# खंडवा के मलगांव खेगांव में युवाओं ने स्मार्टफोन से बनाई एक घंटे की कॉमेडी फिल्म, यूट्यूब पर होगी रिलीज

> मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के मलगांव खेगांव में ग्रामीण युवाओं ने बिना बजट और बिना महंगे कैमरों के स्मार्टफोन की मदद से एक घंटे की फिल्म ‘गब्बर इस बैक 2’ तैयार की है, जो 20 अक्टूबर को यूट्यूब पर आ रही है।

**Type:** article · **Category:** मनोरंजन · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/entertainment/khandwa-ke-malgaon-khegaon-men-yuvaon-ne-smartaphona-se-banai-eka-ghnte-ki-komedi-philma-youtube-para-hogi-rilija-37338 · **Language:** Hindi
**Tags:** खंडवा, मलगांव खेगांव, गब्बर इस बैक 2, निमाड़ क्रिएशन, कमलेश पटेल, भावेश पटेल, मोबाइल फिल्म, शून्य बजट फिल्म

फिल्म निर्माण के लिए महंगे स्टूडियो, लाखों रुपये के बजट या पेशेवर सिनेमा कैमरों का होना ही एकमात्र रास्ता नहीं है, यदि लगन और रचनात्मक सोच मौजूद हो तो साधारण मोबाइल फोन भी एक सशक्त माध्यम बन सकता है। मध्य प्रदेश में किशोर कुमार की जन्मस्थली के रूप में पहचाने जाने वाले खंडवा जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम मलगांव खेगांव के साधारण युवाओं ने इस बात को सच कर दिखाया है। यहाँ रहने वाले ग्रामीण युवकों के एक समूह ने आपसी सहयोग के दम पर करीब एक घंटे की अवधि वाली पूरी कॉमेडी फिल्म तैयार कर ली है। इस पूरी परियोजना की सबसे खास बात यह रही कि इसके निर्माण के लिए न तो कोई महंगा कैमरा बाजार से खरीदा गया, न ही कोई कृत्रिम सेट अथवा स्टूडियो तैयार किया गया और न ही किसी स्थापित प्रोडक्शन हाउस की वित्तीय सहायता ली गई। इन युवकों ने अपने हाथ में मौजूद स्मार्टफोन को ही मुख्य कैमरा बनाया और अपने ही गांव, खेतों, पगडंडियों, ग्रामीण सड़कों तथा पास के प्राकृतिक जंगलों को शूटिंग लोकेशन के रूप में इस्तेमाल किया। इस स्वतंत्र प्रयास से बनी फिल्म का शीर्षक ‘गब्बर इस बैक 2 (2.0)’ रखा गया है। इसका आधिकारिक ट्रेलर जारी होते ही क्षेत्रीय स्तर पर इस अनूठी पहल को लेकर काफी चर्चा और उत्साह देखा जा रहा है। तय कार्यक्रम के अनुसार यह पूरी फिल्म 20 अक्टूबर को निमाड़ क्रिएशन नामक यूट्यूब चैनल पर दर्शकों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।

## रोजमर्रा के कामकाज और खेती के बीच निकाला शूटिंग का समय
इस परियोजना के सह-निर्देशक कमलेश पटेल के अनुसार, इस पूरे उपक्रम में गांव के लगभग 15 से 17 स्थानीय युवकों ने सक्रिय भूमिका निभाई है। फिल्म में काम करने वाले इन कलाकारों और तकनीशियनों में से कई युवा निजी नौकरियों में कार्यरत हैं, जबकि कई अन्य अपने परिवारों के साथ पारंपरिक खेती-किसानी के काम में जुटे हुए हैं। इन युवाओं के लिए सिनेमा निर्माण कोई पूर्णकालिक आजीविका या पेशा नहीं है, बल्कि यह उनकी कलात्मक रुचि और रचनात्मक जुनून की अभिव्यक्ति है। कमलेश पटेल ने इस यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि इस टीम ने पहले 17 मिनट की अवधि वाली एक लघु फिल्म ‘गब्बर इस बैक’ बनाई थी। उस शुरुआती प्रयास को स्थानीय दर्शकों से मिले व्यापक स्नेह और सकारात्मक प्रतिक्रिया ने पूरी टीम के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया। इसी बढ़े हुए हौसले के परिणामस्वरूप टीम ने इसका दूसरा भाग बनाने का साहसिक निर्णय लिया। इस बार उन्होंने लगभग एक घंटे की पूरी कॉमेडी फिल्म तैयार करने का संकल्प लिया। टीम के पास कोई वित्तीय निवेशक या बड़ा निर्माता नहीं था, न ही कोई तकनीकी विशेषज्ञ दल मौजूद था। ऐसे में सभी साथियों ने मिल-जुलकर जिम्मेदारियां बांटीं और उपलब्ध स्मार्टफोन तकनीक के सहारे इस लंबी फिल्म को मूर्त रूप दिया।

