# गुजरात में मोबाइल की लत छुड़ाने का अनोखा फॉर्मूला, घंटे के हिसाब से नकद ईनाम दे रहा राजकोट का स्कूल

> राजकोट के एक निजी स्कूल ने कक्षा 3 से 10 तक के 150 छात्रों को किताबों से जोड़ने के लिए प्रति घंटे 5 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने की व्यवस्था शुरू की है। माता-पिता के हस्ताक्षर और शिक्षकों के सवाल-जवाब से इस अध्ययन का रिकॉर्ड जांचा जाता है।

**Type:** article · **Category:** शिक्षा · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/education/gujarat-men-mobaila-ki-lata-chhurane-ka-anokha-phormula-ghnte-ke-hisaba-se-nakada-inama-de-raha-rajkot-ka-skula-44613 · **Language:** Hindi
**Tags:** राजकोट, गुजरात, किताबें, शिक्षा, स्क्रीन टाइम, छात्र

स्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन्स पर घंटों बिताने की बच्चों की आदत आज अधिकांश परिवारों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। इसी चुनौती से निपटने के लिए गुजरात के राजकोट में शिक्षा से जुड़ा एक बेहद अनूठा प्रयोग सामने आया है। राजकोट के वर्धमाननगर स्थित आरबी स्कूल ने छात्रों का ध्यान डिजिटल दुनिया से हटाकर साहित्य और ज्ञान की ओर मोड़ने के लिए एक विशेष प्रोत्साहन कार्यक्रम लागू किया है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को किताबें पढ़ने के एवज में बाकायदा नकद प्रोत्साहन दिया जा रहा है। योजना का सीधा सिद्धांत यह है कि बच्चा जितना समय पुस्तक के पन्नों के साथ बिताएगा, उसे उसी अनुपात में आर्थिक पारितोषिक हासिल होगा।

## प्रति घंटे पांच रुपये की प्रोत्साहन व्यवस्था
इस व्यवस्था के तहत तय किया गया है कि यदि कोई विद्यार्थी एकाग्र होकर एक घंटे तक पुस्तक पढ़ता है, तो उसे 5 रुपये दिए जाएंगे। यदि वह दो घंटे तक अध्ययन करता है, तो यह राशि बढ़कर 10 रुपये हो जाती है। समय में जितनी बढ़ोतरी होगी, उसी दर से प्रोत्साहन राशि का पैमाना भी आगे बढ़ता जाएगा। यह पूरी योजना कक्षा 3 से लेकर कक्षा 10 तक के लगभग 150 छात्र-छात्राओं के लिए लागू की गई है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को बिना किसी मानसिक दबाव के पुस्तकों की दुनिया से जोड़ना और टेलीविजन तथा स्मार्टफोन के अत्यधिक स्क्रीन टाइम पर अंकुश लगाना है।

## मनपसंद विषयों के चयन की पूरी आजादी
इस अभिनव योजना में छात्रों पर किसी खास विषय अथवा पाठ्यक्रम की किताब पढ़ने की बाध्यता नहीं रखी गई है। बच्चे अपनी निजी रुचि और पसंद के अनुसार कोई भी ज्ञानवर्धक, साहित्यिक या रोचक पुस्तक चुन सकते हैं। इसके अतिरिक्त पढ़ाई के समय को लेकर भी स्कूल की ओर से कोई कड़ा बंधन नहीं है। छात्र दिन के किसी भी हिस्से में अपनी सुविधा और रुचि के मुताबिक अध्ययन कर सकते हैं। अपनी पसंद की सामग्री चुनने की इस स्वतंत्रता के चलते बच्चों में पुस्तकों के प्रति स्वाभाविक आकर्षण पनप रहा है।

## फर्जी दावे रोकने के लिए सख्त निगरानी तंत्र
स्कूल प्रबंधन ने इस बात का भी विशेष ध्यान रखा है कि प्रोत्साहन पाने के चक्कर में कोई विद्यार्थी केवल दिखावा न करे। केवल यह कह देने से राशि नहीं मिलती कि अमुक समय तक पढ़ाई की गई है। इसके लिए स्कूल ने एक व्यवस्थित रिकॉर्ड प्रक्रिया तैयार की है। प्रत्येक विद्यार्थी को एक चार्ट मेंटेन करना होता है, जिसमें पढ़ी गई पुस्तक का शीर्षक, कुल अध्ययन के घंटे और पढ़े गए पन्नों की संख्या दर्ज करनी होती है। इस दैनिक विवरण पर घर में माता-पिता के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, ताकि घर पर बिताए गए समय की पुष्टि हो सके। इसके बाद यह चार्ट विद्यालय में क्लास टीचर के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है।

