धर्मेंद्र के चुलबुले अंदाज और राजेश खन्ना की देरी पर जया प्रदा ने खोले पुराने राज जया प्रदा ने एक टेलीविजन शो में पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि धर्मेंद्र सबसे ज्यादा फ्लर्ट करते थे और राजेश खन्ना सेट पर रात को पहुंचते थे। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर के पर्दे के पीछे के किस्से सिनेमा प्रेमियों को हमेशा आकर्षित करते हैं। मशहूर अभिनेत्री जया प्रदा ने एक टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान बीते जमाने के दिग्गज अभिनेताओं के कामकाज के तौर-तरीकों और अपने शुरुआती संघर्ष से जुड़े कई रोचक संस्मरण साझा किए। सोशल मीडिया पर दोबारा चर्चा में आए इस प्रसंग में उन्होंने उस दौर के सह-कलाकारों के स्वभाव, सेट पर उनके आने के समय और खुद के बेहद व्यस्त कामकाजी दिनचर्या का विस्तृत ब्योरा दिया। सह-कलाकारों का मिजाज और सेट पर पहुंचने की आदतें सिनेमा जगत में जितेंद्र, ऋषि कपूर और राजेश खन्ना जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुकीं और बाद में राजनीति का रुख करने वाली जया प्रदा एक बार राज बब्बर के साथ 'द कपिल शर्मा शो' में अतिथि के रूप में शामिल हुई थीं। बातचीत के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि उस दौर में सबसे ज्यादा फ्लर्ट कौन सा अभिनेता करता था, तो अभिनेत्री पहले तो थोड़ी झिझकीं, लेकिन फिर मुस्कुराते हुए उन्होंने धर्मेंद्र का नाम लिया। इस बेबाक जवाब को सुनकर वहां मौजूद दर्शक और साथी कलाकार अपनी हंसी नहीं रोक पाए। इसी बातचीत को आगे बढ़ाते हुए जब उनसे सेट पर सबसे देर से पहुंचने वाले कलाकार के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के राजेश खन्ना का नाम लिया। इस खुलासे के साथ ही उन्होंने दोनों कलाकारों के काम करने की भिन्न कार्यशैली को भी सामने रखा। सुबह की तैयारी और रात को शूटिंग की चुनौती दक्षिण भारतीय सिनेमा से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाली जया प्रदा ने बताया कि उन्हें सुबह तड़के सेट पर पहुंचने का अनुशासन सिखाया गया था। वह सामान्यतः सुबह 7 बजे तक शूटिंग स्थल पर पहुंच जाया करती थीं। मुंबई में काम करते समय जब उन्हें सुबह 9 बजे का कॉल टाइम मिलता था, तो वह समय से पहुंचकर अपना पूरा मेकअप और परिधान तैयार कर लेती थीं। इसके विपरीत, राजेश खन्ना अक्सर काफी देर से आते थे और कई बार वह रात करीब 8 बजे सेट पर कदम रखते थे। जया प्रदा के अनुसार, सेट पर आने के बाद राजेश खन्ना पहले वड़ा पाव खाते थे, उसके बाद केवल एक शॉट फिल्माते थे और रात 9 बजे के आसपास काम समेटकर पैक-अप कर दिया जाता था। दिनभर तैयार होकर इंतजार करने के बाद इस तरह की कार्यशैली का सामना करना उनके लिए एक अनोखा और असहज अनुभव रहता था। पांच शिफ्टों का काम और थका देने वाला सफर अपने करियर के शुरुआती दौर को याद करते हुए जया प्रदा ने उस समय की शारीरिक और मानसिक चुनौतियों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने खुलासा किया कि वह एक ही दिन में पांच अलग-अलग शिफ्टों में काम किया करती थीं, जिसके कारण उन्हें बिना रुके एक लोकेशन से दूसरी लोकेशन की यात्रा करनी पड़ती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म 'शराबी' के निर्माण के दिनों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उनका यात्रा कार्यक्रम कितना थका देने वाला होता था। वह शाम को ऊटी से ट्रेन लेकर चेन्नई पहुंचती थीं। चेन्नई हवाई अड्डे पर स्नान करने के बाद वह अगली उड़ान पकड़ती थीं और यात्रा के दौरान ही अपना मेकअप पूरा करती थीं। इसके बाद कोयंबटूर पहुंचकर वह सीधे शूटिंग स्थल पर काम शुरू करती थीं। उन दिनों आधुनिक सुविधाओं के अभाव में लगातार यात्रा करते हुए कई परियोजनाओं को संभालना बेहद कठिन काम था। इसका आप पर असर सिनेमा के प्रशंसकों के लिए यह संस्मरण बीते दौर के फिल्मी कामकाज की असलियत और अभिनेत्रियों के कठिन परिश्रम को समझने का जरिया है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह जानकारी दर्शाती है कि पुराने दौर की चकाचौंध के पीछे कलाकारों को अत्यधिक थका देने वाली दिनचर्या से गुजरना पड़ता था। दर्शक अब समझ सकते हैं कि आधुनिक वैनिटी वैन और