सोने का भाव 40 रुपये तोला रहने के दौर में 25 हजार रुपये फीस लेने वाली भानुमति रामकृष्ण का सफर तेलुगू सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार भानुमति रामकृष्ण ने अपने दौर में फिल्म बजट का आधा हिस्सा फीस के तौर पर लेकर और आठ कलाओं में महारत हासिल कर नया इतिहास रचा था। भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में जब एक तोला सोने की कीमत महज 40 रुपये हुआ करती थी, तब एक अभिनेत्री अपनी एक फिल्म के लिए 25 हजार रुपये का भारी-भरकम पारिश्रमिक लेती थीं। यह रकम उस समय किसी भी पूरी फिल्म के कुल निर्माण बजट के लगभग आधे हिस्से के बराबर मानी जाती थी। यह असाधारण मुकाम हासिल करने वाली कलाकार भानुमति रामकृष्ण थीं, जिन्होंने 1940 और 1950 के दशक में बड़े पर्दे पर अद्वितीय दबदबा बनाया। वे न केवल तेलुगू सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार बनीं, बल्कि कला के कई मोर्चों पर एक साथ काम करके उन्होंने उद्योग की स्थापित परंपराओं को पूरी तरह बदल दिया। सिनेमा की आठ कलाओं में पारंगत और सर्वपल्ली राधाकृष्णन की प्रशंसा सिनेमा जगत और प्रशंसकों के बीच भानुमति रामकृष्ण को अष्टावधानी के नाम से जाना जाता था। इस उपाधि का सीधा अर्थ यह था कि वे एक ही समय में आठ अलग-अलग कलाओं में पूरी तरह निपुण थीं। वे एक शीर्ष स्तर की अभिनेत्री होने के साथ-साथ सुरीली गायिका, कुशल निर्देशक, संगीतकार, लेखिका, फिल्म संपादक, नृत्यांगना और सफल स्टूडियो मालिक भी थीं। कला के प्रति उनके इसी बहुआयामी समर्पण और विलक्षण प्रतिभा के मुरीद भारत के पहले उप-राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी थे, जो उनके कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे। शुरुआती करियर और स्टारडम की नई ऊंचाइयां भानुमति रामकृष्ण ने अभिनय की दुनिया में अपना पहला कदम साल 1939 में रिलीज हुई फिल्म ‘वर विक्रयम्’ के जरिए रखा था। इसके बाद आई फिल्म ‘कृष्ण प्रेम’ ने उन्हें दर्शकों के बीच व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनके स्टारडम को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का काम फिल्म ‘स्वर्गसीमा’ ने किया, जिसने उन्हें दक्षिण भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्रियों की कतार में ला खड़ा किया। तमिल सिनेमा के पर्दे पर वे पहली बार फिल्म ‘राजा मुक्ति’ में दिग्गज अभिनेता एमजीआर के साथ मुख्य भूमिका में नजर आईं। अभिनय के अलावा उन्होंने कई फिल्मों में बतौर म्यूजिक डायरेक्टर अपनी धुनों का जादू भी बिखेरा। 1953 की ‘चांदीरानी’ और ऐतिहासिक प्रयोग साल 1953 में भानुमति रामकृष्ण ने फिल्म ‘चांदीरानी’ का निर्देशन किया, जो उनके निर्देशन सफर की पहली फिल्म थी। इस प्रोजेक्ट में उनका योगदान किसी भी फिल्म निर्माता के लिए एक मिसाल था। उन्होंने इस पूरी फिल्म का निर्माण खुद किया, संगीत भी स्वयं तैयार किया और साथ ही इसके हिंदी, तेलुगू और तमिल, तीनों संस्करणों में मुख्य किरदार के तौर पर डबल रोल भी निभाया। एक ही फिल्म में इतने बड़े पैमाने पर बहुआयामी जिम्मेदारी निभाना उस युग के सिनेमाई इतिहास में बेहद दुर्लभ माना गया। पारिवारिक विरोध के बावजूद प्रेम विवाह और स्टूडियो की स्थापना फिल्म ‘कृष्ण प्रेम’ की शूटिंग के दौरान भानुमति रामकृष्ण को संघर्षरत सहायक निर्देशक पीएस रामाकृष्ण राव (पीसी रामाकृष्णा राव) से प्रेम हो गया था। उस समय भानुमति एक स्थापित और बेहद लोकप्रिय स्टार थीं, जबकि पीएस रामाकृष्ण राव की कमाई काफी सीमित थी। इसी असमानता के चलते भानुमति के पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे और