लम्हे के गाने मोरनी बागा मा बोले की अनसुनी कहानी, बंजारा महिलाओं के विरह दर्द से उपजा था यह लोकगीत अनिल कपूर और श्रीदेवी की 1991 में आई फिल्म लम्हे का मशहूर गीत मोरनी बागा मा बोले सिर्फ एक जश्न का गाना नहीं है, बल्कि राजस्थान के बंजारा समुदाय की महिलाओं के सदियों पुराने विरह दर्द से जुड़ा हुआ है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे नगमे दर्ज हैं, जिनकी धुन दशकों बाद भी शादी-ब्याह से लेकर सार्वजनिक उत्सवों और बसों तक में गूंजती रहती है। वर्ष 1991 में रिलीज हुई निर्देशक यश चोपड़ा की बहुचर्चित फिल्म लम्हे का गीत 'मोरनी बागा मा बोले' ऐसा ही एक कालजयी ट्रैक है। पर्दे पर इस गीत में श्रीदेवी का मंत्रमुग्ध कर देने वाला नृत्य और पार्श्व में स्वर कोकिला लता मंगेशकर की रूहानी आवाज आज भी श्रोताओं को थिरकने पर मजबूर कर देती है। रिलीज के करीब 35 साल बीत जाने के बाद भी यह गाना हर उत्सव का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है, लेकिन ज्यादातर लोग इसके वास्तविक ऐतिहासिक और लोक संदर्भ से अनजान हैं। उत्सव के पीछे छिपा बंजारा समुदाय का विरह दर्द आज भले ही इस ट्रैक को एक उत्साही और जश्न से भरा गीत माना जाता हो, मगर इसकी वास्तविक जड़ें राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और बंजारा समुदाय की जीवनशैली में रची-बसी हैं। पुराने दौर में जब बंजारे अथवा पुरुष वर्ग अपने परिवारों की आजीविका जुटाने और रोजी-रोटी की तलाश में घर से मीलों दूर तपते रेगिस्तान में निकल जाते थे, तब घर में अकेली रह जाने वाली महिलाएं उनके इंतजार में डूबी रहती थीं। अपने जीवनसाथी के दूर रहने की पीड़ा, अकेलेपन और विरह के अहसास को व्यक्त करने के लिए वे इन पंक्तियों को गुनगुनाती थीं। इस तरह यह गीत मूल रूप से मारवाड़ी लोक परंपराओं से उपजा एक अत्यंत भावुक विरह गीत है। मांड गायकी और राजस्थानी लोक परंपरा का अनूठा संगम इस ऐतिहासिक रचना की सबसे बड़ी विशेषता इसका राजस्थान के पारंपरिक मांड संगीत पर आधारित होना है। मांड गायकी मारवाड़ी लोकसंगीत और पारंपरिक रागों का एक अत्यंत प्रतिष्ठित और मनमोहक प्रकार मानी जाती है। जब इस गीत को मुख्यधारा के सिनेमाई संगीत में ढाला गया, तब प्रख्यात गीतकार आनंद बख्शी ने इसके बोल रचते समय राजस्थानी माटी की सुगंध और लोक संवेदनाओं का पूरी संजीदगी से ध्यान रखा। वहीं शास्त्रीय संगीत की दिग्गज जोड़ी शिव-हरि, जिसमें पंडित शिवकुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया शामिल थे, ने इसकी मूल पारंपरिक धुन को आधुनिक वाद्ययंत्रों के साथ बहुत सुंदरता से पिरोया। ईला अरुण और लता मंगेशकर की जुगलबंदी ने रचा इतिहास पर्दे पर इस लोकगीत की शुरुआत प्रसिद्ध गायिका ईला अरुण के बुलंद राजस्थानी स्वरों से होती है, जो तुरंत ही श्रोता को रेगिस्तान के लोक माहौल में पहुंचा देती है। इसके बाद लता मंगेशकर की मखमली गायकी इस गीत को एक अलग ही बुलंदी प्रदान करती है। फिल्म लम्हे न केवल अपने अलग और साहसी कथानक के लिए याद की जाती है, बल्कि इसका संगीत एल्बम भी सदाबहार माना जाता है। लता मंगेशकर के अलावा इस एल्बम में हरिहरन, सुरेश वाडेकर और पामेला चोपड़ा जैसी दिग्गज आवाजों ने गीत गाए थे, जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में एक अमिट छाप छोड़ी। इसका आप पर असर यह जानकारी संगीत प्रेमियों और आम श्रोताओं को लोकप्रिय फिल्मी धुनों के पीछे छिपी समृद्ध लोक धरोहर को गहराई से समझने का अवसर देती है। • सांस्कृतिक समझ: किसी भी