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  "title": "उत्तर प्रदेश के मऊ में बोरे का बस्ता और टाट-पट्टी की पढ़ाई, बदहाली के बीच सपने संजो रहे प्राथमिक स्कूल के छात्र",
  "summary": "मऊ जिले के मधुबन क्षेत्र स्थित हरिजन मिश्रित प्राइमरी पाठशाला में मूलभूत सुविधाओं के अभाव और जर्जर भवन के बावजूद बच्चे पढ़ाई के प्रति समर्पित हैं। आर्थिक तंगी से जूझते दलित परिवारों के छात्र शिक्षा के जरिए अपना भविष्य सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।",
  "content": "एक तरफ जहां देश भर में प्राथमिक शिक्षा को आधुनिक और डिजिटल बनाने की मुहिम चलाई जा रही है, वहीं ग्रामीण इलाकों के कई विद्यालयों में आज भी बुनियादी जरूरतों का भारी अभाव देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में स्थित एक प्राथमिक विद्यालय ऐसा भी है, जहां बच्चे बेहद कठिन परिस्थितियों और संसाधनों की कमी के बीच शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यहां पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर और दलित परिवारों से आते हैं, जिनके लिए स्कूल में मिलने वाली शिक्षा और दोपहर का भोजन ही आगे बढ़ने का एकमात्र संबल बना हुआ है।\n\nअभावों के बीच शिक्षा हासिल करने की ललक\nमऊ जनपद के मधुबन तहसील क्षेत्र अंतर्गत खैरा देवारा दुबारी में स्थित हरिजन मिश्रित प्राइमरी पाठशाला की स्थिति काफी चिंताजनक है। इस विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को बुनियादी फर्नीचर तक नसीब नहीं है और वे आज भी जमीन पर टाट बिछाकर बैठने को विवश हैं। विद्यालय की एक छात्रा ने अपनी स्थिति साझा करते हुए बताया कि उसका परिवार दलित समुदाय से आता है और उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वे किसी निजी अथवा महंगे स्कूल का खर्च वहन करने में असमर्थ हैं। इसी मजबूरी के कारण वह इस सरकारी विद्यालय में पढ़ाई कर रही है। हालांकि, तमाम कठिनाइयों के बावजूद इस छात्रा का सपना है कि वह बेहतर शिक्षा हासिल करे ताकि भविष्य में अपने परिवार को गरीबी और सामाजिक भेदभाव के दौर से बाहर निकाल सके।\n\nप्लास्टिक के बोरे से बना बस्ता और गरीबी की हकीकत\nविद्यालय में अध्ययनरत एक अन्य छात्रा की कहानी भी बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर करती है। परिवार की बेहद खराब आर्थिक स्थिति के कारण उसके पास स्कूल जाने के लिए यूनिफॉर्म और कॉपी-किताबें रखने के लिए बस्ता तक उपलब्ध नहीं है। सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने के बाद भी उसकी दैनिक जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में छात्रा की मां ने घरेलू स्तर पर ही प्लास्टिक के एक बोरे को सिलकर उसके लिए बस्ता तैयार कर दिया। वह इसी बोरे से बने बस्ते में अपनी कॉपियां और किताबें रखकर प्रतिदिन स्कूल आती है। छात्रा का कहना है कि यदि उसके परिवार की माली हालत ठीक होती, तो वह किसी बेहतर सुविधाओं वाले विद्यालय में दाखिल होती, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वह इसी व्यवस्था में पढ़ाई करने को मजबूर है।