मंडलेश्वर के 206 साल पुराने जर्जर स्कूल में 400 जिंदगियां दांव पर, हर पल सताता है मौत का डर मध्य प्रदेश के मंडलेश्वर में 206 साल पुरानी एक जर्जर सरकारी स्कूल की इमारत 400 से अधिक छात्रों और शिक्षकों के लिए जानलेवा खतरा बन गई है। 14 साल पहले जर्जर घोषित होने के बावजूद, हर दिन सैकड़ों बच्चे इसी ढहती हुई बिल्डिंग के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। आमतौर पर जब गर्मी के बाद मानसून की पहली बारिश जमीन पर गिरती है, तो बच्चों के चेहरे खुशी से खिल उठते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के मंडलेश्वर में यही बारिश सैकड़ों बच्चों और उनके माता-पिता के मन में गहरी दहशत पैदा कर देती है। यहां के एक प्रतिष्ठित सरकारी हाई सेकेंडरी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र अपनी किताबों, कॉपियों या ब्लैकबोर्ड पर ध्यान लगाने के बजाय, डरी हुई निगाहों से स्कूल की जर्जर छत को लगातार घूरते रहते हैं। जब भी अचानक तेज बारिश शुरू होती है या हवाएं चलती हैं, तो पूरा क्लासरूम खौफ से सहम जाता है। इस स्कूल में नामांकित 380 छात्र, उन्हें पढ़ाने वाले 25 शिक्षक और व्यवस्था संभालने वाले 10 अन्य कर्मचारी हर सुबह इस खौफनाक सवाल के साथ स्कूल के गेट में कदम रखते हैं कि क्या वे आज जिंदा और सुरक्षित वापस अपने घर लौट पाएंगे। यह कोई मनगढ़ंत कहानी या अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि उन 400 से ज्यादा लोगों की खौफनाक रोजमर्रा की हकीकत है जो एक ऐसी इमारत में पढ़ाई और नौकरी करने को मजबूर हैं, जो किसी भी पल एक सामूहिक कब्रगाह में तब्दील हो सकती है। 206 साल पुरानी ब्रिटिश इमारत बन गई है मौत का कुआं शिक्षा के मंदिर के रूप में काम कर रही यह कोई आम आधुनिक कंक्रीट की इमारत नहीं है। यह लगभग 206 साल पुराना एक बेहद ऐतिहासिक ढांचा है, जिसे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान अंग्रेजों ने अपने खास उद्देश्यों के लिए बनवाया था। देश आजाद होने के बाद, साल 1948 से इस विशाल और भव्य परिसर का इस्तेमाल सार्वजनिक शिक्षा के लिए किया जाने लगा। तब से लेकर आज तक, पिछले 78 सालों से यहां लगातार पीढ़ियों को शिक्षित करने के लिए स्कूल संचालित हो रहा है। हालांकि इस इमारत का अपना एक समृद्ध ऐतिहासिक महत्व है, लेकिन वक्त की मार, खराब मौसम और सालों से रखरखाव की भारी कमी ने इसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। आज यह पूरी बिल्डिंग अत्यंत जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है। दीवारों और छतों की हालत इतनी खस्ता हो चुकी है कि किसी भी वक्त एक बड़ा हादसा हो सकता है और पूरी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है। मानसून के दौरान तो यहां के हालात कल्पना से भी ज्यादा बदतर हो जाते हैं। इमारत का ऐसा कोई कोना नहीं बचा है जहां से बारिश का मटमैला पानी सीधा अंदर न टपकता हो। डर को और बढ़ाने के लिए छत से प्लास्टर के बड़े-बड़े टुकड़े अक्सर अचानक नीचे गिर जाते हैं, जिससे हमेशा सिर पर चोट लगने का खतरा बना रहता है। अगर कोई भी व्यक्ति इस स्कूल के गलियारों से गुजरे, तो उसे पुरानी लकड़ियों के चरमराने की खौफनाक आवाजें बिल्कुल साफ सुनाई देती हैं, जो हर पल यह चेतावनी देती हैं कि अब यह जर्जर ढांचा और बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकता है। दीमक, तिरपाल और 12 भारी लोहे के खंभों का सहारा इमारत के विनाश का स्तर सचमुच चौंकाने वाला है। स्कूल के प्रिंसिपल जेके