालने के लिए भी किया जा सकता है। यह पौधों के लिए एक प्राकृतिक पोषक तत्व और उर्वरक के रूप में कार्य करता है, जिससे उनकी वृद्धि में सुधार होता है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहती है।

## इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स और व्यावसायिक दायरा
सुचिता साहू केवल साधारण बायो एंजाइम तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने फलों के छिलकों के उपयोग को विस्तृत करते हुए दैनिक जीवन के अन्य उत्पाद भी तैयार किए हैं। वह इन्हीं छिलकों की मदद से कपड़ों की धुलाई के लिए एक प्राकृतिक लिक्विड डिटर्जेंट बनाती हैं, जिसे वॉशिंग मशीन में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। बाजार में इस 1 लीटर लिक्विड कपड़े धोने वाले उत्पाद की कीमत 230 रुपये रखी गई है।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने चींटियों और छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों को बिना नुकसान पहुंचाए दूर भगाने के लिए एक खास नेचुरल इंसेक्ट रिपेलेंट लिक्विड भी विकसित किया है। इस रिपेलेंट लिक्विड की कीमत 160 रुपये प्रति लीटर है। वर्तमान में उनके पास 7 से 8 अलग-अलग तरह के उत्पाद मौजूद हैं, जो पूरी तरह से किचन वेस्ट और प्राकृतिक घटकों पर आधारित हैं। यह पहल दिखाती है कि किस तरह कचरे का सही प्रबंधन कर घरेलू खर्चों में कटौती की जा सकती है।

## स्कूलों और संस्थानों में मुफ्त ट्रेनिंग और जागरूकता अभियान
सुचिता साहू का मुख्य उद्देश्य केवल व्यवसाय चलाना या उत्पाद बेचना नहीं है, बल्कि आम लोगों के बीच पर्यावरण संरक्षण के प्रति चेतना जगाना है। अपने इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए वह विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय संस्थानों में जाकर बच्चों, युवाओं और महिलाओं को बायो एंजाइम बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण देती हैं। उनके प्रयासों के कारण अब तक हजारों लोग रसोई के कचरे का सही इस्तेमाल करना सीख चुके हैं और अपने घरों में बायो एंजाइम बना रहे हैं।

उनका मानना है कि यदि शहर का हर परिवार अपनी रसोई से निकलने वाले गीले कचरे को डस्टबिन में फेंकने के बजाय इस प्रकार उपयोग में लाने लगे, तो नगर निगम पर कचरा उठाने का दबाव बहुत कम हो जाएगा। इससे सड़कों और लैंडफिल साइटों पर कचरे के पहाड़ बनने से रोके जा सकेंगे, जिससे पूरे शहर की साफ-सफाई में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।

## बिना किसी बड़े खर्च के स्मार्ट सिटी की ओर कदम
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बायो एंजाइम बनाने के लिए किसी महंगी मशीन, जटिल तकनीक या बड़े आर्थिक निवेश की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती। घर में सामान्य रूप से उपलब्ध प्लास्टिक का डिब्बा या जार, थोड़ा सा गुड़, साफ पानी और दैनिक रसोई का कचरा ही इसके लिए पर्याप्त होता है। हालांकि इसमें 90 दिनों का धैर्य रखना पड़ता है, लेकिन एक बार तैयार हो जाने के बाद यह लिक्विड लंबे समय तक खराब नहीं होता और दैनिक सफाई के कार्यों को बेहद सुगम बना देता है।

स्मार्ट सिटी का निर्माण केवल बड़ी-बड़ी बुनियादी ढांचागत योजनाओं, ऊंची इमारतों या सरकारी बजट से नहीं होता, बल्कि वहां रहने वाले नागरिकों की जागरूक और जिम्मेदार आदतों से संभव होता है। जब हर नागरिक अपने स्तर पर गीले कचरे और प्लास्टिक के उपयोग को नियंत्रित करेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित वातावरण मिल सकेगा। फरीदाबाद में शुरू हुई यह छोटी सी पहल पूरे देश के शहरी क्षेत्रों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है।

## इसका आप पर असर
**पाठकों के लिए प्रभाव:**

- **भारत में:** महंगे और हानिकारक केमिकल क्लीनर के स्थान पर घर पर ही बेहद कम खर्च में प्राकृतिक सफाई उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य और बजट दोनों सुधरते हैं।
- **फरीदाबाद में:** रसोई के गीले कचरे को सही तरीके से रीसायकल करने से शहर के कचरे के ढेर में कमी आएगी और स्मार्ट सिटी का सपना हकीकत बनेगा।

## सवाल-जवाब

### 1. बायो एंजाइम बनाने के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए?
बायो एंजाइम बनाने के लिए 300 ग्राम फलों के छिलके, 100 ग्राम गुड़ और 1 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

### 2. बायो एंजाइम तैयार होने में कितना समय लगता है?
बायो एंजाइम पूरी तरह तैयार होने में लगभग 90 दिन का समय लगता है, जिसमें पहले 20 से 25 दिन जार की गैस निकालना जरूरी होता है।

### 3. क्या बायो एंजाइम का इस्तेमाल कपड़े धोने में किया जा सकता है?
हां, सुचिता साहू फलों के छिलकों से वॉशिंग मशीन में इस्तेमाल होने वाला लिक्विड डिटर्जेंट भी तैयार करती हैं, जिसकी कीमत 230 रुपये प्रति लीटर है।

### 4. बायो एंजाइम के मुख्य उपयोग क्या-क्या हैं?
इसका इस्तेमाल घर के फर्श, बर्तन और टॉयलेट की सफाई के लिए किया जाता है। इसके अलावा यह पौधों के लिए भी फायदेमंद है।

### 5. सुचिता साहू के पास कौन-कौन से प्राकृतिक उत्पाद उपलब्ध हैं?
उनके पास कपड़ों के लिक्विड डिटर्जेंट (230 रुपये/लीटर) और चींटी व कीड़ों को दूर रखने वाले लिक्विड (160 रुपये/लीटर) समेत 7 से 8 तरह के उत्पाद हैं।

### 6. बायो एंजाइम बनाते समय जार का ढक्कन खोलना क्यों जरूरी है?
फरमेंटेशन की प्रक्रिया के दौरान बनने वाली गैस को बाहर निकालने के लिए पहले 20 से 25 दिनों तक रोज थोड़ा ढक्कन खोलना पड़ता है।

## प्रेरणा और सबक
**प्रेरणा और सीख:** सुचिता साहू की यह पहल दिखाती है कि कैसे छोटे प्रयास बड़े बदलाव की वजह बन सकते हैं।

- **कचरे में छिपा संसाधन:** घर से निकलने वाले गीले कचरे को बेकार समझने के बजाय उसे उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।
- **जीरो-इन्वेस्टमेंट मॉडल:** बड़े बदलाव या बिजनेस के लिए हमेशा महंगी मशीनों की जरूरत नहीं होती, घरेलू सामान से भी शुरुआत की जा सकती है।
- **पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी:** सिर्फ सरकार या प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय हर नागरिक अपने स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा में योगदान दे सकता है।
- **ज्ञान बांटने का जज्बा:** खुद सीखने के साथ-साथ समाज के अन्य लोगों, युवाओं और बच्चों को जागरूक करना स्थायी बदलाव लाता है।

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