द पैराडाइज के लिए हैदराबाद में तैयार हुआ 30 एकड़ का ऐतिहासिक सेट, नानी और श्रीकांत ओडेला ने नकारी कंप्यूटर ग्राफिक्स की राह तेलुगु अभिनेता नानी की आगामी फिल्म द पैराडाइज के निर्माताओं ने 1980 के दशक के सिकंदराबाद को जीवंत करने के लिए 30 एकड़ जमीन पर वास्तविक मजदूर बस्ती का निर्माण किया है। तेलुगु सिनेमा के प्रमुख अभिनेता नानी और फिल्म निर्देशक श्रीकांत ओडेला ने अपनी नई परियोजना 'द पैराडाइज' में प्रामाणिकता लाने के लिए एक साहसी रचनात्मक फैसला लिया है। वर्तमान दौर में जब बड़े बजट की ज्यादातर फिल्मों में दृश्यों को भव्य दिखाने के लिए कंप्यूटर जनित ग्राफिक्स यानी CGI और ग्रीन स्क्रीन तकनीकों पर अत्यधिक भरोसा किया जाता है, वहीं इस फिल्म की निर्माण टीम ने आभासी दुनिया के बजाय वास्तविक दुनिया में एक विशाल साम्राज्य खड़ा करने का रास्ता चुना। वर्ष 1980 के दौर के सिकंदराबाद के सामाजिक ताने-बाने और वहां की एक मजदूर बस्ती की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करने के मकसद से करीब 30 एकड़ के विस्तृत भूभाग पर एक पूरा शहर बसाया गया है। कारीगरों की महीनों की साधना और 1980 के दशक का पुनर्निर्माण इस पूरी फिल्म की पटकथा 1980 के दशक के राजनीतिक-सामाजिक बदलावों, उथल-पुथल और समाज के सबसे निचले पायदान पर संघर्ष कर रहे वंचित वर्ग के जीवन संघर्ष पर केंद्रित है। उस बीते दौर की धूल, पसीने और गरीबी को पर्दे पर विश्वसनीय रूप देने के लिए निर्माण दल ने किसी भी तरह के डिजिटल शॉर्टकट से पूरी तरह परहेज किया। हैदराबाद के बाहरी इलाके में इस विशाल परियोजना को साकार करने के लिए सैकड़ों स्थानीय कारीगरों, कुशल बढ़इयों और अनुभवी राजमिस्त्रियों ने कई महीनों तक लगातार काम किया। इस बस्ती के अंदर बनाई गई कच्ची धूल भरी सड़कें, मिट्टी और ईंटों के जीर्ण-शीर्ण मकान, बेहद संकरी गलियां और उस दौर के ठेठ बाजार को इतनी बारीक कलात्मकता के साथ ढाला गया है कि यह किसी फिल्म का कृत्रिम सेट न लगकर दशकों पुरानी वास्तविक रिहायशी बस्ती प्रतीत होती है। मेहराबदार इमारत से लेकर अत्याचार कक्ष तक के वास्तविक ढांचे फिल्म के प्रचार सामग्री और शुरुआती टीज़र में दिखने वाले प्रमुख दृश्यों की शूटिंग इसी वास्तविक स्थल पर पूरी की गई है। फिल्म के मुख्य हिस्सों को जीवंत बनाने के लिए सेट पर कई अलग-अलग संरचनाएं तैयार की गईं • जिमनास्टिक्स रिंग्स वाली ऐतिहासिक इमारत: फिल्म में नानी द्वारा निभाए जा रहे किरदार 'जड़ाला' का एक बहुचर्चित दृश्य है, जिसमें वह मेहराबों वाली एक पुरानी इमारत के भीतर जिमनास्टिक्स रिंग्स के सहारे उल्टा लटकता दिखता है। इस दृश्य के लिए कोई नकली ढांचा नहीं बनाया गया, बल्कि पारंपरिक वास्तुकला और ठोस ईंटों की जुड़ाई के साथ यह पूरी इमारत खड़ी की गई। • मजदूरों पर अत्याचार का विशेष कक्ष: कहानी में बस्ती के शोषित मजदूरों से जबरन अंगूठे के निशान और दस्तखत लेने वाले खलनायक किरदार 'शिकंजा मालिक' के दमनकारी ठिकाने को लोहे की भारी जंजीरों, हथकड़ियों और ठोस लकड़ी के तख्तों से वास्तविक रूप में गढ़ा गया है। • कच्ची शराब की पारंपरिक भट्टी: कथानक की पृष्ठभूमि के अनुरूप बस्ती के भीतर अवैध कच्ची शराब की एक विशाल भट्टी, फटी-पुरानी छतों से ढके छप्पर और सैकड़ों की संख्या में मिट्टी के असली मटके स्थापित किए गए हैं। विंटेज वाहनों और विशाल द्वारों से मिला सजीव माहौल इस विशाल परिसर के भीतर दृश्य की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पुराने जमाने की विंटेज जीप और लकड़ी के भारी भरकम नक्काशीदार प्रवेश द्वारों को भी वास्तविक रूप से लगाया गया है। फिल्म निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि कंप्यूटर स्क्रीन के नीले और हरे बैकग्राउंड के मुकाबले ऐसे ठोस, भौतिक वातावरण में काम करने से कलाकारों को अपने किरदारों के दर्द, संघर्ष और मनोभावों को गहराई से महसूस करने और स्वाभाविक अभिनय करने में बड़ी मदद मिलती है। इसका