ग्रामीण परिवेश में सीमित संसाधनों के साथ इस तरह की लंबी फिल्म तैयार करना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। दिन के समय सभी सदस्य अपने तयशुदा दायित्वों में व्यस्त रहते थे, जहां कुछ साथी दफ्तरों या दुकानों पर काम करने जाते थे तो अन्य खेतों में पसीना बहाते थे। दिनभर की शारीरिक और मानसिक व्यस्तता के बाद शाम को अथवा छुट्टियों के दिन जब भी फुर्सत मिलती, सभी सदस्य एकत्र होकर दृश्यों को फिल्माने के लिए निकल पड़ते थे। काम का विभाजन भी पूरी तरह स्वाभाविक था; कुछ युवाओं ने मुख्य और सहायक भूमिकाओं में अभिनय का जिम्मा संभाला, किसी ने मोबाइल थामकर कैमरामैन का काम किया, तो किसी ने संपादन यानी एडिटिंग और अन्य तकनीकी पहलुओं को संभाला। इसी सामूहिक लगन और अनवरत अभ्यास के दम पर लगभग एक वर्ष के कड़े परिश्रम के बाद यह पूरी फिल्म बनकर तैयार हो सकी। दृश्यों के फिल्मांकन के लिए गांव की प्राकृतिक और वास्तविक जगहों का ही चयन किया गया, जिससे गांव की खुली सड़कें, हरे-भरे खेत, खुले मैदान और नजदीकी जंगली इलाके ही फिल्म के स्वाभाविक पृष्ठभूमि बन गए, जिससे किसी भी तरह के कृत्रिम सेट पर होने वाला खर्च पूरी तरह बच गया।

## बचपन के रंगमंच से मिली पटकथा और निर्माण की प्रेरणा
फिल्म के दूसरे निर्देशक भावेश पटेल, जो स्वयं एक पत्रकार और जमीनी रंगकर्मी के रूप में सक्रिय हैं, इस रचनात्मक यात्रा की पृष्ठभूमि साझा करते हैं। भावेश पटेल बताते हैं कि ग्रामीण अंचल में पले-बढ़े होने के दौरान उन्हें बचपन से ही गांव के उत्सवों और मंचों पर होने वाले नाटकों में भाग लेने का भरपूर अवसर मिलता रहा। उसी जमीनी रंगमंच और अभिनय के अनुभव ने उनके मन में दृश्यों को कैमरे के जरिए पर्दे पर उतारने और स्वतंत्र फिल्म बनाने की सोच को जन्म दिया। भावेश पटेल का यह दृढ़ विश्वास है कि छोटे कस्बों, देहातों और सुदूर गांवों के बच्चों तथा युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं होती। मूल समस्या केवल यह रहती है कि उन्हें अपनी प्रतिभा और क्षमता को अभिव्यक्त करने का उचित मंच या माध्यम आसानी से सुलभ नहीं हो पाता। इसी सोच को व्यवहार में लाने के लिए उन्होंने गांव के उत्साही साथियों को एक सूत्र में पिरोया और आधुनिक स्मार्टफोन तकनीक का सदुपयोग करते हुए शून्य बजट की इस फिल्म यात्रा का श्रीगणेश किया।

