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  "title": "उत्तराखंड के बुजुर्ग कलाकारों की सादगी पर फिदा हुए नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक, कहा हम ऐसी अदाकारी नहीं कर सकते",
  "summary": "फिल्म 'पायर' की स्क्रीनिंग से पहले नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह ने उत्तराखंड के गैर-पेशेवर बुजुर्ग कलाकारों पदम सिंह और हीरा देवी से मुलाकात कर उनके अभिनय को नमन किया।",
  "content": "सिनेमा जगत में जब कई दशकों का अनुभव रखने वाले मंझे हुए कलाकार किसी आम इंसान के हुनर के आगे नतमस्तक हो जाएं, तो वह पल बेहद खास बन जाता है। निर्देशक विनोद कापड़ी की नई फिल्म 'पायर' अपनी अनूठी पृष्ठभूमि और कलाकारों के स्वाभाविक अंदाज के कारण इन दिनों खूब सुर्खियों में बनी हुई है। इस फिल्म के विशेष प्रदर्शन से ठीक पहले का एक भावुक वीडियो इंटरनेट पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस क्लिप में भारतीय सिनेमा के दो दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह फिल्म के मुख्य किरदारों से आत्मीयता के साथ बातचीत करते दिखाई दे रहे हैं।\n\nसामने आए इस वीडियो में जिन दो चेहरों ने सबका ध्यान खींचा, वे हैं उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल से आने वाले बुजुर्ग पदम सिंह जी और हीरा देवी जी। फिल्म के भीतर इन दोनों ने आमा और बुबू यानी दादा-दादी की केंद्रीय भूमिकाएं निभाई हैं। जीवन के इस पड़ाव तक दोनों ने कभी कैमरे का सामना नहीं किया था और न ही अभिनय का कोई औपचारिक प्रशिक्षण लिया था। इसके बावजूद उनकी सहज भाव-भंगिमाओं ने फिल्म उद्योग के दिग्गजों को भी चकित कर दिया है।\n\n \n\nदिग्गज कलाकारों का बड़प्पन और खुली तारीफ\nवायरल हो रही इस बातचीत के दौरान नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह ने दोनों बुजुर्गों से मुलाकात करते ही उनकी प्रतिभा की मुक्तकंठ से सराहना की। पदम सिंह जी और हीरा देवी जी के सामने आते ही नसीरुद्दीन शाह बेहद आदर के साथ मुखातिब हुए। उन्होंने दोनों की स्वाभाविक अदाकारी का सम्मान करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि आप दोनों ने जिस तरह की एक्टिंग की है, वैसी हम नहीं कर सकते। भारतीय सिनेमा के शीर्ष अभिनेता के मुंह से निकले इस सहज स्वीकार ने वहां खड़े तमाम लोगों की आंखें नम कर दीं और माहौल को बेहद खुशनुमा बना दिया।\n\nशुरुआती योजना में शामिल थे नसीर और रत्ना\nइस मुलाकात के पीछे की दास्तान भी उतनी ही दिलचस्प है। फिल्म के निर्देशक विनोद कापड़ी के अनुसार, जब इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, तब आमा और बुबू के इन मुख्य किरदारों के लिए पहली पसंद नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह ही थे। नसीरुद्दीन शाह को इस कहानी की संवेदनाएं और कथानक बेहद पसंद आया था। उस समय योजना यही थी कि दोनों मंझे हुए अभिनेता ही पर्दे पर इन पहाड़ी पात्रों को जीवंत करेंगे।\n\nहालांकि कहानी के विकास और रचनात्मक विमर्श के दौरान निर्देशक ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्हें लगा कि इस विषय के साथ पूरा न्याय तभी होगा जब पहाड़ की मिट्टी से जुड़े असली लोग ही इन किरदारों को पर्दे पर जिएं। इसी सोच के तहत पहाड़ों में रहने वाले दो बिल्कुल गैर-पेशेवर बुजुर्गों, पदम सिंह जी और हीरा देवी जी को चुना गया।\n\nपहाड़ी जीवन की सच्ची संवेदना ने मोहा मन\nपदम सिंह जी और हीरा देवी जी के लिए सेट और रोशनी की दुनिया पूरी तरह अनजानी थी। पहली बार कैमरे के लेंस के सामने खड़े होकर भी उन्होंने जिस सादगी से अपने भाव व्यक्त किए, उसने दर्शकों से लेकर समीक्षकों तक को गहरे प्रभाव में ले लिया है। उनके हाव-भाव में पहाड़ के दुर्गम जीवन का संघर्ष, पारिवारिक रिश्तों की मिठास और ढलती उम्र की कोमल अनुभूतियां बिल्कुल असली नजर आती हैं। यही वजह है कि जब नसीरुद्दीन शाह जैसे प्रतिष्ठित अभिनेता ने खुद को उनके हुनर के आगे विनम्र दिखाया, तो यह वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर व्यापक सराहना बटोरने लगा।