पत्रकारिता छोड़कर मुंबई में शुरू की एक्टिंग, पंचायत के विकास यानी चंदन रॉय ने सुनाया अपना संघर्ष वेब सीरीज पंचायत में विकास का रोल निभाकर लोकप्रिय हुए चंदन रॉय ने पत्रकारिता छोड़कर एक्टिंग चुनने, शुरुआती संघर्ष और टाइपकास्ट होने के डर पर खुलकर बात की। भारत में जब कोरोना महामारी का दौर आया, उस दौरान दर्शकों के मनोरंजन का अंदाज तेजी से बदल गया। सिनेमाघरों के बंद होने और पाबंदियों के बीच ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने पूरे देश में जबरदस्त पकड़ बना ली। लोग घर बैठे नई फिल्में और वेब सीरीज देखने लगे। इसी डिजिटल दौर ने कई ऐसी कहानियों और शो को जन्म दिया, जिनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। इन्हीं चर्चित शो में एक नाम शामिल है वेब सीरीज 'पंचायत' का, जिसने रघुबीर यादव, नीना गुप्ता और जितेंद्र जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ दर्शकों के दिलों पर राज किया। इसी शो में फुलेरा गांव के 'विकास' का किरदार निभाकर अभिनेता चंदन रॉय ने हर घर में अपनी खास जगह बनाई। चंदन रॉय का मानना है कि इस डिजिटल माध्यम ने उनके अभिनय सफर को एक नई और मजबूत दिशा दी। अभिनय की दुनिया में आने से पहले चंदन रॉय का पेशा बिल्कुल अलग था। उन्होंने अपने एक्टिंग के सपने को साकार करने के लिए पत्रकारिता का पेशा छोड़ दिया था। मन में कुछ अलग कर दिखाने की चाह लेकर वे मायानगरी मुंबई पहुंचे, जहां कदम रखते ही उनका वास्तविक संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआती दौर में काम पाना आसान नहीं था, लेकिन वे अपने इरादे पर टिके रहे। टेलीविजन धारावाहिकों के छोटे किरदारों से तय किया रास्ता इंडस्ट्री में शुरुआत करते समय चंदन रॉय को आसानी से बड़े अवसर नहीं मिले। उन्होंने अपने करियर की नींव बहुत छोटे-छोटे किरदारों से रखी। टेलीविजन सीरियल्स में वे छोटे रोल निभाते रहे और कैमरे के सामने अपनी कला को तराशते रहे। चंदन रॉय का कहना है कि उनके पूरे करियर में 'पंचायत' सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस शो ने उनके सफर को पूरी तरह से बदल दिया। दिलचस्प बात यह है कि अपनी इस बड़ी सफलता और शो की शोहरत का आभास उन्हें मुंबई जैसे किसी बड़े महानगर या किसी भव्य फिल्मी समारोह में नहीं हुआ, बल्कि इसकी अनुभूति उन्हें अपने ही गांव की एक धूल भरी सड़क पर हुई। गांव की सड़क पर हुआ शो की कामयाबी का पहला एहसास चंदन रॉय ने उस यादगार घटना का जिक्र किया जब उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि उनका काम लोगों के दिलों तक पहुंच चुका है। वे बताते हैं कि जब वे अपने गांव में थे, तब रास्ते में एक स्थानीय युवक ने अचानक उन्हें रोका और 'पंचायत' में उनके अभिनय की जमकर सराहना की। उस साधारण से पल ने उन्हें अंदर तक छू लिया। उस दिन उन्हें पहली बार यह पक्का विश्वास हुआ कि वेब सीरीज ने आम दर्शकों के बीच गहरी पैठ बना ली है और उनका काम वाकई लोगों को पसंद आ रहा है। टाइपकास्ट होने की चिंता और किरदारों के चयन की आजादी अपने फिल्मी सफर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए चंदन रॉय ने बताया कि सिनेमा जगत में आने से पहले उनके मन में एक गहरा डर रहता था। उन्हें हमेशा यह फिक्र सताती थी कि कहीं वे किसी खास सांचे में ढलकर टाइपकास्ट न हो जाएं। वे इस बात को लेकर बेहद सतर्क थे कि उनका करियर सिर्फ मुख्य हीरो के दोस्त का रोल करने तक ही सीमित न रह जाए। शुरुआती दिनों में इंडस्ट्री के कड़े हालातों के चलते उनके पास काम या किरदार चुनने की कोई गुंजाइश या साहस नहीं था। उस दौर में काम पाने और टिके रहने के लिए उन्हें जो भी रोल मिलता था, वे उसे स्वीकार कर लेते थे। हालांकि, समय बीतने और अपनी पहचान स्थापित करने के बाद अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। 