आप पर असर फिल्म उद्योग में सीजीआई के बढ़ते चलन के बीच इस विशाल सेट का निर्माण दर्शकों और तकनीशियनों के लिए व्यावहारिक बदलाव दर्शाता है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: प्रामाणिक दृश्य अनुभव: बड़े पर्दे पर दर्शकों को कृत्रिम कंप्यूटर ग्राफिक्स के बजाय 1980 के दशक की धूल, धूप और यथार्थवादी माहौल देखने को मिलेगा। इससे सिनेमाई दुनिया से जुड़ाव कहीं अधिक गहरा और विश्वसनीय महसूस होता है। • स्थानीय कारीगरों और अर्थव्यवस्था पर असर: रोजगार के अवसर: सैकड़ों स्थानीय बढ़इयों, राजमिस्त्रियों और शिल्पकारों को महीनों तक सीधे काम और आजीविका मिली। यह बड़े बजट की फिल्मों में स्थानीय हुनर को डिजिटल तकनीकों के मुकाबले प्राथमिकता देने का व्यावहारिक उदाहरण है। • अभिनेताओं के अभिनय पर प्रभाव: स्वाभाविक प्रस्तुति: काल्पनिक हरी स्क्रीन के बदले वास्तविक ईंट, मिट्टी और लोहे के ढांचे में काम करने से कलाकारों के हावभाव अधिक स्वाभाविक होते हैं। इसका सीधा लाभ दर्शकों को अधिक सजीव और प्रभावशाली दृश्यों के रूप में मिलता है। • फिल्म निर्माण की शैली में बदलाव: व्यावहारिक सेट्स की वापसी: डिजिटल प्रभाव की निर्भरता घटाने से उद्योग में व्यावहारिक कला निर्देशन और सेट निर्माण की अहमियत दोबारा रेखांकित हुई है। अन्य प्रोडक्शन हाउस भी ऐतिहासिक कथाओं के लिए वास्तविक निर्माण की दिशा में प्रेरित हो सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ फिल्म निर्माताओं ने आधुनिक कंप्यूटर ग्राफिक्स के बजाय 30 एकड़ में वास्तविक सेट का निर्माण इसलिए किया क्योंकि कहानी की मांग और पीरियड प्रामाणिकता को डिजिटल तकनीक से पूरा नहीं किया जा सकता था। • कथानक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1980 के दशक का कच्चा यथार्थ: फिल्म की कहानी उस दौर के सिकंदराबाद और मजदूर बस्तियों के गहन सामाजिक संघर्षों पर आधारित है, जहां की धूल, गरीबी और माहौल को कंप्यूटर ग्राफिक्स से दर्शाना कृत्रिम लग सकता था। • रचनात्मक प्रामाणिकता की तलाश: कलाकारों को वास्तविक माहौल देना: निर्देशक श्रीकांत ओडेला और अभिनेता नानी ने दृश्यों में स्वाभाविकता लाने के लिए फैसला किया कि कलाकार नकली ग्रीन स्क्रीन के बजाय असली ईंटों, गलियों और संरचनाओं के बीच अभिनय करें। • बारीक कला निर्देशन की जरूरत: जटिल संरचनाओं की स्थापना: कहानी में जिमनास्टिक्स रिंग्स वाली इमारत, विंटेज जीप, शराब भट्टी और अत्याचार कक्ष जैसी कई भौतिक संरचनाओं की सीधी मौजूदगी जरूरी थी, जिसे स्थानीय कारीगरों की मदद से साकार किया गया। सवाल-जवाब 1. फिल्म 'द पैराडाइज' में नानी के किरदार का क्या नाम है? इस फिल्म में अभिनेता नानी 'जड़ाला' नामक किरदार निभा रहे हैं। 2. फिल्म का विशाल सेट कितने एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है? यह विशाल सेट हैदराबाद के बाहरी इलाके में लगभग 30 एकड़ जमीन पर बनाया गया है। 3. फिल्म की कहानी किस दौर और शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है? फिल्म की कहानी 1980 के दशक के सिकंदराबाद और वहां की एक मजदूर बस्ती की पृष्ठभूमि पर आधारित है। 4. फिल्म के निर्देशक कौन हैं? इस फिल्म का निर्देशन श्रीकांत ओडेला कर रहे हैं। 5. सेट पर किन प्रमुख संरचनाओं का निर्माण किया गया है? सेट पर पुरानी वास्तुकला वाली ईंटों की इमारत, जिमनास्टिक्स रिंग्स, अत्याचार कक्ष, कच्ची शराब की भट्टी और विशालकाय लकड़ी के प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। 6. कहानी में शोषित मजदूरों पर अत्याचार करने वाले खलनायक का क्या नाम है? कहानी में मजदूरों से जबरन दस्तखत और अंगूठे के निशान लेने वाले खलनायक का नाम शिकंजा मालिक है। https://trendkia.com/entertainment/the-paradise-ke-lie-hyderabad-men-taiyara-hua-30-ekara-ka-aitihasika-seta-nani-aura-srikanth-odela-ne-nakari-knpyutara-graphiksa-k-42261 TrendKia — Har trend, sabse pehle.