लोकप्रिय गीत के पारंपरिक मूल को जानने से श्रोता उत्सव के साथ-साथ उसकी वास्तविक संवेदना से जुड़ पाते हैं। शादी-विवाह में बजने वाले इन गानों के पीछे के इतिहास को समझने से लोककला के प्रति सम्मान बढ़ता है। • पारंपरिक लोक कलाकारों को पहचान: बॉलीवुड द्वारा अपनाए गए लोकगीतों का संदर्भ सामने आने से ग्रामीण और लोक शैलियों की प्रासंगिकता उजागर होती है। नई पीढ़ी के श्रोताओं को राजस्थान की मांड शैली जैसी शास्त्रीय और लोक विधाओं के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिलती है। • फिल्मी संगीत का नजरिया: यह स्पष्ट करता है कि गुजरे दौर के संगीतकार किस प्रकार जमीनी संस्कृति से प्रेरणा लेते थे। इससे आज के संगीत प्रेमियों को पुराने गीतों की संजीदगी और बारीकियों को समझने में मदद मिलती है। • सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति: 35 साल बाद भी किसी गीत की लोकप्रियता यह दर्शाती है कि लोक परंपराएं कभी पुरानी नहीं होतीं। जब भी यह गीत बजेगा, श्रोता अब केवल नृत्य ही नहीं करेंगे, बल्कि उसके पीछे के दर्द को भी याद रख सकेंगे। ऐसा क्यों हुआ यह लोकगीत राजस्थान के कठिन भौगोलिक और सामाजिक परिवेश में जन्मा था, जहां जीवनयापन के साधन बेहद सीमित थे। पुरुष वर्ग के लगातार प्रवास के कारण महिलाओं के जीवन में अकेलापन एक सामान्य वास्तविकता बन गया था। • आजीविका का संकट: प्राचीन राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन न होने के कारण बंजारा और अन्य ग्रामीण पुरुषों को दूरदराज के क्षेत्रों में जाना पड़ता था। महीनों तक परिवार से दूर रहने की इसी व्यवस्था ने विरह की भावनाओं को जन्म दिया। • संचार साधनों का अभाव: उस दौर में दूर गए परिजनों का हालचाल जानने या संदेश भेजने का कोई माध्यम उपलब्ध नहीं था। महिलाएं अपनी विरह वेदना, प्रतीक्षा और मन के दुख को व्यक्त करने के लिए लोकगीतों और कविताओं का सहारा लेती थीं। • सिनेमा में लोकगीत का समावेश: फिल्म लम्हे में राजस्थान के परिदृश्य को प्रामाणिक रूप देने के लिए निर्देशक यश चोपड़ा और संगीतकार शिव-हरि ने इस पारंपरिक मारवाड़ी रचना को चुना। मांड गायकी के माध्यम से इसे मुख्यधारा के सिनेमाई संगीत में ढाला गया। सवाल-जवाब 1. गाना मोरनी बागा मा बोले किस फिल्म का है और कब रिलीज हुआ था? यह गीत वर्ष 1991 में रिलीज हुई यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'लम्हे' का है। 2. इस गीत का असली इतिहास किस समुदाय से जुड़ा है? इस गीत की जड़ें राजस्थान के बंजारा समुदाय से जुड़ी हैं, जहां महिलाएं रोजगार के लिए दूर गए पुरुषों के इंतजार में यह विरह गीत गाती थीं। 3. फिल्म लम्हे में इस गीत को किन गायकों ने गाया था? इस गीत की शुरुआत ईला अरुण की बुलंद आवाज से होती है, जिसके बाद मुख्य हिस्से को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी है। 4. इस गीत का संगीत किसने तैयार किया था और इसके बोल किसने लिखे थे? इस गाने को शिव-हरि (पंडित शिवकुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया) ने संगीतबद्ध किया था और इसके बोल आनंद बख्शी ने लिखे थे। 5. मोरनी बागा मा बोले किस पारंपरिक गायकी शैली पर आधारित है? यह गीत राजस्थान के प्रसिद्ध पारंपरिक रागों और मारवाड़ी लोकसंगीत की 'मांड' शैली पर आधारित है। https://trendkia.com/entertainment/lamhe-ke-gane-morni-baaga-ma-bole-ki-anasuni-kahani-banjara-mahilaon-ke-viraha-darda-se-upaja-tha-yaha-lokagita-35221 TrendKia — Har trend, sabse pehle.