हकलाहट को ताकत बनाकर बने सिनेमा की गूंजती आवाज, शरद केलकर के 50वें जन्मदिन पर उनकी अनोखी दास्तान ग्वालियर में पले-बढ़े और एमबीए पूरा करने के बाद अभिनय में आए शरद केलकर ने बचपन की हकलाहट को मात देकर टीवी, फिल्मों और बाहुबली की गूंजती डबिंग में अपनी खास पहचान बनाई। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शुमार होना आसान सफर नहीं था। 7 अक्टूबर 1976 को जन्मे शरद केलकर आज अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं। एक ऐसे कलाकार जिन्होंने कॉर्पोरेट करियर की सुरक्षित राह को छोड़कर कैमरे के सामने जोखिम उठाया, टीवी धारावाहिकों में नायक और खलनायक दोनों रूपों में अपनी छाप छोड़ी और बाद में सिल्वर स्क्रीन के साथ-साथ वॉयस डबिंग की दुनिया में अद्वितीय मुकाम हासिल किया। जिस शख्स को कभी अपनी आवाज और बोलने की शैली को लेकर भारी संघर्ष करना पड़ा था, उसी आवाज ने करीब 2,460 करोड़ रुपये की कमाई करने वाली विशाल ऐतिहासिक फिल्म में जान फूंक दी। ग्वालियर की गलियों से मुंबई की चमक तक का सफर शरद केलकर का जन्म एक मराठी परिवार में हुआ था और उनकी शुरुआती परवरिश ग्वालियर में हुई। उनके पिता मध्य प्रदेश शासन के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में इंजीनियर पद पर कार्यरत थे, जिससे परिवार में एक अनुशासित और व्यवस्थित माहौल था। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने प्रबंधन में मास्टर डिग्री यानी एमबीए पूरा किया। इस योग्यता के साथ वे किसी भी कॉर्पोरेट दफ्तर में सुकून भरी नौकरी चुन सकते थे। इसके बावजूद, उनका वास्तविक रुझान अभिनय और कला की ओर खिंचता चला गया। अंततः उन्होंने महानगर मुंबई का रुख करने का निर्णय लिया और मनोरंजन जगत की कठिन डगर पर अपने कदम बढ़ा दिए। टेलीविजन के पर्दे पर पहचान और खलनायकी का दौर साल 2004 में दूरदर्शन के धारावाहिक आक्रोश से शरद केलकर ने छोटे पर्दे पर दस्तक दी, जहां उन्होंने इंस्पेक्टर सचिन कुलकर्णी की भूमिका निभाई। शुरुआती अनुभवों के बाद धारावाहिक सिंदूर तेरे नाम का और सात फेरे ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। उनकी कद-काठी और संवाद अदायगी ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। फिर साल 2009 में धारावाहिक बैरी पिया में उन्होंने ठाकुर दिग्विजय सिंह भदौरिया का किरदार निभाया, जिसने उनके अभिनय के अलग आयाम को सामने रखा। इस नकारात्मक भूमिका में उनके शानदार काम को देखते हुए 2010 के गोल्ड अवॉर्ड्स में उन्हें बेस्ट निगेटिव एक्टर के सम्मान से नवाजा गया। इसके साथ ही उन्होंने रॉक-एन-रोल फैमिली और पति पत्नी और वो जैसे शो की मेजबानी भी की। वर्ष 2011 में धारावाहिक उतरन में सात्या का जटिल ग्रे किरदार निभाकर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे किसी एक तय छवि में बंधने वाले कलाकार नहीं हैं। बड़े पर्दे पर आगमन और विविध किरदारों का विस्तार सिनेमा के बड़े पर्दे पर शरद केलकर की शुरुआत साल 2013 में निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म गोलियों की रासलीला रामलीला से हुई, जिसमें उन्होंने दबंग और अधिकार जताने वाले बड़े भाई का किरदार अदा किया। इसके तुरंत बाद 2014 में आई मराठी ब्लॉकबस्टर फिल्म लई भारी में वे संगम नाम के विलेन के रूप में उभरे, जिसने मराठी सिनेमा में उनकी धाक जमा दी। हिंदी सिनेमा में उनकी बहुमुखी प्रतिभा लगातार