सोनी ने इस जानलेवा संघर्ष की एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है। उन्होंने खुलासा किया है कि छात्रों और स्टाफ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अब इमारत का 95 फीसदी हिस्सा पूरी तरह से ताले में बंद कर दिया गया है। वहां किसी का भी जाना सख्त मना है। ब्रिटिश वास्तुकला की शान रही लकड़ी की विशाल छतें और भारी बीम अब सिर्फ नाम के बचे हैं, क्योंकि दशकों से लग रही दीमक ने उन्हें अंदर से पूरी तरह खोखला करके रख दिया है। बची-खुची इमारत को तुरंत गिरने से बचाने के लिए प्रशासन ने खतरनाक जुगाड़ का सहारा लिया है। मौजूदा समय में सिर्फ प्राचार्य का कक्ष, मुख्य स्टाफ रूम, कंप्यूटर कक्ष और अकाउंट सेक्शन ही किसी तरह काम कर रहे हैं। इन बेहद महत्वपूर्ण कमरों की छतें भी सिर्फ इसलिए टिकी हुई हैं क्योंकि उन्हें सहारा देने के लिए 12 भारी लोहे के खंभों का इस्तेमाल किया गया है। तेज बारिश के दौरान कमरों में पानी भरने और अहम दस्तावेजों, कंप्यूटरों और रिकॉर्ड्स को बर्बाद होने से बचाने के लिए, छत के ऊपर बड़े-बड़े तिरपाल बिछाए गए हैं, ताकि किसी तरह पानी को सीधा अंदर आने से रोका जा सके। 14 सालों की प्रशासनिक लापरवाही और अनदेखी का नतीजा मंडलेश्वर के इस सरकारी स्कूल की यह खौफनाक हालत कोई रातों-रात हुई घटना नहीं है। स्थानीय प्रशासन और संबंधित शिक्षा विभाग इस बड़े खतरे से पूरी तरह वाकिफ हैं। लोक निर्माण विभाग ने आज से 14 साल पहले ही एक विस्तृत निरीक्षण के बाद आधिकारिक तौर पर इस भवन को जर्जर और अनुपयोगी घोषित कर दिया था। उसी वक्त विभाग ने इस पूरी बिल्डिंग को डिस्मेंटल यानी पूरी तरह गिराने की सख्त अनुशंसा की थी, ताकि भविष्य में कोई बड़ी जनहानि न हो। उसी चेतावनी के तुरंत बाद इमारत की ऊपरी मंजिल को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था। काफी लंबे समय तक, स्कूल प्रबंधन ने ग्राउंड फ्लोर के कुछ कमरों में लोहे के मजबूत पाइप लगाकर काम चलाया। लेकिन इस नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत तक नीचे के कमरों की हालत भी इतनी ज्यादा खराब हो गई कि उन्हें भी पूरी तरह बंद करने का कठोर फैसला लेना पड़ा। खतरे की इतनी साफ चेतावनी और नए स्कूल भवन की मंजूरी के लिए शासन तथा वरिष्ठ अधिकारियों को बार-बार लिखे गए दर्जनों पत्रों के बावजूद, अब तक जमीन पर कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। प्रशासनिक फाइलें बस एक मेज से दूसरी मेज तक घूम रही हैं और बच्चों की जान दांव पर लगी है। बच्चों की पढ़ाई और सुनहरे भविष्य पर पड़ रहा है भारी असर इस जर्जर ढांचे का सीधा और बेहद नकारात्मक असर यहां पढ़ने वाले मासूम बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। वर्तमान में इस सरकारी स्कूल में कक्षा 6 से लेकर 12वीं तक के लगभग 380 बच्चे पढ़ रहे हैं, और नए सत्र की प्रवेश प्रक्रिया अभी भी चालू है जिससे यह संख्या और बढ़ सकती है। इनके अलावा 25 समर्पित शिक्षक और 10 कर्मचारी भी इसी बड़े खतरे के साये में अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। चूंकि मुख्य इमारत के विस्तृत क्लासरूम अब बैठने लायक नहीं बचे हैं, इसलिए छात्रों के लिए बेहद अस्थायी और अपर्याप्त व्यवस्था की गई है। 