उन्होंने शादी का कड़ा विरोध किया। इसके बावजूद भानुमति ने हिम्मत दिखाई और साल 1943 में घर से निकलकर भागकर शादी कर ली। आगे चलकर वे भारत की पहली ऐसी महिला बनीं जिन्होंने अपने दम पर एक भव्य फिल्म स्टूडियो स्थापित किया और उसका नामकरण अपने बेटे के नाम पर रखा। इसी स्टूडियो के जरिए उन्होंने अपने पति को फिल्ममेकर और प्रोड्यूसर के रूप में स्थापित किया। उस दौर के दो सबसे बड़े सितारे, एनटीआर और एएनआर, उनके प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में निरंतर अभिनय करते रहे। पद्म सम्मान, राष्ट्रपति पुरस्कार और लक्स साबुन के विज्ञापन पर उसूल भानुमति रामकृष्ण दक्षिण भारत की पहली ऐसी अभिनेत्री बनीं जिन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके साथ ही वे एक्टिंग के क्षेत्र में देश का प्रतिष्ठित राष्ट्रपति अवॉर्ड हासिल करने वाली अंतिम शख्सियत भी बनीं। अपने व्यक्तिगत उसूलों के मामले में भी वे हमेशा अडिग रहीं। उस सुनहरे दौर में जब लगभग हर नामी हीरोइन लक्स साबुन का विज्ञापन किया करती थी, तब भानुमति को भी एक बड़ी रकम की पेशकश के साथ इस विज्ञापन का प्रस्ताव दिया गया था। भानुमति ने उस मोटी रकम को ठुकरा दिया। उनका स्पष्ट कहना था कि वे निजी जिंदगी में इस साबुन का प्रयोग नहीं करती हैं, इसलिए केवल प्रचार की खातिर दर्शकों से कभी झूठ नहीं बोलेंगी। सिनेमाई पर्दे पर उन्होंने अपनी अंतिम उपस्थिति साल 1998 की फिल्म ‘पेल्ली कनुका’ में दर्ज कराई थी। इसका आप पर असर भानुमति रामकृष्ण का जीवन और कार्यशैली भारतीय सिनेमा में महिला सशक्तिकरण और पेशेवर ईमानदारी के लिए एक स्थायी मानदंड स्थापित करता है। • सिनेमा उद्योग के लिए: भानुमति ने यह साबित किया कि एक महिला अभिनेत्री केवल अभिनय तक सीमित न रहकर निर्देशन, संगीत और स्टूडियो संचालन जैसे तकनीकी और व्यावसायिक क्षेत्रों का नेतृत्व कर सकती है। उनके इस कदम ने आने वाली पीढ़ियों की महिला फिल्मकारों के लिए उद्योग में नए रास्ते खोले। • कलाकारों और पारिश्रमिक के लिए: 1940 के दशक में फिल्म के कुल बजट का लगभग 50 फीसदी पारिश्रमिक लेकर उन्होंने कलाकारों के वित्तीय हक और स्टार वैल्यू की नई परिभाषा गढ़ी। इससे उस दौर में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के मेहनताने को लेकर उद्योग की सोच में बड़ा बदलाव आया। • विज्ञापनों और उपभोक्ता विश्वास के लिए: लक्स साबुन के विज्ञापन को ठुकराने का उनका फैसला आज भी सार्वजनिक हस्तियों के लिए नैतिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जिस उत्पाद का इस्तेमाल आप स्वयं नहीं करते, उसका प्रचार करके जनता को गुमराह नहीं करना चाहिए। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: एक साथ आठ कलाओं में महारत हासिल कर उन्होंने क्लासिक सिनेमा के स्वर्ण युग को ऐसी बहुभाषी फिल्में दीं जो आज भी अध्ययन का विषय हैं। दर्शक उनके बहुआयामी काम के जरिए भारतीय सिनेमा के समृद्ध इतिहास और तकनीकी विकास को समझ सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ भानुमति रामकृष्ण अपने दौर में सबसे अधिक पारिश्रमिक पाने वाली और स्टूडियो स्थापित करने वाली अग्रणी महिला इसलिए बन सकीं क्योंकि उनके पास अद्वितीय बहुमुखी प्रतिभा और असाधारण निर्णय क्षमता थी। • बहुआयामी कलात्मक दक्षता: भानुमति केवल अभिनय पर निर्भर नहीं थीं, बल्कि गायन, संगीत रचना, लेखन और संपादन जैसी सिनेमा की आठ विधाओं में समान रूप से माहिर थीं। इस सर्वांगीण कौशल ने उन्हें निर्माताओं और निर्देशकों के लिए अपरिहार्य और अत्यंत मूल्यवान बना दिया। • रूढ़ियों को तोड़ने का व्यक्तिगत साहस: जब उनके