वर्तमान डिजिटल युग में मोबाइल फोन केवल सोशल मीडिया देखने या सामान्य बातचीत का साधन बनकर नहीं रह गया है, बल्कि यह सृजन का एक क्रांतिकारी उपकरण भी बन चुका है। मलगांव खेगांव के इन युवाओं ने इस बात को सिद्ध किया है कि साधारण स्मार्टफोन से भी एक व्यवस्थित कहानी को परदे पर जीवंत किया जा सकता है। इस फिल्म से जुड़े सभी कलाकार पूरी तरह स्थानीय हैं और किसी भी बड़े महानगर से अभिनय सीखकर नहीं आए हैं। वे अपनी सामान्य दिनचर्या, नौकरी और कृषि कार्यों से मिलने वाले सीमित समय का सदुपयोग करके इस रचनात्मक प्रयोग का हिस्सा बने हैं। निमाड़ क्रिएशन की पूरी टीम का यह स्पष्ट संदेश है कि यदि मन में कुछ नया करने की लगन हो, तो आर्थिक सीमाओं या भौतिक संसाधनों की कमी को कभी अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने देना चाहिए। यदि संकल्प मजबूत हो, तो सबसे छोटे स्तर और सीमित साधनों से भी एक बड़ी और प्रेरणादायक शुरुआत की जा सकती है। अब गांव के इन सभी युवाओं की निगाहें 20 अक्टूबर की तारीख पर टिकी हैं, जब यह फिल्म डिजिटल मंच पर प्रसारित होगी और दर्शक उनके इस अनूठे प्रयास का मूल्यांकन करेंगे।

## इसका आप पर असर
यह पहल दर्शाती है कि महंगे तकनीकी संसाधनों के बिना भी स्मार्टफोन की मदद से स्वतंत्र रूप से पूर्णकालिक वीडियो सामग्री तैयार की जा सकती है।

- **भारत में:** देश भर के स्वतंत्र रचनाकारों और आकांक्षी फिल्मकारों के लिए यह स्पष्ट प्रमाण है कि रचनात्मक काम शुरू करने के लिए बड़े बजट या पेशेवर कैमरों की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके पास सामान्य स्मार्टफोन और एक स्पष्ट पटकथा है, तो आप डिजिटल मंचों के लिए सीधे सामग्री तैयार कर सकते हैं।
- **मध्य प्रदेश में:** खंडवा जिले और मालवा-निमाड़ क्षेत्र के स्थानीय ग्रामीण कलाकारों के लिए अपनी प्रतिभा को बड़े मंच पर प्रदर्शित करने का नया मार्ग प्रशस्त हुआ है। क्षेत्रीय स्तर पर स्थानीय पृष्ठभूमि और प्राकृतिक परिवेश को केंद्र में रखकर कंटेंट निर्माण की नई संभावनाएं खुली हैं।
- **दर्शकों के लिए:** दर्शक 20 अक्टूबर से यूट्यूब पर उपलब्ध इस पूर्णतः ग्रामीण परिवेश में बनी स्वतंत्र कॉमेडी फिल्म को निःशुल्क देख सकेंगे। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कैसे बुनियादी उपकरणों से मनोरंजक स्थानीय फिल्में बनाई जा सकती हैं।
- **शुरुआती रचनाकारों के लिए:** यह उन युवाओं के लिए व्यावहारिक उदाहरण है जो अपनी नौकरी या खेती के साथ समय प्रबंधन कर अपनी रचनात्मक रुचियों को पूरा करना चाहते हैं। प्रतिदिन कुछ घंटे निकालकर भी सालभर में एक बड़ा कलात्मक प्रोजेक्ट पूरा किया जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
इस फिल्म का निर्माण ग्रामीण युवाओं के व्यक्तिगत रंगमंच अनुभव और स्मार्टफोन तकनीक के सहज संगम के कारण संभव हुआ। सीमित वित्तीय संसाधनों के बावजूद आपसी सहयोग ने इस शून्य बजट परियोजना को सफल बनाया।

