सदाबहार सिनेमा की 7 मास्टरपीस, जिनका जादू दशकों बाद भी सिर चढ़कर बोलता है भारतीय सिनेमा के 100 साल के सफर में कई फिल्में बनीं, लेकिन कुछ ऐसी सदाबहार रचनाएं हैं जिनका असर आज भी दर्शकों के दिलों पर कायम है। शोले से लेकर 3 इडियट्स तक, ये सात फिल्में समय की हर सीमा को पार कर चुकी हैं। भारतीय सिनेमा के पिछले 100 सालों के सुनहरे इतिहास में हजारों कहानियां सिल्वर स्क्रीन पर उतारी गईं और कई रिकॉर्ड बने। हालांकि कुछ ऐसी चुनिंदा फिल्में हैं जो समय के बंधन से परे होकर दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गईं। टाइमलेस सिनेमा के दायरे में आने वाली ये 7 फिल्में आज भी अपनी प्रासंगिकता, गानों, बेहतरीन डायलॉग और दमदार अभिनय के दम पर दशकों बाद वैसी ही तरोताजा और असरदार बनी हुई हैं। ये केवल साधारण फिल्में नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज और संस्कृति का एक बेहद अहम हिस्सा बन चुकी हैं। आइए, भारतीय सिनेमा के उन 7 मास्टरपीस पर नजर डालते हैं जिन्हें हर दौर के दर्शकों ने सहेजकर रखा है। शोले (1975) रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी शोले हमारे लोकप्रिय कल्चर का एक अटूट और कभी न भूलने वाला हिस्सा बन चुकी है। फिल्म में जय और वीरू की अटूट दोस्ती, गब्बर सिंह का खौफनाक और डरावना विलेन रूप, ठाकुर का बदला और बसंती की चुलबुली शरारतों ने इसे एक अमर कृति बना दिया है। रिलीज के पांच दशक बीत जाने के बाद भी सलीम-जावेद की कलम से लिखे गए संवाद आम से लेकर खास तक हर व्यक्ति की जुबान पर रहते हैं। यह फिल्म एक्शन, भावनाओं, ड्रामे और कॉमेडी का एक ऐसा अनूठा मिश्रण है जिसे आने वाली पीढ़ियां भी हमेशा याद रखेंगी। मुगल-ए-आजम (1960) के. आसिफ की यह सदाबहार मास्टरपीस महज एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिने जगत में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। राजकुमार सलीम यानी दिलीप कुमार और उनकी प्रेमिका अनारकली यानी मधुबाला की अधूरी प्रेम कहानी तथा सम्राट अकबर यानी पृथ्वीराज कपूर के उसूलों के टकराव ने पर्दे पर एक नया इतिहास रच दिया था। फिल्म के विशाल शीश महल के सेट, नौशाद का अमर संगीत और प्यार किया तो डरना क्या जैसे बेहतरीन गाने आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों को छू लेते हैं। मदर इंडिया (1957) महबूब खान के निर्देशन में तैयार मदर इंडिया एक ऐसी कहानी है जो हर भारतीय के दिल के बेहद करीब है। फिल्म में नर्गिस द्वारा निभाया गया राधा का किरदार एक ऐसी मजबूत मां को दर्शाता है जो गरीबी, महाजनों के अत्याचारों और विकट परिस्थितियों से अकेले लड़ती है लेकिन अपने उसूलों और आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं करती है। यह ऑस्कर की बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म श्रेणी के लिए नामांकित होने वाली देश की पहली फिल्म थी और इसकी महत्ता आज भी उतनी ही गहरी है। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995) आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में बनी DDLJ ने नब्बे के दशक में भारतीय रोमांस की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया था। राज यानी शाहरुख खान और सिमरन यानी काजोल की यह प्रेम कहानी यूरोप की वादियों से शुरू होकर पंजाब के लहलहाते सरसों के खेतों तक पहुंचती है और आज भी दर्शकों को खुद से बांधे रखती है। जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी जैसे मशहूर डायलॉग और जतिन-ललित के जादुई संगीत ने इसे सबसे सफल फिल्म का दर्जा दिलाया जो मुंबई के मराठा मंदिर थिएटर में लंबे समय तक चलती रही। आनंद (1971) ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी आनंद मानवीय रिश्तों और जीवन के गहरे फलसफे को बेहद खूबसूरती के साथ पर्दे पर उतारती है। कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से बहादुरी से जूझ रहे आनंद यानी राजेश खन्ना और उनके डॉक्टर मित्र यानी अमिताभ बच्चन के बीच का रिश्ता दर्शकों को एक ही वक्त पर हंसाता भी है और रुलाता भी है। बाबूमोशाय, जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए, यह एक ऐसा संवाद है जो हर इंसान को सबसे विकट समय में भी मुस्कुराने और जिंदगी को खुलकर जीने की प्रेरणा देता है। लगान (2001) आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन और आमिर खान के अभिनय से सजी लगान भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा शानदार फिल्मों में शुमार है जिसने देश के साथ-साथ पूरी दुनिया में बड़ी सफलता हासिल की। एक छोटे से गांव के सीधे-साधे और अनपढ़ ग्रामीणों द्वारा एक क्रिकेट मैच के जरिए ब्रिटिश हुकूमत के टैक्स के खिलाफ संघर्ष की यह दास्तान रोंगटे खड़े कर देती है। एआर रहमान का ऑस्कर के लिए नामांकित संगीत और फिल्म की अनूठी पटकथा इसे एक मुकम्मल टाइमलेस मास्टरपीस बनाती है। 3 इडियट्स (2009) राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी 3 इडियट्स ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़े, बल्कि देश की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और परवरिश के तरीकों पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा। फिल्म में रैंचो यानी आमिर खान, फरहान और राजू की कहानी हर युवा को अपनी वास्तविक क्षमता को पहचानना और काबिल बनना सिखाती है। फिल्म की सरल कॉमेडी, भावुक कर देने वाले उतार-चढ़ाव और ऑल इज वेल का मंत्र इसे हर पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाए रखता है। इसका आप पर असर भारतीय सिनेमा के इन ऐतिहासिक मास्टरपीस का प्रभाव दर्शकों और संस्कृति पर गहरा है। • सांस्कृतिक प्रभाव: भारत में: ये फिल्में भारतीय लोकप्रिय संस्कृति, भाषा और पारिवारिक मूल्यों को आकार देती हैं। • मनोरंजन मूल्य: सभी जगहों पर: ये फिल्में आज भी दर्शकों को भरपूर मनोरंजन के साथ जीवन के गहरे सबक देती हैं। सवाल-जवाब 1. शोले फिल्म किस वर्ष रिलीज हुई थी? शोले फिल्म साल 1975 में रिलीज हुई थी और इसके निर्देशक रमेश सिप्पी थे। 2. ऑस्कर के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म कौन सी थी? महबूब खान के निर्देशन में बनी मदर इंडिया ऑस्कर की बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी के लिए नॉमिनेट होने वाली पहली भारतीय फिल्म थी। 3. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे फिल्म किस थिएटर में सबसे लंबे समय तक चली? डीडीएलजे मुंबई के मराठा मंदिर थिएटर में वर्षों तक चलती रही। 4. आनंद फिल्म में मुख्य भूमिका किसने निभाई थी? आनंद फिल्म में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। https://trendkia.com/entertainment/sadabahara-sinema-ki-7-mastarapisa-jinaka-jadu-dashakon-bada-bhi-sira-charhakara-bolata-hai-26550 TrendKia — Har trend, sabse pehle.