सुविधाओं के बिना उस दौर की अभिनेत्रियों ने कितनी मेहनत से यादगार फिल्में दीं। • कलाकारों और कामगारों के लिए: समय की पाबंदी और शिफ्ट प्रबंधन के इस उदाहरण से कार्य संस्कृति का बड़ा अंतर समझ आता है। वर्तमान दौर में तयशुदा कॉन्ट्रैक्ट्स और समय सीमा के चलते ऐसी अव्यवस्थाओं पर काफी हद तक रोक लगी है। • उद्योग में बदलाव: यह विवरण दिखाता है कि तकनीकी सुविधाओं के अभाव में लगातार अंतरराज्यीय सफर करके काम करना कितना चुनौतीपूर्ण था। आज की पीढ़ी की अभिनेत्रियों को पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित यात्रा और शूटिंग के माहौल का लाभ मिलता है। • पुराने दौर की यादें: दर्शकों को लोकप्रिय सितारों के मानवीय स्वभाव और उनकी कार्यशैली के रोचक पहलुओं को जानने का अवसर मिलता है। इससे पुरानी क्लासिक फिल्मों को दोबारा देखने का नजरिया और गहरा होता है। ऐसा क्यों हुआ यह घटनाक्रम एक पुराने टेलीविजन इंटरव्यू के वीडियो के सोशल मीडिया पर पुनः प्रसारित होने के कारण चर्चा में आया, जिसमें अभिनेत्री ने पुराने कामकाजी अनुभवों का खुलासा किया था। • सोशल मीडिया पर वीडियो का चलन: 'द कपिल शर्मा शो' का पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर दोबारा साझा होने से यह प्रसंग फिर से चर्चा का विषय बन गया। पुराने दौर के सितारों से जुड़े अप्रत्याशित किस्से दर्शकों के बीच हमेशा उत्सुकता जगाते हैं। • कामकाजी संस्कृतियों का अंतर: दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में सुबह जल्दी काम शुरू करने की सख्त परंपरा थी, जबकि उस दौर के बॉम्बे सिनेमा में कुछ बड़े सितारे अपने मनमुताबिक समय पर आते थे। इसी भिन्नता के कारण जया प्रदा को सुबह से रात तक सेट पर इंतजार करना पड़ा। • अत्यधिक काम का दबाव: शीर्ष कलाकारों की भारी मांग के कारण एक ही समय में कई फिल्मों की शूटिंग स्वीकार की जाती थी। निर्माताओं की तारीखों को पूरा करने के लिए कलाकारों को बिना विश्राम किए रेल और हवाई यात्राओं के बीच अपनी शिफ्ट पूरी करनी पड़ती थी। सवाल-जवाब 1. जया प्रदा ने सबसे ज्यादा फ्लर्ट करने वाला अभिनेता किसे बताया? जया प्रदा ने मुस्कुराते हुए धर्मेंद्र को उस दौर का सबसे ज्यादा फ्लर्ट करने वाला अभिनेता बताया। 2. सेट पर सबसे देर से कौन सा अभिनेता पहुंचता था? जया प्रदा के अनुसार, राजेश खन्ना सेट पर सबसे ज्यादा देर से आते थे और कई बार वह रात 8 बजे पहुंचते थे। 3. राजेश खन्ना सेट पर आने के बाद क्या करते थे? वह सेट पर आकर पहले वड़ा पाव खाते थे, फिर केवल एक शॉट देते थे और रात करीब 9 बजे काम खत्म कर देते थे। 4. जया प्रदा के सेट पर पहुंचने का सामान्य समय क्या होता था? दक्षिण के अनुशासन के कारण वह सुबह 7 बजे पहुंच जाती थीं और मुंबई में 9 बजे के कॉल टाइम पर पूरी तरह तैयार रहती थीं। 5. फिल्म 'शराबी' के समय जया प्रदा का यात्रा कार्यक्रम कैसा था? वह ऊटी से ट्रेन लेकर चेन्नई जाती थीं, एयरपोर्ट पर नहाकर फ्लाइट में मेकअप करती थीं और फिर कोयंबटूर पहुंचकर शूटिंग करती थीं। प्रेरणा और सबक जया प्रदा का यह सफर दिखाता है कि लगन, कठिन शारीरिक परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखकर ही लंबे समय तक सफलता कायम रखी जा सकती है। • कठिन दिनचर्या से न घबराना: दिन में पांच-पांच शिफ्ट करना और यात्रा के दौरान ही तैयार होना उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विपरीत और थकाऊ हालातों में भी काम को प्राथमिकता देना सफलता की बुनियादी शर्त है। • धैर्य और पेशेवर अनुशासन: सुबह से रात तक इंतजार करने के बावजूद विचलित हुए बिना काम पूरा करना पेशेवर परिपक्वता दिखाता है। कार्यस्थल पर दूसरों के तौर-तरीकों के बीच अपनी एकाग्रता बनाए रखना जरूरी होता है। • शुरुआती संघर्ष को स्वीकारना: दक्षिण से मुंबई आकर भाषाई और सांस्कृतिक अंतर के बीच खुद को स्थापित करना आसान नहीं था। नई परिस्थितियों में ढलकर निरंतर प्रयास करते रहना हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का सबक देता है। https://trendkia.com/entertainment/dharmendra-ke-chulabule-andaja-aura-rajesh-khanna-ki-deri-para-jaya-prada-ne-khole-purane-raja-35426 TrendKia — Har trend, sabse pehle.