गुजराती फिल्मों के शहंशाह से बॉलीवुड के खूंखार विलेन तक, राकेश रोशन ने कैसे बदल दी थी किरण कुमार की किस्मत हिंदी सिनेमा में दिग्गज अभिनेता जीवन के बेटे किरण कुमार ने अपने हुनर के दम पर 300 से अधिक फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में अमिट छाप छोड़ी है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपने किरदारों से पर्दे पर ऐसा जादू बिखेरा कि दर्शक उन्हें कभी भुला नहीं पाए। इन्हीं में से एक नाम किरण कुमार का है, जिनकी अदाकारी और चेहरे के भाव हर किरदार में जान फूंक देते हैं। 20 अक्टूबर 1953 को मुंबई में जन्मे किरण कुमार ने पर्दे पर न सिर्फ विलेन के तौर पर खौफ पैदा किया, बल्कि पिता और पारिवारिक किरदारों में दर्शकों की आंखें भी नम कीं। दशकों लंबे सफर में उन्होंने विभिन्न भाषाओं की 300 से अधिक फिल्मों में काम किया है और आज भी अभिनय जगत में पूरी मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कला से जुड़े प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था जन्म किरण कुमार का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां कला, रंगमंच और सिनेमा को बेहद करीब से जिया जाता था। उनके पिता ओंकारनाथ धर थे, जिन्हें पूरा देश और हिंदी फिल्म जगत मशहूर अभिनेता जीवन के नाम से जानता है। पिता की अदाकारी का असर किरण कुमार पर भी पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी राह खुद तैयार की। अपनी स्कूली शिक्षा उन्होंने मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित डेली कॉलेज से पूरी की। इसके बाद उन्होंने मुंबई के आरडी नेशनल कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अभिनय के प्रति गंभीर रुझान होने के कारण उन्होंने पुणे स्थित प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) का रुख किया, जहां उन्होंने अभिनय की बारीकियों और तकनीकी पहलुओं का गहन प्रशिक्षण हासिल किया। बाल कलाकार से मुख्य अभिनेता तक का सफर सिनेमा की दुनिया में किरण कुमार की यात्रा बेहद कम उम्र में ही शुरू हो गई थी। साल 1960 में रिलीज हुई फिल्म ‘लव इन शिमला’ में उन्होंने एक नन्हे बाल कलाकार के रूप में अपनी पहली भूमिका निभाई थी। इसके वर्षों बाद, 1974 में रिलीज हुई फिल्म ‘आजाद मोहब्बत’ में वह बतौर मुख्य अभिनेता बड़े पर्दे पर सामने आए। उन्होंने अपनी शुरुआती फिल्मों में नायक और विभिन्न शेड्स वाले किरदारों में काम किया। हालांकि उस दौर में बॉलीवुड के कड़े मुकाबले के बीच खुद को स्थापित करना आसान नहीं था। ‘जंगल में मंगल’ जैसी फिल्मों के आने के बाद एक ऐसा समय भी आया जब उन्हें मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में मनमुताबिक काम मिलना कम हो गया। गुजराती सिनेमा में बने महानायक और मिला नया मुकाम जब हिंदी सिनेमा में उनके सामने करियर की रफ्तार धीमी पड़ने की चुनौती आई, तब उन्होंने निराश होकर बैठने के बजाय अपनी ऊर्जा को क्षेत्रीय सिनेमा की ओर मोड़ दिया। किरण कुमार ने गुजराती सिनेमा में कदम रखा और वहां अपनी प्रतिभा का ऐसा परचम लहराया जिसकी मिसाल दी जाती है। उन्होंने गुजराती फिल्मों में एक के बाद एक कई सुपरहिट फिल्में दीं। उनकी लोकप्रियता और पर्दे पर दबदबा इस कदर बढ़ गया कि लोग उन्हें सम्मान से ‘गुजराती सिनेमा का बच्चन’ कहने लगे। गुजराती फिल्मों के इस सुनहरे दौर ने न केवल उनके करियर को नई ऊर्जा और पहचान दी, बल्कि उन्हें एक मंजे हुए अभिनेता के रूप में स्थापित भी किया। राकेश रोशन की फिल्म और बॉलीवुड में धमाकेदार वापसी गुजराती सिनेमा में भारी सफलता हासिल करने के बाद हिंदी सिनेमा में उनकी जोरदार वापसी का श्रेय जाने-माने फिल्म निर्माता और निर्देशक राकेश रोशन को जाता है। राकेश रोशन ने अपनी फिल्म ‘खुदगर्ज’ में किरण कुमार को एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार में कास्ट किया। