मंदाकिनी अठावले: भारतीय सिनेमा के पितामह की बेटी और पर्दे पर छा जाने वाली देश की पहली बाल कलाकार भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में दादा साहेब फाल्के की बेटी मंदाकिनी अठावले ने बाल कलाकार के रूप में सिल्वर स्क्रीन पर कदम रखा था। श्री कृष्ण जन्म और कालिया मर्दन जैसी मूक फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। सिनेमा के शुरुआती वर्षों में जब परदे पर कहानियां गढ़ी जा रही थीं, उस समय एक छोटी सी बच्ची ने अभिनय की दुनिया में कदम रखकर इतिहास रच दिया था। आज के समय में बाल कलाकारों की लोकप्रियता और उनकी कला से हर कोई वाकिफ है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय रजत पट की सबसे पहली चाइल्ड आर्टिस्ट कौन थीं। यह गौरव दादा साहेब फाल्के की सुपुत्री मंदाकिनी अठावले को प्राप्त हुआ, जिन्होंने बेहद कम उम्र में अपने बेजोड़ अभिनय से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी थी। सिनेमा जगत के जनक कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के ने अपनी फिल्मों के माध्यम से न केवल भारतीय फिल्म उद्योग की नींव रखी, बल्कि अपनी ही बेटी को परदे पर उतारकर बाल कलाकारों के एक नए युग की शुरुआत भी की थी। साल 1918 में दादा साहेब फाल्के ने श्री कृष्ण जन्म नामक एक मूक फिल्म का निर्माण किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने अपनी बेटी मंदाकिनी को बाल गोपाल भगवान श्री कृष्ण की भूमिका सौंपी। उस वक्त मंदाकिनी की उम्र महज 6 या 7 वर्ष के आसपास थी। जब यह मूक फिल्म देश भर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई, तो परदे पर एक छोटी सी बच्ची को कृष्ण के रूप में देखकर दर्शक भाव-विभोर हो जाते थे। कई लोग सिनेमा हॉल में ही स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते थे। इस फिल्म की अभूतपूर्व सफलता के बाद, साल 1919 में दादा साहेब फाल्के ने कालिया मर्दन का निर्माण किया, जिसमें मंदाकिनी ने एक बार फिर नटखट कान्हा का किरदार निभाया। इस फिल्म में उनके भावपूर्ण चेहरे और कालिया नाग के घमंड को चकनाचूर करने वाले दृश्यों ने हर किसी का दिल जीत लिया था। मंदाकिनी ने अपने एक साक्षात्कार में इस बात का जिक्र किया था कि उनके पिता उन्हें अभिनय के गुर खुद सिखाया करते थे। घर पर आईने के सामने खड़े होकर दादा साहेब उन्हें क्रोध, प्रेम, भय और हर्ष जैसे विभिन्न मनोभावों को चेहरे पर लाना सिखाते थे। शूटिंग के दौरान दादा साहेब कैमरे के ठीक पीछे खड़े होकर जो क्रियाएं करते, मंदाकिनी कैमरे के सामने बिल्कुल वैसा ही दोहराती थीं। जब वे स्टार्ट बोलते, तो अभिनय आरंभ हो जाता और स्टॉप बोलते ही थम जाता था। हालांकि, घर के भीतर अनुशासन बेहद सख्त था। बच्चों को बिना किसी वजह के आईने के सामने खड़े रहने या सेट पर आवारागर्दी करने की बिल्कुल छूट नहीं थी। यदि कोई बच्चा गलती कर बैठता, तो उसे पानी से भरा बर्तन अपनी पीठ पर रखकर झुकने की सजा भुगतनी पड़ती थी ताकि बर्तन से पानी की एक बूंद भी नीचे न गिरे। उस दौर में फिल्मों की शूटिंग करना आज के समय जितना सुगम नहीं था। न तो अत्याधुनिक कैमरे उपलब्ध थे और न ही मेकअप के आधुनिक साधन। मंदाकिनी का श्रृंगार केवल उनके मामा द्वारा ही किया जाता था। कालिया मर्दन फिल्म में पहली बार कुछ विशेष कैमरा तकनीकों का प्रयोग किया गया था, जहां मंदाकिनी के मुस्कुराते हुए चेहरे से धीरे-धीरे