# जावेद अख्तर ने धार्मिक मान्यताओं पर उठाए सवाल, बोले 99 फीसदी लोग जन्म से मिली पहचान में ही गुजार देते हैं जिंदगी

> प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने धर्म और आस्था के चुनाव पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि आस्था सुकून दे सकती है लेकिन वह वास्तविकता का प्रमाण नहीं होती।

**Type:** article · **Category:** मनोरंजन · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/entertainment/javed-akhtar-ne-dharmika-manyataon-para-uthae-savala-bole-99-phisadi-loga-janma-se-mili-pahachana-men-hi-gujara-dete-hain-jindagi-44238 · **Language:** Hindi
**Tags:** जावेद अख्तर, धर्म और आस्था, नास्तिकता, सौरभ द्विवेदी, एलन मस्क, तर्कवाद

भारतीय सिनेमा के जाने-माने पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने धार्मिक विश्वासों, आस्था और नास्तिकता को लेकर एक बार फिर तीखे सवाल खड़े किए हैं। सौरभ द्विवेदी के साथ एक विस्तृत बातचीत के दौरान उन्होंने तर्क दिया कि दुनिया में धर्म लोगों की अपनी सोची-समझी खोज या स्वतंत्र पसंद नहीं होता, बल्कि यह महज जन्म से मिलने वाली एक पारिवारिक विरासत बनकर रह जाता है। अपने विचारों को खुलकर साझा करते हुए उन्होंने इस बात की पड़ताल की कि इंसान किसी अलौकिक शक्ति पर भरोसा क्यों करता है और क्या उस भरोसे से मिलने वाली मानसिक शांति किसी चीज के वास्तविक होने का प्रमाण बन सकती है।

पांच दशकों से अधिक समय से साहित्य और फिल्म जगत में सक्रिय रहने वाले जावेद अख्तर ने 'शोले', 'दीवार' और 'जंजीर' जैसी यादगार फिल्मों के जरिए समाज की नब्ज को बारीकी से छुआ है। वे अपने स्पष्ट और बेबाक विचारों के लिए लगातार जाने जाते रहे हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि जिंदगी के मुश्किल पड़ावों पर धर्म इंसान को भावनात्मक और मानसिक ढांढस जरूर बंधाता है। हालांकि, उन्होंने दार्शनिक सवाल खड़ा किया कि क्या किसी विश्वास से सुकून महसूस होना ही उस विश्वास के सच होने की कसौटी हो सकता है।

## सुकून और सच्चाई के अंतर को समझाने के लिए एलन मस्क की मिसाल
जावेद अख्तर ने समझाया कि अक्सर इंसान एक अदृश्य या ऊपर वाली शक्ति पर इसलिए भरोसा करता है ताकि उसे यह तसल्ली रहे कि कोई उसकी निगरानी और देखरेख कर रहा है। यह अहसास व्यक्ति को कुछ समय के लिए चिंतामुक्त तो कर सकता है, लेकिन यह उस धारणा की असलियत साबित करने के लिए काफी नहीं है।

अपनी इस दलील को आम समझ के करीब लाने के लिए उन्होंने उद्योगपति एलन मस्क का रोचक उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए कोई इंसान अपने मन में पक्का यकीन बना ले कि एलन मस्क उसका अपना सगा भाई है और अगले महीने उसे मस्क की तरफ से अरबों डॉलर मिलने वाले हैं। जाहिर तौर पर ऐसी सोच उस व्यक्ति को बहुत खुशी, सुरक्षा और मानसिक संतोष देगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ उस व्यक्ति के मान लेने भर से यह बात सच साबित हो जाएगी? उन्होंने साफ किया कि किसी कल्पना या विश्वास से मिलने वाला मानसिक सुकून और हकीकत की जमीन पर उस बात का सच होना, दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं।

## जन्म की विरासत और 99 फीसदी लोगों का जीवन
धर्म के सामाजिक ताने-बाने पर टिप्पणी करते हुए जावेद अख्तर ने बताया कि दुनिया के करीब 99 प्रतिशत लोग उसी धर्म में अपनी आखिरी सांस लेते हैं जिसमें वे पैदा हुए थे। उन्होंने कहा कि यह हकीकत इस बात को साबित करती है कि आस्था असल में किसी का अपना स्वतंत्र या जांचा-परखा चुनाव नहीं होती। लोग बचपन से ही अपने माता-पिता, परिवार और समाज से मिले धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्थाओं को बिना किसी सवाल के स्वीकार कर लेते हैं और जीवनभर उन्हीं का पालन करते रहते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो बड़े होकर अपने धर्म और मान्यताओं की तार्किक पड़ताल करते हैं।

## व्यक्तियों की पूजा के बजाय विचारों और तर्क की कसौटी
जावेद अख्तर ने इंसानों और उनके विचारों के बीच स्पष्ट अंतर करने पर जोर दिया। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति पर बिना सोचे-समझे भरोसा करने के बजाय ठोस विचारों, तर्क और लॉजिक की कसौटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी इंसान भविष्य में अपनी बात से पलट सकता है या बदल सकता है, लेकिन तर्क का पैमाना हमेशा स्थिर और अडिग रहता है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक सोच रखने वाला व्यक्ति अक्सर किसी इंसान, परंपरा, संत या माता-पिता की कही बातों पर आंख मूंदकर यकीन करता है। इसके साथ ही उन्होंने इस आम धारणा को भी पूरी तरह खारिज कर दिया कि सारे धर्म एक जैसे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दुनिया भर में 10 प्रमुख धर्म मौजूद हैं और यह दावा करना कि सभी धर्म एक समान हैं, पूरी तरह बेबुनियाद बात है क्योंकि उन सभी के सिद्धांतों और विचारों में जमीन-आसमान का फर्क है।

