अंग्रेजों के जमाने में जमींदारों की पढ़ाई का क्या था नियम, क्यों लाया गया था डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम औपनिवेशिक दौर में अंग्रेजों ने शिक्षा के लिए डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम लागू किया था, जिसके तहत पहले जमींदारों को अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी ताकि वे बाद में आम लोगों को शिक्षित कर सकें। आधुनिक भारत में शिक्षा का अधिकार कानून हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के पढ़ाई की सुविधा देता है। समाज का कोई भी तबका हो, चाहे कोई संपन्न परिवार से आता हो या किसी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से, हर किसी को अपनी और अपने बच्चों की बुनियादी पढ़ाई का अधिकार हासिल है। जाति, धर्म या मजहब की सीमाओं से परे आज शिक्षा तक सबकी पहुंच सुनिश्चित की जा रही है। इसके विपरीत, जब देश में ब्रिटिश हुकूमत का दौर था, तब हालात बिल्कुल अलग थे। उस जमाने में आम लोगों के लिए पढ़ाई के दरवाजे आसानी से नहीं खुलते थे। समाज में जमींदारी व्यवस्था का बोलबाला था और सत्ता के करीब रहने वाले प्रभावशाली लोगों का ही दबदबा माना जाता था। उस औपनिवेशिक कालखंड में जमींदार किस तरह शिक्षा हासिल करते थे और समाज के बाकी लोगों तक अक्षर ज्ञान कैसे पहुंचता था, इसकी व्यवस्था बेहद जटिल थी। अंग्रेजी हुकूमत और डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन की व्यवस्था औपनिवेशिक शासन के दौरान जमींदारों और कुलीन वर्ग के लिए एक खास शैक्षिक ढांचा तैयार किया गया था। जमींदार पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले अनिल कुमार के अनुसार, अंग्रेजी हुकूमत ने उच्च वर्ग को शिक्षित करने के मकसद से एक खास नियम पेश किया था। इस नीति को डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम का नाम दिया गया था। इस व्यवस्था का मुख्य सिद्धांत यह था कि समाज के ऊपरी तबके, विशेषकर जमींदारों को पहले अंग्रेजी भाषा और आधुनिक विषयों की तालीम दी जाए। इसके पीछे सोच यह रखी गई थी कि जब यह प्रभावशाली वर्ग खुद पढ़-लिख जाएगा, तो वह अपने इलाकों में लौटकर आम जनता और अधीनस्थ लोगों को शिक्षित करेगा। अनिल कुमार का कहना है कि इस शैक्षिक व्यवस्था को लेकर जमींदारों का एक प्रतिनिधिमंडल उस समय के गवर्नर से मिलने भी पहुंचा था। हालांकि, यह नीति लंबे समय तक सफलतापूर्वक नहीं चल सकी। इसका एक बड़ा कारण यह था कि कई जमींदार पढ़ाई-लिखाई को कोई खास तवज्जो नहीं देते थे। इसके बावजूद, उसी वर्ग के कुछ ऐसे लोग भी थे जिनकी पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और उन्होंने इसी व्यवस्था के माध्यम से अपनी तालीम पूरी की। जागरूकता का अभाव और आम लोगों की मुश्किलें उस दौर में शिक्षा को लेकर समाज में आज जैसी व्यापक जागरूकता देखने को नहीं मिलती थी। अनिल कुमार रेखांकित करते हैं कि जमींदार परिवारों के भीतर भी अधिकांश लोगों का ध्यान खेती-बाड़ी, लगान वसूली, शिकार और अन्य पारंपरिक गतिविधियों तक ही सीमित रहता था। बौद्धिक विकास या नियमित अध्ययन को प्राथमिकता देने वाले लोग गिने-चुने ही थे। ऐसे माहौल में आम नागरिकों और मजदूरों के लिए शिक्षा पाना एक बेहद कठिन संघर्ष बन गया था। जो लोग जमींदार नहीं थे या जमींदारों के खेतों और जागीरों में काम करते थे, उनके लिए स्कूल जाने का कोई स्वतंत्र विकल्प मौजूद नहीं था। वे पूरी तरह जमींदार परिवार के पढ़े-लिखे सदस्यों की मर्जी पर निर्भर थे। अगर कोई दयालु जमींदार या उनका शिक्षित परिजन उन्हें कुछ सिखा देता, तभी वे अक्षर ज्ञान पा सकते थे; अन्यथा वे हमेशा के लिए शिक्षा से वंचित रह जाते थे। आज की समावेशी शिक्षण व्यवस्था की तुलना में उस समय की पढ़ाई का दायरा पूरी तरह सीमित था और जो कोई भी ज्ञान हासिल करना चाहता था, उसे उसी डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन प्रणाली