\n\nजर्जर भवन और बाहर पढ़ाई कराने की मजबूरी\nविद्यालय में अध्यापन कार्य की जिम्मेदारी तीन शिक्षकों पर है। ये शिक्षक नियमित रूप से विद्यालय पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते हैं। विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक तारकेश्वर के अनुसार, शासन स्तर से जो भी सुविधाएं या सामग्री प्राप्त होती हैं, उन्हें बच्चों तक पहुंचाया जाता है। वर्तमान में छात्रों को पाठ्य पुस्तकें, कॉपियां और मिड डे मील उपलब्ध कराया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि विद्यालय की इमारत काफी जर्जर हो चुकी है। भवन की दयनीय स्थिति के कारण बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई बार कक्षाओं का संचालन भवन के बाहर खुले मैदान में करना पड़ता है।\n\nशिक्षा के माध्यम से गरीबी और भेदभाव मिटाने का सपना\nसंसाधनों की घोर कमी और जर्जर बुनियादी ढांचे के बावजूद विद्यालय का स्टाफ छात्रों के मार्गदर्शन में जुटा हुआ है। शिक्षकों का प्रयास है कि विपरीत परिस्थितियों के बाद भी बच्चे अपनी पढ़ाई से दूर न हों। दूसरी ओर, विद्यार्थी भी अपनी आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों को आड़े न आने देने का संकल्प लिए हुए हैं। इन बच्चों का मानना है कि केवल शिक्षा ही वह मार्ग है जिसके जरिए वे अपनी गरीबी, विषमता और भेदभाव को समाप्त कर समाज में एक सम्मानजनक स्थान हासिल कर सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: देश के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में प्राथमिक शिक्षा के ढांचे को मजबूत करने तथा वंचित वर्गों तक समान सुविधाएं पहुंचाने की जरूरत रेखांकित होती है।\n\nमऊ (उत्तर प्रदेश) में: स्थानीय स्तर पर जर्जर सरकारी स्कूल भवनों की मरम्मत और गरीब छात्रों को बुनियादी पाठ्य सामग्री समय पर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह मामला किस जिले और स्कूल का है?\nयह मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की मधुबन तहसील स्थित खैरा देवारा दुबारी के हरिजन मिश्रित प्राइमरी पाठशाला का है।\n\n2. स्कूल के बच्चों को पढ़ाई के दौरान किन मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?\nछात्रों को बैठने के लिए टाट-पट्टी का सहारा लेना पड़ता है, स्कूल का भवन जर्जर है और कई बच्चों के पास स्कूल बैग व यूनिफॉर्म खरीदने के पैसे नहीं हैं।\n\n3. बैग न होने पर एक छात्रा की मां ने क्या उपाय निकाला?\nछात्रा के पास बैग न होने पर उसकी मां ने घर पर ही प्लास्टिक के बोरे को सिलकर उसके लिए बस्ता बनाया।\n\n4. स्कूल में कितने शिक्षक नियुक्त हैं और प्रभारी प्रधानाध्यापक कौन हैं?\nस्कूल में तीन शिक्षक नियुक्त हैं और इसके प्रभारी प्रधानाध्यापक तारकेश्वर हैं।\n\n5. जर्जर भवन के कारण पढ़ाई किस तरह प्रभावित होती है?\nभवन की हालत खराब होने के कारण सुरक्षा के लिहाज से बच्चों को अक्सर बाहर बैठाकर पढ़ाना पड़ता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nकठिन परिस्थितियों से प्रेरणा:\n\n• शिक्षा ही बदलाव का माध्यम: अभावों और गरीबी के बावजूद शिक्षा को ही अपनी स्थिति बदलने का सबसे बड़ा साधन मानना।\n• संसाधनों से ऊपर हौसला: महंगे बैग या सुविधाओं की कमी के बाद भी घर पर बने बोरे के बस्ते जैसे नवाचार से पढ़ाई जारी रखना।\n• दृढ़ इच्छाशक्ति: सामाजिक और आर्थिक बाधाओं के सामने हार न मानकर अपने सपनों को पूरा करने का संकल्प बनाए रखना।",
  "url": "https://trendkia.com/education/uttar-pradesh-ke-mau-men-bore-ka-basta-aura-tata-patti-ki-parhai-badahali-ke-bicha-sapane-snjo-rahe-prathamika-skula-ke-chhatra-16881",
  "category": "शिक्षा",
  "publishedAt": "2026-08-15",
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