पिता ने कम आय वाले सहायक निर्देशक से शादी का विरोध किया, तब उन्होंने सामाजिक बंधनों की परवाह किए बिना अपने निर्णय पर अडिग रहकर 1943 में विवाह किया। इसी निर्भीकता ने उन्हें आगे चलकर स्वतंत्र रूप से स्टूडियो खोलने और फिल्में प्रोड्यूस करने की प्रेरणा दी। • व्यावसायिक स्वायत्तता की चाह: दूसरों के प्रोडक्शन पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय उन्होंने अपने बेटे के नाम पर स्टूडियो स्थापित किया और अपने पति को निर्माता-निर्देशक के रूप में आगे बढ़ाया। इस स्वायत्तता के चलते वे ‘चांदीरानी’ जैसी महत्वाकांक्षी बहुभाषी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन पूरी आजादी के साथ कर सकीं। सवाल-जवाब 1. भानुमति रामकृष्ण को सिनेमा में किस उपाधि से जाना जाता था? उन्हें अष्टावधानी कहा जाता था, क्योंकि वे अभिनय, गायन, निर्देशन, संगीत, लेखन, नृत्य, संपादन और स्टूडियो संचालन जैसी आठ कलाओं में पारंगत थीं। 2. उस दौर में भानुमति रामकृष्ण की फीस कितनी थी जब सोना 40 रुपये तोला था? उस समय वे प्रति फिल्म 25 हजार रुपये फीस लेती थीं, जो पूरी फिल्म के बजट के लगभग आधे हिस्से के बराबर होती थी। 3. भानुमति रामकृष्ण ने अपने निर्देशन की शुरुआत किस फिल्म से की थी? उन्होंने 1953 में रिलीज हुई फिल्म ‘चांदीरानी’ से निर्देशन की शुरुआत की थी, जिसे उन्होंने खुद प्रोड्यूस भी किया और उसमें डबल रोल भी निभाया। 4. उन्होंने लक्स साबुन का विज्ञापन करने से क्यों इनकार कर दिया था? उन्होंने भारी रकम का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया था कि वे खुद यह साबुन इस्तेमाल नहीं करतीं, इसलिए प्रचार के लिए दर्शकों से झूठ नहीं बोलेंगी। 5. भारत सरकार से उन्हें कौन से बड़े सम्मान प्राप्त हुए? वे पद्म अवॉर्ड से सम्मानित होने वाली दक्षिण भारत की पहली अभिनेत्री थीं और एक्टिंग के लिए राष्ट्रपति अवॉर्ड पाने वाली अंतिम शख्सियत थीं। 6. भानुमति रामकृष्ण की आखिरी फिल्म कौन सी थी? उन्होंने अंतिम बार 1998 में रिलीज हुई फिल्म ‘पेल्ली कनुका’ में अभिनय किया था। प्रेरणा और सबक भानुमति रामकृष्ण का जीवन सफर सिखाता है कि बहुआयामी प्रतिभा, अपने फैसलों पर दृढ़ विश्वास और नैतिक ईमानदारी से इतिहास रचा जा सकता है। • कौशल का लगातार विस्तार: केवल एक क्षेत्र में सीमित रहने के बजाय अपने कौशल का दायरा लगातार बढ़ाते रहना चाहिए। भानुमति ने अभिनय के साथ गायन, निर्देशन और निर्माण की बारीकियां सीखीं, जिससे उनकी निर्भरता किसी अन्य पर नहीं रही। • कठिन फैसलों पर अडिग रहना: जीवन में जब अपने भविष्य और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बात आए, तो विरोध के बावजूद सही निर्णय लेने का साहस दिखाना जरूरी है। भानुमति ने पारिवारिक और सामाजिक दबाव के बावजूद अपने जीवनसाथी और करियर के रास्ते खुद चुने। • पैसों से ऊपर सिद्धांतों को रखना: व्यावसायिक लाभ के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता कभी नहीं करना चाहिए। भारी रकम की पेशकश के बावजूद जिस उत्पाद का वे इस्तेमाल नहीं करती थीं, उसका विज्ञापन न करके उन्होंने नैतिक सत्यनिष्ठा की मिसाल पेश की। • स्वावलंबन और दूसरों को अवसर देना: सफलता हासिल करने के बाद अपनी खुद की व्यवस्था और संसाधन खड़े करने चाहिए। भानुमति ने अपना स्टूडियो स्थापित किया और अपने पति व अन्य कलाकारों को आगे बढ़ने के ठोस मंच उपलब्ध कराए। https://trendkia.com/entertainment/sone-ka-bhava-40-rupaye-tola-rahane-ke-daura-men-25-hajara-rupaye-phisa-lene-vali-bhanumathi-ramakrishna-ka-saphara-34451 TrendKia — Har trend, sabse pehle.