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और इसने किरण कुमार के लिए बॉलीवुड के दरवाजे फिर से पूरी तरह खोल दिए। इसके बाद उन्होंने विलेन के किरदारों में ऐसी छाप छोड़ी कि वह उस दौर के सबसे व्यस्त और असरदार खलनायकों में गिने जाने लगे। खलनायक के रूप में उनके अभिनय को आलोचकों से भरपूर सराहना मिली और कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया। खलनायक और भावुक किरदारों में दर्शकों का जीता दिल नब्बे के दशक में किरण कुमार ने ‘तेजाब’ और ‘खुदा गवाह’ जैसी बड़ी फिल्मों में अपनी नकारात्मक भूमिकाओं से मुख्य नायकों के सामने एक बहुत मजबूत चुनौती पेश की। पर्दे पर उनकी आवाज की गहराई और आंखों के तीखे तेवर विलेन के किरदार को जीवंत बना देते थे। उन्होंने ‘राम लखन’, ‘थानेदार’, ‘आज का अर्जुन’, ‘पत्थर के फूल’, ‘हिना’, ‘बोल राधा बोल’, ‘दरार’, ‘एलओसी कारगिल’ और ‘बॉबी जासूस’ जैसी फिल्मों में हर बार एक नया रंग दिखाया। साल 2000 के दशक में उन्होंने फिल्म ‘धड़कन’ में शिल्पा शेट्टी के पिता की भावुक और गरिमामयी भूमिका निभाकर यह साबित कर दिया कि वह केवल खौफनाक खलनायक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पिता के किरदार में भी दर्शकों का दिल जीत सकते हैं। छोटे पर्दे पर भी जमाई अपनी धाक सिनेमा के साथ-साथ किरण कुमार ने भारतीय टेलीविजन के शुरुआती और स्वर्णिम दौर में भी अपनी खास पहचान बनाई। जब दूरदर्शन और सैटेलाइट चैनलों का दौर शुरू हो रहा था, तब उन्होंने कई यादगार धारावाहिकों में केंद्रीय भूमिकाएं निभाईं। ‘जिंदगी’, ‘घुटन’, ‘साहिल’, ‘मंजिल’, ‘गृहस्थी’ और ‘कथा सागर’ जैसे प्रतिष्ठित धारावाहिकों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा। हिंदी के अलावा उन्होंने भोजपुरी फिल्मों में भी काम किया और अपने अभिनय का दायरा लगातार बढ़ाते रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी किरण कुमार का करियर यह सिखाता है कि लगन और मेहनत के बल पर कलाकार किसी भी माध्यम और भाषा में अपनी पहचान बना सकता है। इसका आप पर असर किरण कुमार का करियर सफर यह दिखाता है कि सिनेमा और टीवी इंडस्ट्री में एक अभिनेता क्षेत्रीय सिनेमा और विभिन्न किरदारों के दम पर कैसे दशकों तक प्रासंगिक बना रह सकता है। • दर्शकों के लिए: ओटीटी और टीवी पर क्लासिक हिंदी व गुजराती फिल्में देखने वाले दर्शक उनके बहुमुखी अभिनय का आनंद ले सकते हैं। उनकी शुरुआती फिल्मों से लेकर 90 के दशक के खलनायक किरदारों तक का समृद्ध संग्रह आज विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है। • कलाकारों के लिए सीख: अभिनय की दुनिया में करियर बनाने वाले युवाओं के लिए उनकी यात्रा यह सबक देती है कि काम की कमी के समय क्षेत्रीय सिनेमा का रुख करना कितना फायदेमंद हो सकता है। किसी एक छवि में बंधने के बजाय हर तरह के सकारात्मक और नकारात्मक रोल में हाथ आजमाना लंबी उम्र देता है। • क्षेत्रीय सिनेमा का महत्व: यह बताता है कि हिंदी फिल्मों के साथ-साथ गुजराती और भोजपुरी सिनेमा भी कलाकारों को नई पहचान और स्टारडम दिलाने की पूरी क्षमता रखता है। दर्शक क्षेत्रीय सिनेमा की ऐतिहासिक सफलताओं और बड़े कलाकारों के योगदान को समझ सकते हैं। • टेलीविजन माध्यम की ताकत: 90 के दशक में टीवी धारावाहिकों में काम करके किरण कुमार ने साबित किया कि छोटा पर्दा किसी भी बड़े अभिनेता की लोकप्रियता को घर-घर पहुंचा सकता है। आज के नए कलाकार भी किसी माध्यम को छोटा न समझकर अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ किरण कुमार के करियर में आए उतार-चढ़ाव और उनकी शानदार वापसी के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और परिस्थितियां जिम्मेदार थीं। मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में