देखने को मिली। हाउसफुल 4 में जहां उन्होंने सूर्यभान और माइकल भाई के तौर पर हास्य का तड़का लगाया, वहीं तान्हाजी: द अनसंग वॉरियर में छत्रपति शिवाजी महाराज का ऐतिहासिक और गरिमामय किरदार निभाया। दिलचस्प बात यह है कि इस ऐतिहासिक किरदार की तैयारी के लिए उन्हें केवल चार दिनों की मोहलत मिली थी, जिसमें उन्होंने उस शौर्य और शालीनता को बखूबी आत्मसात किया। इसके अतिरिक्त, अक्षय कुमार की फिल्म लक्ष्मी में ट्रांसजेंडर किरदार लक्ष्मी की संवेदनशील भूमिका निभाकर उन्होंने आलोचकों की खूब प्रशंसा बटोरी। वे हिंदी और मराठी के अलावा तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी अपनी अभिनय कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। हकलाहट को मात देकर बने देश के सबसे मजबूत वॉयस आर्टिस्ट आज जिस भारी और गूंजती आवाज की मिसाल दी जाती है, वह शरद केलकर के लिए कभी सबसे बड़ी कमजोरी हुआ करती थी। बचपन के दिनों में वे गंभीर रूप से हकलाते थे, जिसकी वजह से उन्हें काफी तंग किया जाता था और बार-बार अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ता था। खुद को मजबूत बनाकर उन्होंने अपनी इस कमी पर लगातार मेहनत की और करीब दो साल के निरंतर प्रयास के बाद हकलाने की समस्या से निजात पाई। उन्होंने माना कि डबिंग किसी भी कलाकार के काम को बेहतर या खराब बना सकती है। टीवी के दौर में व्यस्तता के चलते समय नहीं मिलता था, लेकिन बाद में आवाज का महत्व समझते हुए उन्होंने डबिंग का विधिवत प्रशिक्षण लिया। इसी साधना का नतीजा रहा कि बाहुबली 2 जैसी देश की नंबर 1 फिल्म में प्रभास के हिंदी संवादों को उनकी आवाज मिली, जिसने फिल्म को 2,460 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक कारोबार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका आप पर असर शरद केलकर का यह जीवन सफर उन सभी लोगों के लिए एक व्यावहारिक प्रेरणा है जो बोलने की झिझक या करियर के असमंजस से जूझ रहे हैं। • बोलने की हिचकिचाहट पर काबू: दो साल के समर्पण और निरंतर अभ्यास से बचपन की गंभीर हकलाहट पर विजय पाई जा सकती है। यदि आप या आपके बच्चे बोलने की झिझक से जूझ रहे हैं, तो सही वोकल थेरेपी और अभ्यास से इसमें पूर्ण सुधार संभव है। • करियर बदलने का साहस: एमबीए की डिग्री पूरी करने के बाद भी अपनी रुचि को पहचानकर नए क्षेत्र में बड़ा मुकाम बनाया जा सकता है। अपनी पेशेवर पढ़ाई को बैकअप रखते हुए पसंदीदा रचनात्मक क्षेत्र में पूरी तैयारी के साथ उतरना संभव है। • कमियों को ताकत में बदलना: जिस आवाज के कारण कभी उपहास झेलना पड़ा, उसी आवाज को औपचारिक प्रशिक्षण देकर सफलता की नींव बनाया गया। अपनी किसी भी शारीरिक या व्यावहारिक कमजोरी को उचित मार्गदर्शन से अपनी सबसे बड़ी ताकत में ढाला जा सकता है। • अल्पकालिक तैयारी में निपुणता: केवल चार दिनों की तैयारी में छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे गरिमामय किरदार को पर्दे पर जीवंत किया जा सकता है। सीमित समय और बड़े दबाव के बीच भी एकाग्रता और गहरी समझ से असाधारण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ शरद केलकर की यह असाधारण सफलता उनके शुरुआती संघर्षों और दृढ़ संकल्प की एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा रही है। • हकलाहट से मुक्ति का संकल्प: बचपन में लगातार मिलने वाले तानों और अभिनय की दुनिया में अस्वीकृतियों ने