# कोलकाता में खुला था भारत का पहला सिनेमा हॉल, जानिए 1907 में बने एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस का क्या हुआ अंजाम

> साल 1907 में जेएफ मदन द्वारा कोलकाता में स्थापित एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस भारत का पहला स्थायी सिनेमाघर था, जहां एक जमाने में राजा-महाराजा फिल्में देखने आते थे। सदी भर से ज्यादा के इतिहास को समेटे यह ऐतिहासिक इमारत आखिरकार दिसंबर 2013 में मलबे में तब्दील हो गई।

**Type:** article · **Category:** मनोरंजन · **Published:** 2026-07-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/entertainment/kolkata-men-khula-tha-bharata-ka-pahala-sinema-hola-janie-1907-men-bane-elphinstone-picture-palace-ka-kya-hua-anjama-8930 · **Language:** Hindi
**Tags:** भारत का पहला सिनेमा हॉल, एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस, कोलकाता का इतिहास, भारतीय सिनेमा, जेएफ मदन, मिनर्वा सिनेमा, चैपलिन सिनेमा

आज के डिजिटल युग में, जब दर्शक अपनी छुट्टी के दिन परिवार और दोस्तों के साथ फिल्में देखने के लिए किसी आलीशान वातानुकूलित मल्टीप्लेक्स या फिर घर की आरामदायक सोफे पर बैठकर ओटीटी प्लेटफॉर्म का चुनाव करते हैं, तो सिनेमा का पुराना दौर बहुत पीछे छूट गया लगता है। आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस मनोरंजन के ये साधन अब हमारी तेज रफ्तार जीवनशैली का एक बेहद अहम और अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब फिल्मों को बड़े पर्दे पर देखने का अनुभव आज से बिल्कुल अलग और किसी बड़े उत्सव जैसा हुआ करता था। क्या आपको इस बात की जानकारी है कि हमारे देश में वो कौन सी खास जगह थी जहां सबसे पहली बार पक्के तौर पर एक सिनेमा हॉल की नींव रखी गई थी? हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के चौरंगी इलाके में स्थित उस ऐतिहासिक और भव्य इमारत की, जहां कभी बंगाल के शाही परिवार, राजा-महाराजा और बड़े ब्रिटिश अधिकारी सज-धज कर फिल्में देखने के लिए इकट्ठा हुआ करते थे। कई दशकों तक भारतीय सिनेमा की अमानत और शहर की शान रहा यह हॉल आज सिर्फ इतिहास की पुरानी किताबों और सुनहरी यादों के पन्नों में सिमट कर रह गया है। बदलते वक्त की मार ने इसे इस कदर मिटा दिया है कि आज इसकी जगह पर केवल एक सूना और खाली मैदान ही बचा रह गया है।

 

## तंबुओं और बायोस्कोप से निकलकर एक भव्य स्थायी इमारत तक का ऐतिहासिक सफर

बीसवीं सदी की बिल्कुल शुरुआत में भारत के आम लोगों के लिए पर्दे पर चलती-फिरती तस्वीरें देखना यानी सिनेमा एक जादुई, अचरज भरा और बिल्कुल नया अनुभव था। उस पुराने जमाने में आज की तरह कंक्रीट की पक्की इमारतों वाले वातानुकूलित सिनेमाघर बिल्कुल भी नहीं हुआ करते थे। इसके बजाय, फिल्मों के प्रदर्शन के लिए खाली मैदानों में बड़े-बड़े अस्थायी तंबू लगाए जाते थे और भारी-भरकम बायोस्कोप मशीनों के जरिए लोगों को चलते-फिरते चित्र दिखाए जाते थे, जिन्हें देखकर दर्शक दांतों तले उंगली दबा लेते थे। इसी शुरुआती दौर में एक बेहद दूरदर्शी पारसी उद्योगपति जमशेदजी फ्रामजी मदन (जिन्हें दुनिया जेएफ मदन के नाम से भी जानती है) ने सिनेमा की ताकत को पहचाना और एक बहुत बड़ा सपना देखा। उन्होंने यह ठान लिया कि वह भारतीय दर्शकों के लिए एक ऐसी स्थायी और शानदार जगह बनाएंगे जहां वे बिना किसी परेशानी के आराम से बैठकर फिल्मों के इस नए जादू का लुत्फ उठा सकें। अपने इसी कड़े संकल्प और दूरदर्शी सोच को हकीकत में बदलते हुए, जेएफ मदन ने साल 1907 में कोलकाता के 5/1 चौरंगी प्लेस के पते पर एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस का भव्य निर्माण कराया। यह इमारत भारत का सबसे पहला ऐसा पक्का सिनेमा हॉल होने का गौरव रखती है जिसे खास तौर पर सिर्फ और सिर्फ फिल्में दिखाने के मुख्य मकसद से ही डिजाइन और तैयार किया गया था। सिनेमा के कारोबार में जेएफ मदन की कामयाबी का यह सिलसिला सिर्फ एक इमारत तक ही सीमित नहीं रहा। आने वाले सालों में उन्होंने मदन थिएटर्स के नाम से मनोरंजन जगत का एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली साम्राज्य खड़ा कर दिया। इस बैनर के तले उन्होंने भारत के अलग-अलग शहरों के अलावा बर्मा (जिसे आज म्यांमार के नाम से जाना जाता है) और पड़ोसी देश श्रीलंका तक में सिनेमाघरों का एक बेहद विशाल और मजबूत नेटवर्क फैला दिया।