ठहराव आने के बाद उन्होंने जो रणनीतिक फैसले लिए, उसी से उनका करियर संवरा। • शुरुआती ठहराव: सत्तर के दशक में ‘जंगल में मंगल’ जैसी फिल्मों के बाद किरण कुमार को हिंदी सिनेमा में बतौर मुख्य अभिनेता बड़े अवसर मिलना कम हो गए थे। हिंदी फिल्मों में कड़े मुकाबले के चलते उन्होंने हार मानने के बजाय क्षेत्रीय सिनेमा का रुख करने का व्यावहारिक फैसला लिया। • गुजराती सिनेमा में स्टारडम: गुजराती फिल्म उद्योग में कदम रखते ही उनकी प्रतिभा को बड़ा कैनवास मिला और उनकी फिल्में भारी सफल रहीं। दर्शकों ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया और उन्हें ‘गुजराती सिनेमा का बच्चन’ कहा जाने लगा, जिससे उनका पेशेवर आत्मविश्वास फिर से मजबूत हुआ। • राकेश रोशन का भरोसा: जब वह क्षेत्रीय सिनेमा के शीर्ष पर थे, तब निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन ने उन्हें अपनी फिल्म ‘खुदगर्ज’ में एक अहम भूमिका दी। इस फिल्म की अपार सफलता ने बॉलीवुड में उनके लिए खलनायक और दमदार चरित्र अभिनेता के रूप में वापसी के सभी रास्ते खोल दिए। • किरदारों में लचीलापन: बॉलीवुड में वापसी के बाद उन्होंने खुद को केवल एक खांचे में सीमित नहीं रखा। ‘तेजाब’ और ‘खुदा गवाह’ में क्रूर विलेन बनने के बाद उन्होंने ‘धड़कन’ जैसी फिल्मों में भावुक पिता और टीवी धारावाहिकों में संवेदनशील किरदार निभाकर अपनी लंबी पारी सुनिश्चित की। सवाल-जवाब 1. किरण कुमार का जन्म कब और कहां हुआ था? किरण कुमार का जन्म 20 अक्टूबर 1953 को मुंबई में हुआ था। 2. किरण कुमार के पिता कौन थे? उनके पिता ओंकारनाथ धर थे, जिन्हें हिंदी सिनेमा में मशहूर अभिनेता जीवन के नाम से जाना जाता था। 3. किरण कुमार को ‘गुजराती सिनेमा का बच्चन’ क्यों कहा गया? हिंदी फिल्मों में मंदी के दौरान उन्होंने गुजराती सिनेमा में कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं और वहां उनकी लोकप्रियता अमिताभ बच्चन जैसी अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच गई थी। 4. बॉलीवुड में किरण कुमार की वापसी किस फिल्म से हुई? फिल्म निर्माता राकेश रोशन ने उन्हें अपनी फिल्म ‘खुदगर्ज’ में कास्ट किया, जिसने हिंदी सिनेमा में उनकी जोरदार वापसी कराई। 5. किरण कुमार ने अभिनय की औपचारिक शिक्षा कहां से ली थी? उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से अभिनय का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 6. किरण कुमार के प्रमुख टीवी सीरियल्स कौन से हैं? उन्होंने ‘जिंदगी’, ‘घुटन’, ‘साहिल’, ‘मंजिल’, ‘गृहस्थी’ और ‘कथा सागर’ जैसे कई चर्चित सीरियल्स में काम किया है। प्रेरणा और सबक किरण कुमार की जीवन यात्रा यह साबित करती है कि जब रास्ते बंद होते हैं, तब नई दिशाएं तलाशने की हिम्मत ही इंसान को विजेता बनाती है। • कठिन समय में नया रास्ता चुनें: जब हिंदी फिल्मों में काम कम हुआ, तो उन्होंने खाली बैठने के बजाय गुजराती सिनेमा का रुख किया और वहां इतिहास रच दिया। • माध्यम से ज्यादा काम को महत्व दें: बड़े पर्दे के स्टार होने के बावजूद उन्होंने टीवी सीरियल्स और क्षेत्रीय फिल्मों में काम करने से कभी संकोच नहीं किया। • अपनी पहचान खुद बनाएं: मशहूर अभिनेता जीवन के बेटे होने के बाद भी उन्होंने पिता के नाम पर निर्भर रहने के बजाय एफटीआईआई से प्रशिक्षण लिया और अपनी मेहनत से मुकाम पाया। • लगातार सीखने और ढलने की क्षमता: उन्होंने नायक से लेकर खलनायक और फिर पिता के रोल तक में खुद को ढाला, जो सिखाता है कि लचीलापन ही सफलता की असली कुंजी है। https://trendkia.com/entertainment/gujarati-philmon-ke-shahnshaha-se-bollywood-ke-khunkhara-vilena-taka-rakesh-roshan-ne-kaise-badala-di-thi-kiran-kumar-ki-kismata-49564 TrendKia — Har trend, sabse pehle.