उन्हें भीतर से मजबूत किया। इसी दृढ़ निश्चय के चलते उन्होंने दो वर्षों तक लगातार प्रयास करके अपनी हकलाने की आदत को पूरी तरह समाप्त किया। • औपचारिक प्रशिक्षण का निर्णय: टेलीविजन के व्यस्त दिनों में डबिंग पर ध्यान न दे पाने के बाद उन्होंने आवाज के महत्व को समझा। इसके बाद उन्होंने बाकायदा डबिंग की तकनीकी ट्रेनिंग ली, जिसने उनकी वॉयसओवर क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया। • जोखिम लेने की मानसिकता: सरकारी सेवा की पारिवारिक पृष्ठभूमि और एमबीए की डिग्री होने के बावजूद सुरक्षित राह छोड़कर अनिश्चितता से भरे मनोरंजन जगत में कदम रखा। शुरुआत में छोटे किरदारों से लेकर नकारात्मक और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को चुनकर उन्होंने अपनी कला को तराशा। सवाल-जवाब 1. शरद केलकर का जन्म कब और कहां हुआ था? शरद केलकर का जन्म 7 अक्टूबर 1976 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। 2. एक्टिंग में आने से पहले शरद केलकर की पढ़ाई क्या थी? अभिनय की दुनिया में आने से पहले शरद केलकर ने एमबीए की डिग्री हासिल की थी। 3. शरद केलकर के पिता किस पद पर कार्यरत थे? उनके पिता मध्य प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में इंजीनियर थे। 4. शरद केलकर ने अपने टेलीविजन करियर की शुरुआत किस शो से की थी? उन्होंने 2004 में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक आक्रोश में इंस्पेक्टर सचिन कुलकर्णी के रोल से शुरुआत की थी। 5. शरद केलकर को बेस्ट निगेटिव एक्टर का गोल्ड अवॉर्ड किस धारावाहिक के लिए मिला था? उन्हें 2009 के धारावाहिक बैरी पिया में ठाकुर दिग्विजय सिंह भदौरिया के किरदार के लिए 2010 में यह सम्मान मिला था। 6. तान्हाजी फिल्म में छत्रपति शिवाजी महाराज के किरदार की तैयारी के लिए उन्हें कितना समय मिला था? इस ऐतिहासिक किरदार की तैयारी के लिए उन्हें केवल चार दिनों का समय मिला था। 7. हकलाने की समस्या को दूर करने में शरद केलकर को कितना समय लगा? बचपन की हकलाहट से पूरी तरह छुटकारा पाने में उन्हें दो साल का समय लगा था। 8. बाहुबली 2 ने बॉक्स ऑफिस पर कुल कितनी कमाई की थी? फिल्म बाहुबली 2 ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 2,460 करोड़ रुपये की कमाई की थी, जिसमें शरद केलकर ने अपनी आवाज दी थी। प्रेरणा और सबक शरद केलकर का जीवन सफर यह सिखाता है कि किस प्रकार अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाया जा सकता है। • कमजोरी को हथियार बनाएं: जिस हकलाहट के कारण बचपन में उपहास और असफलताएं मिलीं, उसी आवाज पर निरंतर काम करके उन्होंने उसे भारतीय सिनेमा की सबसे शक्तिशाली आवाज में बदल दिया। • दबाव में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन: तान्हाजी फिल्म में छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे ऐतिहासिक किरदार को साकार करने के लिए मिले केवल चार दिनों का सदुपयोग करते हुए उन्होंने अद्वितीय छाप छोड़ी। • निरंतर सीखने की ललक: टीवी पर एक स्थापित कलाकार बनने के बावजूद उन्होंने डबिंग का औपचारिक प्रशिक्षण लिया और कभी भी सीखने की प्रक्रिया को रुकने नहीं दिया। https://trendkia.com/entertainment/hakalahata-ko-takata-banakara-bane-sinema-ki-gunjati-avaja-sharad-kelkar-ke-50ven-janmadina-para-unaki-anokhi-dastana-44470 TrendKia — Har trend, sabse pehle.