- **रंगमंच की पृष्ठभूमि:** सह-निर्देशक भावेश पटेल को बचपन से ग्रामीण मंचों पर नाटक करने का अनुभव था, जिसने उन्हें पटकथा और दृश्य संयोजन की समझ दी। इसी शुरुआती कलात्मक अनुभव ने उन्हें गांव के युवाओं को संगठित कर कैमरे के सामने लाने के लिए प्रेरित किया।
- **पहली लघु फिल्म की सफलता:** टीम द्वारा पूर्व में बनाई गई 17 मिनट की लघु फिल्म ‘गब्बर इस बैक’ को स्थानीय दर्शकों से मिली व्यापक सराहना ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। उसी सफलता ने उन्हें सीमित अवधि के बजाय एक घंटे की पूरी कॉमेडी फिल्म बनाने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया।
- **स्मार्टफोन तकनीक की सुलभता:** महंगे फिल्म कैमरे और स्टूडियो किराए पर लेने की असमर्थता के चलते टीम ने अपने निजी मोबाइल फोन का उपयोग करने का व्यावहारिक मार्ग चुना। इसके साथ ही प्राकृतिक ग्रामीण परिवेश, खेतों और जंगलों को बिना किसी लागत के शूटिंग लोकेशन के रूप में इस्तेमाल किया गया।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म ‘गब्बर इस बैक 2’ का निर्माण किस स्थान पर हुआ है?
इस फिल्म का निर्माण मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम मलगांव खेगांव में स्थानीय युवाओं द्वारा किया गया है।

### 2. इस फिल्म को किस उपकरण से शूट किया गया है?
फिल्म को बिना किसी महंगे सिनेमा कैमरे या बाहरी स्टूडियो के, पूरी तरह स्मार्टफोन के माध्यम से ग्रामीण लोकेशन्स पर शूट किया गया है।

### 3. फिल्म के निर्देशक कौन हैं?
इस फिल्म का निर्देशन कमलेश पटेल और भावेश पटेल द्वारा मिलकर किया गया है।

### 4. फिल्म की कुल अवधि कितनी है और यह किस शैली की है?
यह लगभग एक घंटे की अवधि वाली एक कॉमेडी फिल्म है।

### 5. फिल्म में कितने लोगों ने काम किया है और उनकी पृष्ठभूमि क्या है?
फिल्म में गांव के लगभग 15 से 17 युवाओं ने काम किया है, जिनमें से कई लोग नौकरीपेशा हैं और कई खेती-किसानी से जुड़े हैं।

### 6. फिल्म ‘गब्बर इस बैक 2’ कब और कहाँ रिलीज होगी?
यह फिल्म 20 अक्टूबर को निमाड़ क्रिएशन नामक यूट्यूब चैनल पर रिलीज की जाएगी।

### 7. इस फिल्म के निर्माण में कितना समय लगा?
अपने नियमित कामकाज और खेती के बाद बचे समय में शूटिंग और एडिटिंग करते हुए इस फिल्म को पूरा करने में करीब एक साल का समय लगा।

## प्रेरणा और सबक
मलगांव खेगांव के युवाओं का यह प्रयास सिखाता है कि संसाधनों की कमी कभी भी दृढ़ संकल्प और रचनात्मकता के मार्ग में स्थायी बाधा नहीं बन सकती।

- **उपलब्ध साधनों का श्रेष्ठ उपयोग:** महंगे गैजेट्स या उपकरणों की प्रतीक्षा करने के बजाय अपने हाथ में मौजूद सामान्य तकनीक से शुरुआत करना हमेशा अधिक फलदायी होता है। इन युवाओं ने महंगे कैमरों के अभाव में भी स्मार्टफोन से पूरी फिल्म बनाकर इसे साबित किया।
- **सामूहिक सहयोग और टीमवर्क:** जब सभी सदस्य अपनी अलग-अलग जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाते हैं, तो बिना किसी बजट के भी बड़े प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इस टीम में किसी ने अभिनय, किसी ने कैमरा और किसी ने संपादन की जिम्मेदारी स्वेच्छा से संभाली।
- **समय प्रबंधन की शक्ति:** आजीविका के लिए दिनभर नौकरी या खेती करने के बाद भी बचे हुए समय का उपयोग करके एक साल में बड़ा काम किया जा सकता है। नियमितता और निरंतर प्रयास बड़े लक्ष्यों को हासिल करने की कुंजी है।
- **अपनी जड़ों और परिवेश पर भरोसा:** किसी बड़े सेट या कृत्रिम माहौल के बजाय अपने ही गांव, खेतों और गलियों को कहानी का केंद्र बनाना प्रामाणिक और सस्ता दोनों साबित होता है। अपनी स्थानीय पहचान पर गर्व करके भी प्रभावशाली काम किया जा सकता है।

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