'पंचायत' से मिली पहचान और कामयाबी ने उन्हें यह आजादी और विकल्प दिया है कि वे अपनी पसंद और समझ के मुताबिक अपनी भूमिकाओं का चयन कर सकें। इसका आप पर असर कला और मनोरंजन क्षेत्र में काम तलाश रहे युवाओं और महत्वाकांक्षी अभिनेताओं के लिए यह यात्रा व्यावहारिक सीख देती है। • करियर में बदलाव पर: सुरक्षित नौकरी छोड़कर कला क्षेत्र में आने के जोखिम और वास्तविक संघर्ष की सच्चाई सामने आती है। इससे अन्य क्षेत्रों से रचनात्मक पेशों में आने वाले युवाओं को जमीन से जुड़कर शुरुआत करने की प्रेरणा मिलती है। • टाइपकास्टिंग और काम के चुनाव पर: शुरुआत में सर्वाइवल के लिए मिले हर काम को स्वीकार करना मजबूरी हो सकता है। जब आपकी प्रतिभा को व्यापक पहचान मिलती है, तभी काम और भूमिकाएं चुनने की आजादी मिलती है। • डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के अवसरों पर: महामारी के बाद ओटीटी ने क्षेत्रीय और स्वाभाविक कलाकारों के लिए बड़े दरवाजे खोले हैं। अब केवल बड़े बैनर ही नहीं, बल्कि जमीनी कहानियां भी कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिला रही हैं। • पहचान और दर्शकों के जुड़ाव पर: सफलता का असली पैमाना उद्योग की चमक-दमक के बजाय सुदूर गांव और कस्बों के साधारण दर्शकों का प्रेम है। ज़मीनी दर्शकों का प्रतिसाद ही किसी प्रोजेक्ट की वास्तविक लोकप्रियता को सिद्ध करता है। ऐसा क्यों हुआ पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से निकलकर अभिनय जगत में अपनी पहचान बनाने के पीछे कई परिस्थितियां और डिजिटल बदलाव शामिल रहे। • डिजिटल बूम और ओटीटी का प्रसार: महामारी के दौरान सिनेमाघरों के बंद होने से दर्शकों ने घरेलू स्क्रीन पर डिजिटल शो का रुख किया। इस बदलाव ने यथार्थवादी और गांव-देहात की पृष्ठभूमि वाली कहानियों को व्यापक दर्शक वर्ग दिया। • अभिनय के लिए पूर्व पेशा छोड़ने का फैसला: अभिनेता का रुझान पत्रकारिता के बजाय स्क्रीन पर रचनात्मक कलाकारी की तरफ था। अपने सपने को पूरा करने के लिए वे मुंबई आए और धारावाहिकों में छोटे किरदारों से अनुभव हासिल किया। • पंचायत सीरीज की यथार्थवादी कास्टिंग: शो के निर्माताओं ने पारंपरिक सितारों के बजाय स्वाभाविक और जमीनी किरदारों पर भरोसा जताया। रघुबीर यादव, नीना गुप्ता और जितेंद्र जैसे कलाकारों के साथ चंदन रॉय को अपनी प्रतिभा दिखाने का सटीक मंच मिला। सवाल-जवाब 1. चंदन रॉय ने एक्टिंग में आने से पहले कौन सा पेशा छोड़ा था? चंदन रॉय ने अभिनय की दुनिया में करियर बनाने के लिए पत्रकारिता का पेशा छोड़ दिया था। 2. चंदन रॉय को किस वेब सीरीज से घर-घर में पहचान मिली? उन्हें लोकप्रिय वेब सीरीज 'पंचायत' में 'विकास' का किरदार निभाकर व्यापक पहचान मिली। 3. वेब सीरीज पंचायत में उनके साथ कौन से प्रमुख कलाकार शामिल थे? इस सीरीज में उनके साथ रघुबीर यादव, नीना गुप्ता और जितेंद्र जैसे जाने-माने कलाकार थे। 4. चंदन रॉय ने करियर की शुरुआत में किस तरह का काम किया? उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत टेलीविजन सीरियल्स में छोटे-छोटे किरदारों को निभाकर की थी। 5. उन्हें अपनी सफलता और शो की लोकप्रियता का पहला अहसास कहां हुआ? उन्हें इसका पहला अहसास अपने गांव की एक सड़क पर हुआ, जब एक स्थानीय लड़के ने रोककर उनके काम की तारीफ की। 6. शुरुआती दौर में चंदन रॉय के मन में किस बात का डर था? उन्हें डर था कि वे केवल मुख्य अभिनेता के दोस्त के रोल तक सीमित होकर टाइपकास्ट न हो जाएं। प्रेरणा और सबक चंदन रॉय का सफर यह साबित करता है कि लगन, धैर्य और सही अवसर की प्रतीक्षा से सपनों को सच किया जा सकता है। • जोखिम लेने का साहस: अपने जुनून को प्राथमिकता देते हुए स्थापित करियर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटाएं। जब तक आप बदलाव की दिशा में पहला कदम नहीं बढ़ाएंगे, नए रास्ते नहीं खुलेंगे। • शुरुआती काम को छोटा न समझना: करियर की शुरुआत में मिलने वाले छोटे और साधारण रोल्स को पूरी ईमानदारी से निभाएं। हर छोटा अनुभव आगे चलकर बड़े अवसरों के लिए आधार तैयार करता है। • पहचान मिलने तक धैर्य बनाए रखना: टाइपकास्ट होने का डर स्वाभाविक है, लेकिन शुरुआत में काम करके टिके रहना जरूरी है। सफलता और साख हासिल होते ही अपने मनपसंद चुनाव करने की ताकत मिल जाती है। • जमीन से जुड़े रहना: अपनी कला का असली प्रभाव आम लोगों के बीच महसूस होता है। सादगी और दर्शकों के सीधे जुड़ाव को हमेशा याद रखना कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी है। https://trendkia.com/entertainment/patrakarita-chhorakara-mumbai-men-shuru-ki-ektinga-panchayat-ke-vikasa-yani-chandan-roy-ne-sunaya-apana-sngharsha-56152 TrendKia — Har trend, sabse pehle.