## शिक्षक लेते हैं समझ और विषयवस्तु की परीक्षा
निगरानी की यह प्रक्रिया केवल कागजी दस्तखत तक सीमित नहीं रहती। जब छात्र अपना भरा हुआ रिकॉर्ड चार्ट जमा करता है, तब उसे संबंधित पुस्तक भी शिक्षक के सामने लानी होती है। शिक्षक पुस्तक के भीतर से विद्यार्थी से सवाल पूछते हैं ताकि यह परखा जा सके कि उसने वास्तव में पन्नों को समझा है या केवल पन्ने पलटे हैं। जब छात्र पूछे गए सवालों के संतोषजनक उत्तर दे देता है, तभी शिक्षक उस चार्ट को प्रमाणित कर अपने हस्ताक्षर करते हैं। पूरे माह के प्रमाणित रिकॉर्ड का संकलन कर महीने के अंत में कुल घंटों के हिसाब से प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाता है।

## छात्रों के अनुभव और बदलती आदतें
इस योजना में हिस्सा ले रहे विद्यार्थियों का अनुभव बताता है कि शुरुआत में उन्हें पुस्तकों के साथ बैठना नीरस और उबाऊ लगता था। हालांकि, नकद इनाम की प्रेरणा ने उन्हें शुरुआत में किताबें हाथ में लेने को विवश किया। धीरे-धीरे जब उन्होंने पन्नों को पढ़ना शुरू किया, तो उनकी स्वाभाविक रुचि जागृत होने लगी। अब कई छात्रों का कहना है कि उन्हें मोबाइल गेम्स अथवा सोशल मीडिया की तुलना में किताबों की दुनिया अधिक ज्ञानवर्धक और मनोरंजक लगने लगी है।

## भविष्य में स्वाभाविक स्वाध्याय की उम्मीद
विद्यालय प्रशासन का मानना है कि नकद प्रोत्साहन केवल एक आरंभिक माध्यम है, जिसके जरिए बच्चों की झिझक तोड़ी जा रही है। इसका अंतिम लक्ष्य किसी वित्तीय लाभ का वितरण करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर स्वाध्याय की एक दीर्घकालिक आदत स्थापित करना है। स्कूल का मानना है कि यदि बालपन में अध्ययन की यह आदत जड़ जमा ले, तो आगे चलकर ये बच्चे किसी भी इनाम या प्रोत्साहन के बिना भी ज्ञानार्जन के लिए स्वतः किताबें पढ़ना जारी रखेंगे। नियमित अध्ययन का यह सकारात्मक असर उनके शैक्षणिक प्रदर्शन और बौद्धिक विकास पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।

## संभावित बजट और आर्थिक विश्लेषण
यदि इस योजना के वित्तीय पक्ष को देखा जाए, तो नामांकित सभी 150 विद्यार्थी अगर औसतन रोजाना 2 घंटे अध्ययन करते हैं, तो एक महीने में कुल प्रोत्साहन राशि लगभग 45 हजार रुपये तक पहुंच सकती है। वहीं, अगर बच्चे अपनी अध्ययन अवधि को बढ़ाकर रोजाना 3 घंटे कर देते हैं, तो यह मासिक खर्च बढ़कर लगभग 67 हजार रुपये हो जाएगा। विद्यालय प्रबंधन के लिए यह राशि कोई व्यय नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को डिजिटल भटकाव से बचाकर पुस्तकों की दुनिया में वापस लाने के लिए किया गया एक सार्थक निवेश है।

## इसका आप पर असर
यह पहल बच्चों में स्क्रीन टाइम घटाकर किताबों के प्रति रुझान बढ़ाने का एक व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करती है।

- **भारत में:** देशभर के अभिभावक और शैक्षणिक संस्थान बच्चों की मोबाइल लत घटाने के लिए वित्तीय या गैर-वित्तीय प्रोत्साहन मॉडल से सीख ले सकते हैं। इससे डिजिटल भटकाव कम कर छात्रों में स्व-अध्ययन की नींव रखी जा सकती है।
- **राजकोट में:** वर्धमाननगर स्थित आरबी स्कूल के कक्षा 3 से 10 तक के 150 छात्र सीधे इस नकद प्रोत्साहन व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं। बच्चों को प्रति घंटे 5 रुपये कमाने के साथ अपनी पसंद की किताबें पढ़ने और स्क्रीन से दूर रहने का मौका मिल रहा है।
- **अभिभावकों के लिए:** माता-पिता को बच्चों के पठन चार्ट पर नियमित हस्ताक्षर करने और उनके अध्ययन की निगरानी करने की जिम्मेदारी निभानी होगी। इससे घर में बच्चों के साथ संवाद बढ़ेगा और उनके डिजिटल स्क्रीन समय पर नियंत्रण पाना आसान होगा।
- **छात्रों के लिए:** विद्यार्थी अपनी पसंदीदा किताबों के माध्यम से प्रति घंटे 5 रुपये और 2 घंटे के 10 रुपये प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें पढ़ी गई सामग्री को याद रखना होगा क्योंकि शिक्षक संबंधित पाठ से सवाल पूछकर ही भुगतान को मंजूरी देंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
बच्चों में स्मार्टफोन और टेलीविजन की लत छुड़ाने तथा किताबों के प्रति रुचि जगाने के उद्देश्य से स्कूल ने यह पहल शुरू की है।

