# तेलुगु फिल्म रणबली में दिखा प्राचीन गांव निकला पीओपी का कमाल, पर्दे के पीछे की कलाकारी आई सामने

> सिनेमा में नजर आने वाली ऐतिहासिक बस्तियां और प्राचीन मंदिर किस तरह तराशे जाते हैं, इसका दिलचस्प उदाहरण तेलुगु फिल्म रणबली के भव्य सेट से सामने आया है।

**Type:** article · **Category:** मनोरंजन · **Published:** 2026-11-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/entertainment/telugu-philma-ranabali-men-dikha-prachina-ganva-nikala-pop-ka-kamala-parde-ke-pichhe-ki-kalakari-ai-samane-56929 · **Language:** Hindi
**Tags:** रणबली, तेलुगु सिनेमा, फिल्म सेट, कला निर्देशन, सिनेमा निर्माण, भद्रमल्लन्ना स्वामी

सिनेमा की दुनिया दर्शकों को अक्सर एक ऐसे दौर में ले जाती है, जिसका अहसास परदे पर बेहद सजीव और ऐतिहासिक लगता है। जब दर्शक थियेटर में विशाल दुर्ग, सदियों की छाप लिए मंदिर और पुरानी पत्थर की झोपड़ियां देखते हैं, तो यह सोचना भी मुश्किल होता है कि सामने नजर आ रहा दृश्य असल में हकीकत नहीं बल्कि इंसानी कल्पना की एक बनावट है। हाल ही में तेलुगु फिल्म रणबली के निर्माण से जुड़ी कुछ खास जानकारियां और पर्दे के पीछे की तस्वीरें सामने आई हैं, जिन्होंने यह साफ कर दिया है कि किस तरह कला निर्देशकों का हुनर कैमरे के सामने एक पूरी ऐतिहासिक दुनिया खड़ी कर देता है।

## सीमेंट की बुनियाद पर पीओपी और लोहे का ढांचा
इस फिल्म में एक बेहद विशाल और प्राचीन मंदिर दिखाया गया है, जिसे कहानी के भीतर भद्रमल्लन्ना स्वामी के पवित्र तीर्थ स्थल के तौर पर पेश किया गया है। परदे पर यह ढांचा सैकड़ों साल पुराने किसी ठोस पत्थर के नक्काशीदार मंदिर जैसा आभास देता है। वास्तविकता यह है कि इस पूरे निर्माण को मजबूती देने के लिए सिर्फ इसके निचले बेसमेंट को ही असली सीमेंट और कंक्रीट से तैयार किया गया था। बेसमेंट से ऊपर की पूरी बनावट, मंदिर के भव्य और बारीक नक्काशी वाले खंभे, विशाल मूर्तियां और छतों के सजावटी हिस्से पूरी तरह प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी पीओपी और लोहे के मजबूत ढांचों की मदद से तैयार किए गए हैं।

## पत्थर जैसी दिखने वाली खोखली दीवारें
भव्य मंदिर के साथ ही पूरे परिसर में कई कच्ची और पक्की झोपड़ियों का एक विस्तृत गांव बसाया गया है। कैमरे से देखने पर दर्शकों को ऐसा लगता है जैसे इन ग्रामीण मकानों की दीवारें भारी-भरकम चट्टानों और अनगढ़े पत्थरों को जोड़कर बनाई गई हों। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत यह है कि ये सारी दीवारें भीतर से बिल्कुल खोखली हैं। निर्माण दल ने इन्हें फाइबर और प्लास्टर ऑफ पेरिस के मिश्रण से डमी के रूप में ढाला है। इसके ऊपर पेंट और बनावट का ऐसा बारीक काम किया गया कि कैमरे की नजर में ये फाइबर के ढांचे ठोस और प्राचीन पत्थरों जैसे नजर आने लगे।

## कला और तकनीक से गढ़ी गई काल्पनिक दुनिया
इस गांव के दृश्य को पूरी तरह जीवंत बनाने के लिए सेट पर कई अन्य कलात्मक तत्वों को शामिल किया गया। इनमें विशाल लकड़ी के रथ, पारंपरिक ग्रामीण कुआं, पहरेदारों के पुतले और कई जगह दैत्यों की भीमकाय आकृतियां रखी गई हैं। शूटिंग के दौरान माहौल को पूरी तरह स्वाभाविक बनाए रखने के लिए कुछ खास प्रॉप्स तो असली रखे गए, लेकिन ज्यादातर जटिल संरचनाओं को डमी और फाइबर की मदद से ही गढ़ा गया। यह पूरी व्यवस्था दिखाती है कि किस तरह रचनात्मक सोच, सटीक रंगाई और आर्ट डिजाइन के मेल से एक बंजर व खाली जमीन पर कई सदियों पुराना गांव तैयार किया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
फिल्म निर्माण के इस तकनीकी पहलू से दर्शकों और कला प्रेमियों को यह समझने में मदद मिलती है कि परदे का जादू असल में कैसे रचा जाता है।

- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** दर्शकों को यह जानने का मौका मिलता है कि परदे पर दिखने वाले भव्य महल और मंदिर हमेशा असली पत्थरों के नहीं होते। इससे बड़े बजट की फिल्मों में विजुअल क्राफ्ट और प्रोडक्शन डिजाइन की अहमियत समझ में आती है।
- **कला और डिजाइन छात्रों के लिए:** सेट निर्माण की यह तकनीक दिखाती है कि फाइबर और पीओपी जैसी हल्की सामग्री से भारी पत्थर जैसा टेक्सचर कैसे बनाया जाता है। विद्यार्थी इसे आधुनिक सिनेमाई मॉडल और प्रॉप मेकिंग की व्यावहारिक समझ के तौर पर देख सकते हैं।
- **फिल्म निर्माण लागत के लिहाज से:** असली पत्थर या इमारतें खड़ी करने के बजाय ऐसी डमी तकनीक समय और पैसे दोनों की भारी बचत कराती है। फिल्म निर्माता खाली मैदान में कुछ ही हफ्तों में मनचाहा ऐतिहासिक माहौल तैयार कर लेते हैं।
- **दृश्य प्रामाणिकता के स्तर पर:** कैमरे के लेंस और लाइटिंग के जरिए साधारण सामग्री भी परदे पर पूरी तरह जीवंत हो उठती है। इससे दर्शकों को सिनेमाई दृश्यों की बनावट को एक नए नजरिए से देखने की समझ मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
फिल्मों में प्राचीन और विशाल बस्तियों को असली पत्थरों से बनाना व्यावहारिक रूप से असंभव और बेहद खर्चीला होता है, इसलिए कला निर्देशक डमी तकनीकों का सहारा लेते हैं।

- **लागत और समय की सीमा:** वास्तविक पत्थरों से विशाल मंदिर या गांव का निर्माण करने में महीनों का समय और भारी बजट खर्च हो सकता है। पीओपी और फाइबर के ढांचे कुछ ही हफ्तों में खड़े किए जा सकते हैं और काम खत्म होने पर आसानी से हटाए जा सकते हैं।
- **कैमरे और लाइटिंग का तालमेल:** आधुनिक सिनेमाई कैमरों के सामने अगर सही रंग और टेक्सचर लगाया जाए, तो फाइबर की खोखली दीवार भी ठोस चट्टान जैसी नजर आती है। पेंटिंग की इस कलाकारी से सेट का वजन कम रहता है और स्क्रीन पर वास्तविकता बनी रहती है।
- **सुरक्षा और ढांचागत मजबूती:** जमीन पर टिके रहने के लिए केवल बेसमेंट को सीमेंट से बनाया जाता है ताकि कलाकार और क्रू सुरक्षित रहें। ऊपरी हिस्से को लोहे के फ्रेम पर पीओपी से बनाकर सेट के गिरने का जोखिम खत्म कर दिया जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म रणबली के सेट पर किस मंदिर को दर्शाया गया है?
इस सेट पर भद्रमल्लन्ना स्वामी के एक विशाल और पवित्र मंदिर को दर्शाया गया है।

### 2. मंदिर के निर्माण में असली सीमेंट का इस्तेमाल कहां हुआ है?
मजबूती और सुरक्षा के लिए केवल मंदिर के निचले बेसमेंट को ही असली सीमेंट से बनाया गया है।

### 3. गांव की झोपड़ियों की दीवारें किस सामग्री से बनाई गई हैं?
झोपड़ियों की दीवारें असली पत्थर की नहीं, बल्कि फाइबर और प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी खोखली डमी हैं।

### 4. सेट पर कौन से अन्य बड़े प्रॉप्स तैयार किए गए हैं?
सेट पर लकड़ी के विशाल रथ, पारंपरिक कुआं, पहरेदारों के पुतले और भीमकाय दैत्यों की आकृतियां सजाई गई हैं।

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