 

## मनमोहक यूरोपीय वास्तुकला और लाइव ऑर्केस्ट्रा का वह बेहद अद्भुत और शाही अनुभव

अगर वास्तुकला की बात करें तो एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस अपने समय में सिर्फ ईंट और पत्थर से बनी एक साधारण इमारत बिल्कुल नहीं था, बल्कि यह अपनी बेहतरीन यूरोपीय डिजाइन और शानदार सुख-सुविधाओं के लिए पूरे देश में एक मिसाल के तौर पर मशहूर था। इस सिनेमाघर के अंदर की भव्य सजावट, बेहद बारीकी और खूबसूरती से तराशे गए ऊंचे नक्काशीदार खंभे और दर्शकों के बैठने के लिए विशेष रूप से मंगवाई गई मखमली सीटें हर किसी का मन मोह लेने के लिए काफी थीं। उस शाही दौर में इस जगह पर आकर कोई भी फिल्म देखना महज वक्त बिताना या एक आम शौक नहीं था, बल्कि इसे पूरे समाज में एक बहुत ही खास, महंगा और शाही अनुभव माना जाता था। लगभग 1,700 दर्शकों के एक साथ बैठने की विशाल क्षमता वाले इस हॉल में समाज के सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित और रसूखदार लोग नियमित रूप से फिल्में देखने पहुंचते थे, जिनमें ब्रिटिश हुकूमत के कई बड़े और नामी अफसर तथा बंगाल रियासत के राजा-महाराजा शामिल हुआ करते थे। मूक फिल्मों (बिना आवाज वाली या साइलेंट फिल्मों) के उस शुरुआती जमाने में इस थिएटर की एक और बहुत बड़ी और अनोखी खूबी थी जो दर्शकों को खींच लाती थी। फिल्मों में अभिनेताओं की आवाज न होने के कारण, हॉल के अंदर ही एक पेशेवर लाइव ऑर्केस्ट्रा की टीम हमेशा मौजूद रहती थी। यह टीम विशाल पर्दे पर चल रहे भावनाओं और दृश्यों के हिसाब से वाद्ययंत्रों पर धुनें बजाती थी। इस सजीव संगीत से बिना आवाज वाली वो हिलती-डुलती तस्वीरें भी दर्शकों को पूरी तरह जीवंत, असली और असरदार लगने लगती थीं। इस ऐतिहासिक सिनेमाघर की विरासत से एक और बेहद दिलचस्प और गर्व करने वाला किस्सा भी जुड़ा है। ऐसा पुख्ता तौर पर कहा जाता है कि बंगाली और भारतीय सिनेमा के सबसे महान अभिनेताओं में शुमार उत्तम कुमार के पिता ने भी अपने संघर्ष के दिनों में कभी इसी ऐतिहासिक थिएटर के अंदर एक प्रोजेक्टर ऑपरेटर के तौर पर अपनी अहम सेवाएं दी थीं।

 

## आवाज वाली फिल्मों की क्रांतिकारी शुरुआत और थिएटर के बदलते नाम

जैसे-जैसे पूरी दुनिया और देश में समय का पहिया आगे बढ़ा, सिनेमा बनाने और दिखाने की तकनीक में भी बहुत बड़े और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिले। मूक फिल्मों का वह शांत दौर धीरे-धीरे खत्म होने लगा और उनकी जगह तेजी से ऐसी नई फिल्मों ने ले ली जिनमें किरदार पर्दे पर साफ तौर पर बोलते, गाते और रोते हुए सुनाई देते थे। इस नई और महंगी साउंड तकनीक को अपनाने के मामले में भी एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस बाकी सभी से मीलों आगे रहा। वर्ष 1929 में इस थिएटर ने एक और बड़ा इतिहास रच दिया, जब यह पूरे एशिया महाद्वीप का पहला ऐसा सिनेमा हॉल बन गया जहां स्थायी रूप से फिल्मों के लिए साउंड सिस्टम लगाया गया था। इस अत्याधुनिक तकनीकी बदलाव की बदौलत भारतीय सिनेमा प्रेमियों को अपनी जिंदगी में पहली बार बेहद साफ और बेहतरीन साउंड तकनीक के साथ सवाक फिल्में (यानी बोलती फिल्में) देखने का एक सुनहरा और ऐतिहासिक मौका मिला। आने वाले दशकों में जब इस थिएटर का मालिकाना हक बदला और इसके नए मालिक आए, तो इसकी पहचान में भी स्वाभाविक रूप से कई बदलाव आए। इसका पुराना नाम बदलकर पहले आरकेओ एलफिंस्टन कर दिया गया और फिर कुछ समय बीतने के बाद इसे मिनर्वा सिनेमा का नया और लोकप्रिय नाम दिया गया। मिनर्वा सिनेमा के इसी नए अवतार में इस हॉल ने सिने प्रेमियों के दिलों पर कई दशकों तक राज किया। इस दौरान यहां बेहतरीन हॉलीवुड फिल्मों के साथ-साथ शानदार हिंदी फिल्में देखने वालों की भारी और अनियंत्रित भीड़ लगातार जुटती रही।

