1975 में शोले के बीच रिलीज हुई गीत गाता चल, पहले 3 दिन खाली रहे थिएटर और फिर चौथे दिन से बिके ब्लैक में टिकट साल 1975 में आई फिल्म 'गीत गाता चल' की शुरुआत काफी कमजोर रही थी और पहले तीन दिनों तक सिनेमाघर खाली पड़े थे। हालांकि, चौथे दिन से अचानक दर्शकों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि टिकट तक ब्लैक में बिकने लगे और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता बन गई। सिनेमा जगत में साल 1975 को बेहद ऐतिहासिक माना जाता है। इसी दौरान 'शोले', 'दीवार', 'जय संतोषी मां', 'चुपके चुपके' और 'खुशबू' जैसी फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। बड़े सितारों और भारी-भरकम बजट वाली इन फिल्मों के बीच एक ऐसी कम बजट की फिल्म भी सिनेमाघरों में उतरी, जिसके भविष्य को लेकर किसी को भी कोई उम्मीद नहीं थी। थिएटर मालिकों को यह अंदाजा तक नहीं था कि यह फिल्म आगे चलकर दर्शकों की पहली पसंद बन जाएगी। स्थिति यह थी कि रिलीज के शुरुआती तीन दिनों तक सिनेमाघर में दर्शक उंगलियों पर गिने जा सकते थे, लेकिन फिर अचानक हवा का रुख बदला और सिनेमाघरों के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई। जिस फिल्म को सिर्फ सात दिनों के लिए थिएटर्स में जगह मिली थी, वह आगे चलकर लंबी रेस का घोड़ा साबित हुई और यह फिल्म 'गीत गाता चल' थी। राजकुमार बड़जात्या का भरोसा और मेट्रो थिएटर की चुनौती 'गीत गाता चल' को बनकर तैयार होने में लगभग एक साल का लंबा समय लगा था। फिल्म के निर्माता राजकुमार बड़जात्या को अपनी इस प्रस्तुति पर पूरा भरोसा था, लेकिन इसे बड़े पर्दे तक पहुंचाना आसान काम नहीं था। राजकुमार बड़जात्या की इच्छा थी कि यह फिल्म मुंबई के जाने-माने मेट्रो थिएटर में रिलीज हो। उन्होंने थिएटर के प्रबंधन से लंबी चर्चा की और फिल्म के लिए दोपहर 12 बजे, 3 बजे, शाम 6 बजे और रात 9 बजे के शोज तय करने की योजना बनाई। हालांकि, मेट्रो थिएटर के लोगों को फिल्म की अवधि और पैमाना काफी छोटा लग रहा था। उनके मन में यही सवाल था कि इतनी छोटी फिल्म को वे मेट्रो जैसे प्रतिष्ठित और बड़े थिएटर में कैसे जगह दे सकते हैं। सिनेमाघर प्रबंधन की हिचकिचाहट और सात दिन का मौका पुराने और आपसी रिश्तों का लिहाज रखते हुए थिएटर प्रबंधन ने फिल्म को केवल सात दिनों के लिए लगाने पर अपनी सहमति जताई। उस वक्त थिएटर से जुड़े लोगों का साफ मानना था कि यह फिल्म ज्यादा दिनों तक बॉक्स ऑफिस पर टिक नहीं पाएगी। थिएटर के मैनेजर अल्वा के विशेष आग्रह पर वहां के मालिक ने फिल्म को सिनेमाघर में प्रदर्शित करने की मंजूरी दे दी थी। फिल्म के मुख्य अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने राजश्री को दिए गए अपने एक पुराने साक्षात्कार में इस दौर का जिक्र करते हुए बताया था कि जब फिल्म सिनेमाघरों में उतरी, तो शुरुआती नजारा बेहद निराशाजनक और हताश करने वाला था। खाली पड़े शुरुआती तीन दिन और बंद होने की कगार रिलीज के पहले दिन थिएटर में इतने कम दर्शक पहुंचे कि उन्हें आसानी से उंगलियों पर गिना जा सकता था। थिएटर के मैनेजर अल्वा साहब का रवैया भी ऐसा ही था, जिन्हें पहले से ही यह अंदेशा था कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित होगी। उनके मन में लगातार यही सवाल घूम रहा था कि आखिर इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघर में कौन आएगा। शुक्रवार से लेकर रविवार तक के तमाम शोज में हॉल लगभग खाली ही नजर आए। हालात इतने बिगड़ चुके थे कि अंततः यह तय कर लिया गया कि गुरुवार को 'गीत गाता चल' का आखिरी शो होगा। इसका मतलब यह था कि फिल्म को जो सात दिन का मोहलत भरा मौका दिया गया था, उसके तुरंत बाद इसे उतारने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। सोमवार को आया हैरान करने वाला यूटर्न लेकिन जैसे ही सोमवार का दिन आया, पूरी तस्वीर और कहानी ही पलट गई। सोमवार को दोपहर 12 बजे वाले शो में अचानक लगभग 50 फीसदी दर्शक हॉल में पहुंच गए। इसके बाद दोपहर 3 बजे के शो में दर्शकों की संख्या बढ़कर 75 फीसदी तक जा पहुंची और शाम 6 बजे तक आते-आते थिएटर खचाखच भर चुका था। रात 9 बजे का शो तो पूरी तरह से ओवरपैक हो गया। स्थिति इतनी विकट हो गई कि कई दर्शकों को टिकट ही नहीं मिल पाया और उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ा। जिस फिल्म को महज कुछ ही दिन पहले पूरी तरह फ्लॉप मान लिया गया था, उसके टिकटों के लिए अब जबरदस्त मारामारी शुरू हो चुकी थी। मंगलवार का सूरज उगते-उगते तो हालात और भी ज्यादा चौंकाने वाले हो गए, क्योंकि सिनेमाघर के बाहर टिकट ब्लैक में बिकने लगे। दर्शकों की भारी भीड़ और सचिन पिलगांवकर का अनुभव सिनेमाघर के प्रबंधन ने जब इतनी भारी भीड़ को उमड़ते देखा, तो वे पूरी तरह हैरान रह गए। आखिरकार यह निर्णय लिया गया कि फिल्म को दो हफ्ते और ज्यादा समय के लिए बढ़ाया जाए। दूसरे हफ्ते तक आते-आते मैनेजर अल्वा साहब की हालत बिल्कुल बदल चुकी थी। जिस फिल्म को लेकर वे शुरुआत में यह मानकर चल रहे थे कि वह टिक नहीं पाएगी, उसी फिल्म की भारी-भरकम भीड़ को संभालना अब उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। इस अप्रत्याशित सफलता के बीच सचिन पिलगांवकर ने एक बेहद दिलचस्प वाकया साझा किया। एक दिन निर्माता राजकुमार बड़जात्या का फोन उनके पास आया और उन्होंने पूछा कि क्या आपने 'गीत गाता चल' देख ली है? सचिन ने बड़े अचरज के साथ जवाब दिया कि फिल्म तो उन्होंने खुद बनाई है। तब राजकुमार बड़जात्या ने स्पष्ट किया कि वे उस फिल्म की बात नहीं कर रहे जो उन्होंने बनाई है, बल्कि उस फिल्म का जिक्र कर रहे हैं जिसे दर्शक देख रहे हैं। दर्शकों के बीच बैठकर अनुभव लेना इसके बाद उन्होंने सचिन पिलगांवकर और सारिका को अपने पास बुलाया और दोनों को साथ लेकर मेट्रो थिएटर पहुंच गए। वहां मौजूद दर्शकों को ऐसा लगा कि शायद फिल्म के कलाकार अपने फैंस से मिलने आए हैं। लेकिन सचिन और सारिका का उद्देश्य वहां कुछ और ही था। दोनों की सीटें पहले से ही आरक्षित थीं और वे चुपचाप वहां बैठकर सिर्फ आम दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को महसूस कर रहे थे। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी बेहद सीधी, सरल, पारिवारिक और भावनात्मक कहानी थी, जिसके साथ उसके बेहतरीन गीत मजबूती से जुड़े हुए थे। इस कहानी में आपसी रिश्तों, मासूमियत, गहरे प्रेम और अटूट आस्था का ऐसा अनूठा संगम था, जो सीधे तौर पर हर आम इंसान के दिल को छू लेता था। फिल्म के मधुर गीत इस पूरी कथा को और आगे बढ़ाते चले जाते थे। श्याम भजन पर गूंजा पूरा थिएटर हॉल सचिन ने यह भी बताया कि जब सिनेमाघर के अंदर 'राधा का भी श्याम वो तो मीरा का भी श्याम' भजन बजा, तो वहां मौजूद दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने लायक थी। गाना शुरू होते ही दर्शक अपनी सीटों से खड़े हो गए और पूरा थिएटर हॉल कृष्ण भक्ति के माहौल में डूब गया। सचिन के लिए वह पल उनके जीवन के सबसे खास और यादगार पलों में से एक था। उन्होंने इस बात को गहराई से महसूस किया कि उस दिन केवल उनकी फिल्म को ही नहीं, बल्कि खुद उन्हें भी जनता ने अपने दिल से स्वीकार कर लिया था। छोटे बजट की फिल्म की बड़ी सीख 'गीत गाता चल' की यह कामयाबी इसलिए भी सबसे अलग और खास थी क्योंकि इसकी शुरुआत किसी बड़े बवंडर या आंधी की तरह नहीं हुई थी। इस फिल्म ने बेहद धीमी शुरुआत के बाद धीरे-धीरे दर्शकों का अटूट भरोसा जीता। इसकी सीधी कहानी ने परिवारों को आपस में जोड़ा, शानदार संगीत ने एक जादुई माहौल तैयार किया और वर्ड ऑफ माउथ पब्लिसिटी ने इसे आसमान पर पहुंचा दिया। जिस फिल्म को रिलीज होने से पहले महज एक 'छोटी फिल्म' बताकर मेट्रो जैसे बड़े थिएटर में लगाने को लेकर तमाम तरह के शक जताए गए थे, उसी फिल्म के लिए कुछ ही दिनों बाद टिकटों की भयंकर किल्लत हो गई। पहले तीन दिन तक पूरी तरह खाली रहने वाले शो चौथे दिन से हाउसफुल होने लगे और सिनेमाघरों के बाहर टिकट ब्लैक में बिकने लगे। बड़े-बड़े सितारों और भारी भरकम बजट वाली फिल्मों के बीच इस छोटी फिल्म ने यह साबित कर दिखाया कि बॉक्स ऑफिस पर कभी भी विज्ञापनों का शोर या स्टार पावर नहीं चलती, बल्कि केवल दर्शकों का सच्चा दिल ही फैसला करता है। इसका आप पर असर पुरानी क्लासिक फिल्मों के ऐतिहासिक सफर और बॉक्स ऑफिस ट्रेंड्स को समझने वाले दर्शकों और सिनेमा प्रेमियों के लिए यह जानकारी फिल्मी इतिहास के अनछुए पहलुओं को सामने रखती है। • देशभर में: यह किस्सा साबित करता है कि किसी भी फिल्म की सफलता के लिए बड़ा बजट या स्टार पावर होना ही जरूरी नहीं है, बल्कि मजबूत कहानी और मौखिक प्रचार किसी भी फिल्म की तकदीर बदल सकते हैं। • मुंबई में: ऐतिहासिक मेट्रो थिएटर जैसे प्रतिष्ठित सिनेमाघरों के पुराने दौर और वहां के टिकटिंग इतिहास की यह दुर्लभ झलक स्थानीय सिनेमा संस्कृति को गहराई से दर्शाती है। सवाल-जवाब 1. फिल्म 'गीत गाता चल' किस वर्ष रिलीज हुई थी? यह फिल्म साल 1975 में रिलीज हुई थी। 2. 'गीत गाता चल' के निर्माता कौन थे? इस फिल्म के निर्माता राजकुमार बड़जात्या थे। 3. फिल्म में मुख्य अभिनेता के रूप में किसने काम किया था? फिल्म में मुख्य अभिनेता की भूमिका सचिन पिलगांवकर ने निभाई थी। 4. फिल्म के शुरुआती तीन दिनों में सिनेमाघरों का क्या हाल था? शुरुआती तीन दिनों तक थिएटर में दर्शक उंगलियों पर गिने जा सकते थे और हॉल लगभग खाली पड़े थे। 5. सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ किस दिन से उमड़नी शुरू हुई थी? रिलीज के चौथे दिन यानी सोमवार को अचानक सिनेमाघरों में भारी भीड़ पहुंचनी शुरू हो गई थी। 6. फिल्म का कौन सा भजन दर्शकों के बीच सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ? 'राधा का भी श्याम वो तो मीरा का भी श्याम' भजन दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुआ। https://trendkia.com/entertainment/1975-men-sholay-ke-bicha-rilija-hui-geet-gaata-chal-pahale-3-dina-khali-rahe-theater-aura-phira-chauthe-dina-se-bike-black-men-tic-27497 TrendKia — Har trend, sabse pehle.