भगवान कृष्ण का स्वरूप उभरता हुआ दिखाई देता था। उस समय के अखबारों और विज्ञापनों में मंदाकिनी को एक जादुई बालिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता था जो परदे पर साक्षात कान्हा का रूप धारण कर लेती थी। फाल्के साहब की लंका दहन फिल्म में भी उन्होंने छोटे-मोटे रोल किए थे, लेकिन श्री कृष्ण जन्म और कालिया मर्दन ने उन्हें पूरे देश में घर-घर में लोकप्रिय बना दिया था। फिल्मों में इतनी अपार शोहरत और लोकप्रियता हासिल करने के बाद भी मंदाकिनी का फिल्मी सफर ज्यादा लंबा नहीं चल सका। जब उनकी आयु लगभग 14 वर्ष की हुई, तो उनका विवाह डॉक्टर अठावले के साथ कर दिया गया। परिणय सूत्र में बंधने के पश्चात वे नासिक में बस गईं और धीरे-धीरे सिनेमा की इस चकाचौंध भरी दुनिया और स्टूडियो के परिवेश से पूरी तरह दूर हो गईं। फिल्मों के चमकदार आवरण को पीछे छोड़कर वे एक आम गृहणी की भांति जीवन जीने लगीं। उन्होंने रसोई संभालने से लेकर अपने परिवार की हर जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया। बाद में जब कभी वे अपने बचपन के सुनहरे दिनों को याद करती थीं, तो बताती थीं कि कैसे एक पेड़ की डाली से फुदकने वाली सामान्य सी बालिका को उनके पिता ने परदे का भगवान कृष्ण बना दिया था। वर्ष 1987 में नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया द्वारा 75 वर्ष की आयु में मंदाकिनी अठावले का एक विस्तृत साक्षात्कार रिकॉर्ड किया गया था, जिसमें उन्होंने दादा साहेब फाल्के के निजी जीवन और भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के कई अनछुए पहलुओं से पर्दा उठाया था। हालांकि आज मंदाकिनी हमारे बीच मौजूद नहीं हैं और उस युग की पुरानी फिल्मों की रीलों को सुरक्षित रखना भी एक कठिन चुनौती रहा है, फिर भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा के लिए अमर हो चुका है। देश की सबसे पहली बाल कलाकार के रूप में मंदाकिनी ने जो आधारशिला रखी थी, उसी ने आगे चलकर फिल्म जगत में बच्चों के अभिनय के लिए एक मजबूत और नई पहचान गढ़ी। सवाल-जवाब 1. भारतीय सिनेमा की पहली बाल कलाकार कौन थीं? भारतीय सिनेमा की सबसे पहली बाल कलाकार मंदाकिनी अठावले थीं, जो दादा साहेब फाल्के की बेटी थीं। 2. मंदाकिनी अठावले ने किन फिल्मों में अभिनय किया था? उन्होंने श्री कृष्ण जन्म और कालिया मर्दन जैसी प्रसिद्ध मूक फिल्मों में बाल कृष्ण की भूमिका निभाई थी। 3. श्री कृष्ण जन्म फिल्म किस वर्ष रिलीज हुई थी? श्री कृष्ण जन्म फिल्म साल 1918 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। 4. मंदाकिनी अठावले ने फिल्मों से दूरी क्यों बना ली थी? लगभग 14 वर्ष की आयु में विवाह होने के बाद वे फिल्मों की दुनिया छोड़कर एक साधारण गृहणी बन गईं थीं। प्रेरणा और सबक • कड़ी मेहनत और अनुशासन: जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने के लिए कड़ा अनुशासन और नियमों का पालन बेहद जरूरी है। • कौशल विकास: अभ्यास और बार-बार दोहराव से किसी भी कठिन कला या हुनर में महारत हासिल की जा सकती है। • सादगी अपनाना: जीवन की प्राथमिकताओं को समझकर सादगी भरा जीवन जीना मानसिक शांति देता है। • नया रास्ता बनाना: लीक से हटकर नए क्षेत्रों में कदम बढ़ाने से इतिहास में अमर होने का अवसर मिलता है। https://trendkia.com/entertainment/mandakini-athawale-indian-cinema-child-star-17764 TrendKia — Har trend, sabse pehle.