11वीं और 12वीं की अहम कक्षाओं को पास ही में स्थित एक मिडिल स्कूल भवन के महज चार कमरों में शिफ्ट कर दिया गया है। वहीं, छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों की हालत और भी ज्यादा खराब है। उन्हें स्कूल परिसर में ही बाद में बनाए गए कुछ छोटे कमरों में एक साथ ठूंस कर पढ़ाया जा रहा है। जगह की इस भारी कमी के कारण विज्ञान की दो महत्वपूर्ण प्रयोगशालाओं को भी हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। बैठने के लिए पर्याप्त जगह न होना, भीड़भाड़ वाले क्लासरूम और प्रैक्टिकल ज्ञान की भारी कमी, इन बच्चों के शैक्षिक विकास को गंभीर रूप से बाधित कर रही है। हादसे से पहले किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद मंडलेश्वर में मंडरा रहे इस बड़े खतरे के संबंध में जब जनजातीय कार्य विभाग की सहायक आयुक्त कविता आर्य से सीधे बात की गई, तो उन्होंने इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लिया। उन्होंने आधिकारिक तौर पर आश्वासन दिया कि वह तुरंत महेश्वर के ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर से पूरी विस्तृत जानकारी मांगेंगी और वर्तमान स्थिति का बारीकी से जायजा लेंगी। इस बीच, डरे हुए अभिभावकों और स्थानीय लोगों के बीच उम्मीद की एक छोटी सी किरण भी जगी है। ऐसी चर्चा है कि एक नए, आधुनिक और सुरक्षित स्कूल भवन के निर्माण को लेकर जल्द ही शासन स्तर पर कोई बड़ा फैसला लिया जा सकता है। एक प्रस्ताव के मुताबिक, स्कूल के बड़े मैदान में बने एक पुराने और खाली पड़े हॉस्टल को पूरी तरह तोड़कर उसी जगह पर एक नई भव्य बिल्डिंग बनाने की योजना पर विचार चल रहा है। लेकिन जब तक यह सरकारी योजना फाइलों से निकलकर हकीकत नहीं बनती, तब तक 400 जिंदगियों के साथ यह रोज का जुआ बदस्तूर जारी रहेगा। यह सिर्फ एक जर्जर इमारत की कहानी नहीं है, बल्कि उस खोखले सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान है जहां सैकड़ों बच्चों की जिंदगी को रोज खतरे में डाला जा रहा है। हर कोई अब सिर्फ इसी उम्मीद में बैठा है कि शिक्षा का यह मंदिर किसी बड़े और दर्दनाक हादसे का कारण बनने से पहले, बच्चों को एक सुरक्षित छत नसीब हो जाए। इसका आप पर असर • मध्य प्रदेश में: सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे की जर्जर स्थिति राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाती है, जिससे दूरदराज के इलाकों में बच्चों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। • खरगोन में: मंडलेश्वर और आसपास के अभिभावकों के लिए यह एक बड़ी चिंता है, क्योंकि उनके बच्चों को मजबूरी में जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ रहा है। सवाल-जवाब 1. मंडलेश्वर का यह सरकारी स्कूल कितना पुराना है? यह स्कूल भवन लगभग 206 साल पुराना है, जिसे ब्रिटिश काल में बनवाया गया था और 1948 से यहां स्कूल चल रहा है। 2. स्कूल में कितने लोगों की जान खतरे में है? स्कूल में कक्षा 6 से 12वीं तक के 380 छात्र, 25 शिक्षक और 10 अन्य कर्मचारी यानी कुल 400 से ज्यादा लोगों की जान खतरे में है। 3. इमारत को सुरक्षित रखने के लिए क्या जुगाड़ किया गया है? जर्जर छतों को सहारा देने के लिए 12 भारी लोहे के खंभे लगाए गए हैं और बारिश का पानी रोकने के लिए छतों पर तिरपाल बिछाए गए हैं। 4. प्रशासन ने इस इमारत को लेकर क्या कार्रवाई की है? लोक निर्माण विभाग ने 14 साल पहले ही इसे जर्जर घोषित कर गिराने की सिफारिश की थी, लेकिन अब तक नई इमारत के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। https://trendkia.com/education/mandleshwar-ke-206-sala-purane-jarjara-skula-men-400-jindagiyan-danva-para-hara-pala-satata-hai-mauta-ka-dara-9304 TrendKia — Har trend, sabse pehle.