 

## शहर की राजनीतिक अस्थिरता, मल्टीप्लेक्स का भारी दबाव और एक ऐतिहासिक इमारत का दुखद अंत

मिनर्वा सिनेमा का यह जादुई और सुनहरा सफर हमेशा एक जैसा शानदार नहीं रह सका। 1960 और 1970 के दशक में कोलकाता शहर में बहुत उथल-पुथल मची और कई बड़े सामाजिक तथा राजनीतिक बदलाव हो रहे थे। पूरे शहर में लगातार बढ़ते राजनीतिक आंदोलनों, आए दिन होने वाली हिंसक घटनाओं और खासतौर पर शाम ढलते ही पूरे इलाके में फैलने वाले असुरक्षा के खौफनाक माहौल ने आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया। इस डर और खौफ के साये में लोगों ने अपने परिवारों के साथ शाम के समय सिनेमाघरों में जाना काफी कम कर दिया। दर्शकों की लगातार और तेजी से गिरती संख्या ने इस भव्य थिएटर की आर्थिक स्थिति की कमर पूरी तरह तोड़ कर रख दी। आमदनी कम होने के कारण सही तरीके से देखभाल और आवश्यक रखरखाव न होने से, यह कभी शानदार दिखने वाली ऐतिहासिक इमारत धीरे-धीरे जर्जर और बदहाल अवस्था में पहुंच गई। जब हालात पूरी तरह बेकाबू हो गए और इमारत ढहने के कगार पर आ गई, तो अंततः कोलकाता नगर निगम ने इस पूरी इमारत को अपने कानूनी अधिकार में ले लिया। बाद में जब हॉलीवुड के महान हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन की जन्म शताब्दी का अवसर आया, तो उस खास मौके पर इस जर्जर इमारत का पूरा नवीनीकरण कराया गया और इसे एक नई पहचान देते हुए इसका नाम बदलकर चैपलिन सिनेमा कर दिया गया। शुरुआत के कुछ दिनों में इस बदलाव ने पुराने दर्शकों को एक बार फिर अपनी तरफ आकर्षित किया, लेकिन समय का पहिया बहुत आगे बढ़ चुका था। मल्टीप्लेक्स संस्कृति की बढ़ती चकाचौंध और स्थानीय प्रशासन की लगातार अनदेखी के सामने ऐसे पुराने सिंगल स्क्रीन वाले थिएटर ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाए। भारतीय सिनेमा के लगभग सौ सालों के शानदार और ऐतिहासिक सफर का इकलौता गवाह रहा यह हॉल, साल 2000 का दशक आते-आते पूरी तरह वीरान, खस्ताहाल और सुनसान हो गया। आखिरकार भारी मन से दिसंबर 2013 में कोलकाता नगर निगम ने सुरक्षा कारणों से इस ऐतिहासिक और जर्जर इमारत को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसी के साथ भारतीय सिनेमा के शुरुआती और सुनहरे दौर की सबसे अहम निशानी हमेशा के लिए मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। आज कोलकाता की उस खास जगह पर सिर्फ एक खाली और उजाड़ मैदान बचा है, जहां कभी भारत के पहले स्थायी सिनेमा हॉल की भारी रौनक हुआ करती थी। भले ही ईंट और पत्थर से बनी वह शानदार इमारत अब जमीन पर मौजूद नहीं है, लेकिन एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस का नाम और उसकी विरासत भारत के सिनेमाई इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण, सुनहरे और कभी न भुलाए जा सकने वाले अध्याय के रूप में हमेशा अमर रहेगी।

## सवाल-जवाब

### 1. भारत का पहला स्थायी सिनेमा हॉल कहां स्थित था?
भारत का पहला स्थायी सिनेमा हॉल, एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस, कोलकाता के 5/1 चौरंगी प्लेस पर स्थित था।

### 2. एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस का निर्माण किसने और कब कराया था?
इसका निर्माण पारसी उद्योगपति जमशेदजी फ्रामजी मदन (जेएफ मदन) ने साल 1907 में कराया था।

### 3. मूक फिल्मों के दौर में इस सिनेमा हॉल की क्या खासियत थी?
मूक फिल्मों के दौर में इस हॉल के अंदर एक लाइव ऑर्केस्ट्रा मौजूद रहता था, जो पर्दे पर चल रहे दृश्यों के हिसाब से संगीत बजाता था।

### 4. इस ऐतिहासिक इमारत को अंतिम रूप से कब गिराया गया?
सालों तक पूरी तरह वीरान पड़े रहने के बाद, दिसंबर 2013 में कोलकाता नगर निगम ने इस ऐतिहासिक इमारत को ध्वस्त कर दिया।

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