- **डिजिटल स्क्रीन की बढ़ती लत:** बच्चों में मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताने की समस्या लगातार बढ़ रही थी। इस लत को खत्म करने के लिए स्कूल ने किताबों को एक आकर्षक विकल्प के रूप में पेश करने का निर्णय लिया।
- **सकारात्मक प्रोत्साहन की रणनीति:** बिना किसी दबाव के बच्चों को आकर्षित करने के लिए नकद प्रोत्साहन का मॉडल अपनाया गया ताकि पढ़ाई बोझ न लगे। प्रति घंटे 5 रुपये का इनाम छात्रों को स्वेच्छा से पुस्तकें उठाने के लिए प्रेरित करता है।
- **सत्यापन की व्यावहारिक आवश्यकता:** केवल दावों के आधार पर भुगतान से बचने के लिए माता-पिता के हस्ताक्षर और शिक्षकों के मौखिक परीक्षण का तंत्र बनाया गया। इससे सुनिश्चित हुआ कि बच्चे केवल समय बिताने का दिखावा न करें बल्कि वास्तव में ज्ञान अर्जित करें।

## सवाल-जवाब

### 1. राजकोट के स्कूल में किताब पढ़ने पर कितने पैसे मिलते हैं?
छात्रों को एक घंटे किताब पढ़ने पर 5 रुपये और दो घंटे पढ़ने पर 10 रुपये दिए जाते हैं।

### 2. यह योजना किन कक्षाओं के छात्रों के लिए लागू है?
यह योजना कक्षा 3 से लेकर कक्षा 10 तक के लगभग 150 विद्यार्थियों के लिए लागू की गई है।

### 3. क्या बच्चों को कोई खास किताब ही पढ़नी होती है?
नहीं, छात्र अपनी पसंद और सुविधा के अनुसार कोई भी किताब चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।

### 4. स्कूल कैसे जांचता है कि बच्चे ने सच में किताब पढ़ी है?
छात्रों के रीडिंग चार्ट पर माता-पिता के हस्ताक्षर होते हैं और शिक्षक किताब से जुड़े सवाल पूछकर रिकॉर्ड सत्यापित करते हैं।

### 5. यदि सभी 150 बच्चे रोजाना 2 घंटे पढ़ें तो स्कूल का मासिक खर्च कितना होगा?
यदि सभी 150 छात्र रोज 2 घंटे पढ़ते हैं, तो मासिक प्रोत्साहन राशि करीब 45 हजार रुपये तक पहुंच सकती है।

## प्रेरणा और सबक
राजकोट के इस स्कूल का प्रयोग दिखाता है कि रचनात्मक सोच से बच्चों की जटिल आदतों को भी सकारात्मक दिशा में मोड़ा जा सकता है।

- **दबाव के बजाय प्रोत्साहन का महत्व:** बच्चों को डांटने या पाबंदी लगाने के बजाय सकारात्मक रिवॉर्ड देकर उनकी आदतों में बदलाव लाना अधिक प्रभावी होता है। प्रोत्साहन से बच्चे स्वेच्छा से नई और अच्छी आदतें अपनाते हैं।
- **शुरुआती कदम से स्थायी आदत का निर्माण:** किसी भी कठिन कार्य की शुरुआत के लिए छोटे प्रलोभन काम आ सकते हैं, जो बाद में स्वाभाविक रुचि में बदल जाते हैं। जैसे-जैसे बच्चे पढ़ने लगे, उन्हें किताबों में मिलने वाला आनंद खुद आगे ले जाने लगा।
- **जवाबदेही और निष्पक्ष मूल्यांकन:** किसी भी योजना की सफलता कड़े सत्यापन और पारदर्शिता पर निर्भर करती है। माता-पिता और शिक्षकों के साझे प्रयासों से बच्चों में ईमानदारी और स्वाध्याय दोनों का विकास होता है।

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