## नास्तिकता और वैचारिक बहसों का पुराना सफर
यह पहला मौका नहीं है जब जावेद अख्तर ने नास्तिकता और धर्म पर अपनी सोच खुलकर रखी हो। वे लंबे अरसे से खुद को नास्तिक बताते आए हैं। जून 2026 में सोशल मीडिया पर एक यूजर के सवाल का जवाब देते हुए भी उन्होंने खुद को पूरी तरह नास्तिक बताया था और स्पष्ट किया था कि उनकी असली पहचान और कौम सभी भारतीय हैं।

ईश्वर के वजूद और आस्था को लेकर वे पहले भी सार्वजनिक मंचों पर आमने-सामने की बहस कर चुके हैं। दिसंबर 2025 में दिल्ली स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में जावेद अख्तर और इस्लामिक विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच लगभग दो घंटे तक जोरदार संवाद हुआ था, जिसका मुख्य विषय था कि क्या ईश्वर का अस्तित्व है।

## इसका आप पर असर
जावेद अख्तर के इन तार्किक बयानों का सीधा असर समाज में धार्मिक विश्वास, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सोचने के तरीके पर पड़ता है।

- **सोचने के नजरिए पर:** यह बयान लोगों को अपनी पारंपरिक मान्यताओं पर सवाल उठाने और तार्किक सोच अपनाने के लिए प्रेरित करता है। आम नागरिक बिना सोचे समझे परंपराएं मानने के बजाय कारणों और तथ्यों की पड़ताल करने की दिशा में सोच सकते हैं।
- **पारिवारिक परवरिश पर:** अभिभावकों और परिवारों में बच्चों पर धार्मिक पहचान थोपने को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इससे अगली पीढ़ी को अपनी आस्था खुद चुनने या समझने की वैचारिक स्वतंत्रता मिलने की संभावना बढ़ती है।
- **सामाजिक संवाद पर:** आस्था और नास्तिकता के बीच सम्मानजनक संवाद का दायरा बढ़ता है। लोग भावनात्मक विश्वास और तार्किक सच्चाई के फर्क को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
- **नागरिक पहचान पर:** संकीर्ण धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर साझा मानवीय और राष्ट्रीय पहचान को महत्व देने की चर्चा तेज होती है। इससे समाज में अलग-अलग विचारों के प्रति सहनशीलता बढ़ सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
जावेद अख्तर का यह बयान सौरभ द्विवेदी के साथ एक हालिया साक्षात्कार के दौरान दिए गए उनके विचारों से सामने आया है। उन्होंने समाज में धर्म के प्रसार और व्यक्तिगत सोच की कमी पर अपनी बात रखी।

- **साक्षात्कार में चर्चा:** सौरभ द्विवेदी के साथ बातचीत में धर्म, आस्था और नास्तिकता पर संवाद के दौरान यह विषय उठा। जावेद अख्तर ने इसी दौरान जीवन में धर्म की वास्तविक भूमिका पर अपनी राय रखी।
- **सुकून बनाम सच्चाई का मुद्दा:** लोग अक्सर मानसिक शांति के लिए ईश्वर या अदृश्य शक्ति पर भरोसा करते हैं। अख्तर ने यह स्पष्ट करने के लिए तर्क दिया कि किसी धारणा से शांति मिलना उसके सच होने की गारंटी नहीं है।
- **जन्म आधारित धार्मिकता:** उन्होंने पाया कि अधिकांश लोग जन्म से तय हुई आस्था को ही जीवनभर निभाते हैं। इसी व्यावहारिक स्थिति को उजागर करने के लिए उन्होंने 99 प्रतिशत लोगों के जन्म वाले धर्म में ही मरने का आंकड़ा पेश किया।
- **वैचारिक निरंतरता:** जावेद अख्तर लंबे समय से सार्वजनिक मंचों पर नास्तिकता और वैज्ञानिक सोच का समर्थन करते रहे हैं। वे पहले भी दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में दिसंबर 2025 में मुफ्ती शमाइल नदवी के साथ ईश्वर के अस्तित्व पर बहस कर चुके हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. जावेद अख्तर ने धर्म और आस्था को लेकर क्या मुख्य सवाल उठाया?
उन्होंने सवाल उठाया कि लोग अपने धार्मिक विश्वासों को खुद जांचने-परखने के बजाय परिवार से मिली विरासत के रूप में क्यों अपना लेते हैं।

### 2. एलन मस्क का उदाहरण देकर जावेद अख्तर ने क्या समझाया?
उन्होंने समझाया कि एलन मस्क को भाई मानने से मन को खुशी और सुरक्षा तो मिल सकती है, लेकिन सिर्फ मानने भर से वह बात सच नहीं हो जाती।

### 3. जावेद अख्तर के अनुसार कितने प्रतिशत लोग अपने जन्म के धर्म में ही मरते हैं?
उन्होंने कहा कि दुनिया के लगभग 99 फीसदी लोग उसी धर्म में मरते हैं जिसमें उनका जन्म हुआ था।

### 4. क्या जावेद अख्तर सभी धर्मों को एक समान मानते हैं?
नहीं, उन्होंने कहा कि दुनिया में 10 मुख्य धर्म हैं और यह कहना पूरी तरह गलत है कि सभी धर्म एक समान हैं क्योंकि वे एक-दूसरे से काफी अलग हैं।

### 5. ईश्वर के अस्तित्व पर जावेद अख्तर की सार्वजनिक बहस कब और किसके साथ हुई थी?
दिसंबर 2025 में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती शमाइल नदवी के साथ उनकी करीब दो घंटे तक बहस हुई थी।

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