के संकरे रास्ते से होकर गुजरना पड़ता था। इसका आप पर असर यह ऐतिहासिक विवरण बताता है कि आज के सर्वसुलभ शिक्षा अधिकारों की तुलना में औपनिवेशिक दौर की शिक्षण नीतियां कितनी सीमित और वर्ग-आधारित थीं। • भारत में: यह इतिहास समझाता है कि क्यों देश में आधुनिक शिक्षा का अधिकार कानून इतना क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया। आज हर नागरिक बिना किसी सामाजिक या आर्थिक भेदभाव के कानूनी रूप से निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का हकदार है। • विद्यार्थियों और पाठकों के लिए: यह जानकारी बताती है कि पहले ज्ञान कुछ खास वर्गों तक सीमित रखने की नीति अपनाई जाती थी। इसे जानकर पाठक समझ सकते हैं कि वर्तमान समावेशी स्कूल व्यवस्था और सार्वजनिक शिक्षा तक खुली पहुंच कितनी महत्वपूर्ण है। • सामाजिक दृष्टिकोण से: पहले आम लोगों को पढ़ाई के लिए जमींदार परिवारों की इच्छा पर निर्भर रहना पड़ता था। अब राज्य खुद हर तबके के बच्चे को स्कूल भेजने और बुनियादी साक्षरता देने की जिम्मेदारी उठाता है। • नीतिगत समझ के लिए: डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन जैसी नीतियां दिखाती हैं कि शिक्षा को ऊपर से नीचे रिसने के भरोसे छोड़ना क्यों नाकाम रहा। इसी सबक के कारण स्वतंत्र भारत में जमीनी स्तर से बुनियादी प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करने पर जोर दिया गया। ऐसा क्यों हुआ अंग्रेजी हुकूमत ने डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम इसलिए तैयार किया था ताकि कम प्रशासनिक खर्च में समाज के प्रभावशाली तबके को अंग्रेजी सिखाकर शासन तंत्र को आसान बनाया जा सके। • सीमित संसाधनों की नीति: ब्रिटिश प्रशासन पूरे देश के सभी नागरिकों के लिए व्यापक स्कूल नेटवर्क बनाने पर भारी बजट खर्च नहीं करना चाहता था। अधिकारियों का मानना था कि सिर्फ जमींदारों और कुलीन वर्ग को शिक्षित करने से प्रशासन को स्थानीय सहयोगी मिल जाएंगे। • वर्ग-आधारित धारणा: इस व्यवस्था की मुख्य मान्यता यह थी कि ज्ञान ऊपरी पायदान से छनकर नीचे आम जनता तक अपने आप पहुंच जाएगा। हालांकि जमींदारों की खेती और शिकार जैसी प्राथमिकताओं के कारण यह धारणा व्यवहार में पूरी तरह असफल साबित हुई। • जागरूकता और रुचि की कमी: कई जमींदार परिवारों का ध्यान पढ़ाई के बजाय रियासत संभालने और पारंपरिक शौक पूरा करने पर था। जब उच्च वर्ग ने ही पढ़ाई में व्यापक रुचि नहीं दिखाई, तो आम जनता तक शिक्षा पहुंचने का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। सवाल-जवाब 1. डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम क्या था? यह अंग्रेजों द्वारा लाई गई एक शिक्षा नीति थी, जिसके तहत पहले जमींदारों को अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी ताकि वे बाद में अन्य लोगों को शिक्षित करें। 2. इस व्यवस्था के बारे में जानकारी किसने दी है? जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले अनिल कुमार ने इस ऐतिहासिक व्यवस्था और उस दौर के हालात की जानकारी साझा की है। 3. क्या जमींदारों का दल इस विषय पर गवर्नर से मिला था? हां, अनिल कुमार के अनुसार इस शैक्षिक व्यवस्था को लेकर जमींदारों का एक प्रतिनिधिमंडल उस समय के गवर्नर से मिलने गया था। 4. डाउनवार्ड फिल्ट्रेशन सिस्टम लंबे समय तक क्यों नहीं चल सका? यह व्यवस्था इसलिए नहीं टिक सकी क्योंकि अधिकांश जमींदार पढ़ाई को महत्व नहीं देते थे और खेती-बाड़ी तथा शिकार में ही लगे रहते थे। 5. उस जमाने में आम लोगों को शिक्षा कैसे मिलती थी? आम लोगों के पास कोई स्वतंत्र स्कूल नहीं थे; वे केवल तभी पढ़ पाते थे जब जमींदार परिवार का कोई शिक्षित व्यक्ति उन्हें पढ़ाए। https://trendkia.com/education/angrejon-ke-jamane-men-jamindaron-ki-parhai-ka-kya-tha-niyama-kyon-laya-gaya-tha-downward-filtration-system-42296 TrendKia — Har trend, sabse pehle.