\n\nइसका आप पर असर\nइस घटना से क्षेत्रीय सिनेमा और स्थानीय कलाकारों के प्रति दर्शकों तथा फिल्म निर्माताओं के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।\n\n• सिनेमा प्रेमियों के लिए: मुख्यधारा के दर्शकों को बिना किसी बनावट के वास्तविक ग्रामीण जीवन की कहानियों को देखने का अवसर मिलता है। इससे लोग केवल स्टार-पावर के बजाय यथार्थवादी कंटेंट और सशक्त पटकथाओं की तरफ आकर्षित होते हैं।\n• उत्तराखंड के कलाकारों के लिए: दूरदराज के पर्वतीय इलाकों में रहने वाली स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के नए रास्ते खुलते हैं। इससे यह विश्वास मजबूत होता है कि बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का काम किया जा सकता है।\n• फिल्म निर्माताओं के लिए: निर्देशकों को स्थापित सितारों के बजाए असल इंसानों के साथ प्रामाणिक कहानियां गढ़ने की रचनात्मक प्रेरणा मिलती है। इससे कम बजट में भी अत्यधिक प्रभावशाली सिनेमा तैयार करने का नया मॉडल विकसित होता है।\n• कला और अभिनय सीखने वालों के लिए: अभिनय में कृत्रिमता और अति-नाटकीयता के मुकाबले सहजता और सादगी का महत्व रेखांकित होता है। बड़े दिग्गजों द्वारा सादगी को तरजीह देना नए कलाकारों को जीवन के अनुभवों से सीखने की सीख देता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nफिल्म पायर की स्क्रीनिंग से पहले का यह वीडियो इसलिए चर्चा में आया क्योंकि इसमें देश के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में से एक ने बिना किसी औपचारिकता के पहली बार अभिनय करने वाले दो गैर-पेशेवर बुजुर्गों की प्रतिभा को सम्मान दिया।\n\n• गैर-पेशेवर कलाकारों का चयन: निर्देशक विनोद कापड़ी ने पर्वतीय परिवेश की असलियत पर्दे पर उतारने के लिए पेशेवर अभिनेताओं की जगह उत्तराखंड के आम बुजुर्ग ग्रामीणों को चुना। पदम सिंह जी और हीरा देवी जी ने जीवन में पहले कभी कैमरा नहीं देखा था, फिर भी उन्होंने बिना किसी बनावटीपन के किरदार निभाया।\n• शुरुआती कास्टिंग का बदलाव: शुरुआत में आमा और बुबू के ये किरदार स्वयं नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह निभाने वाले थे। बाद में जब वास्तविक ग्रामीणों को कास्ट किया गया, तो नसीरुद्दीन शाह ने उनका काम देखकर खुले दिल से उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की।\n• स्वाभाविक अभिनय की सराहना: नसीरुद्दीन शाह ने स्वयं यह बात कही कि वे दोनों बुजुर्ग जिस स्तर का सहज अभिनय कर गए, वह बड़े से बड़े प्रशिक्षित कलाकार के लिए भी मुमकिन नहीं है। दिग्गज अभिनेता के इसी बड़प्पन और वीडियो के भावुक पलों ने इसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फिल्म पायर का निर्देशन किसने किया है?\nइस फिल्म का निर्देशन विनोद कापड़ी ने किया है।\n\n2. फिल्म में आमा और बुबू का किरदार किन कलाकारों ने निभाया है?\nयह किरदार उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले बुजुर्ग पदम सिंह जी और हीरा देवी जी ने निभाया है।\n\n3. नसीरुद्दीन शाह ने पदम सिंह और हीरा देवी से क्या कहा?\nनसीरुद्दीन शाह ने उनकी तारीफ करते हुए कहा कि आप दोनों ने जिस तरह की एक्टिंग की है, वैसी हम नहीं कर सकते।\n\n4. क्या इन दोनों बुजुर्ग कलाकारों ने पहले कभी अभिनय किया था?\nनहीं, पदम सिंह जी और हीरा देवी जी ने इस फिल्म से पहले जीवन में कभी कैमरे का सामना नहीं किया था।\n\n5. शुरुआत में आमा और बुबू के किरदारों के लिए किन्हें कास्ट करने की योजना थी?\nनिर्देशक विनोद कापड़ी के अनुसार शुरुआत में इन किरदारों के लिए नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह को लेने की योजना बनाई गई थी।\n\nप्रेरणा और सबक\nपहाड़ों के दो बुजुर्गों की इस अनूठी उपलब्धि और नसीरुद्दीन शाह की विनम्रता से हर वर्ग के व्यक्ति को जीवन के कई गहरे सबक मिलते हैं।\n\n• हुनर की कोई उम्र नहीं होती: जीवन के किसी भी पड़ाव पर नई शुरुआत की जा सकती है और दुनिया को अपने छिपे हुए हुनर से चौंकाया जा सकता है। पदम सिंह और हीरा देवी ने बिना किसी पूर्व अनुभव के यह साबित कर दिखाया।\n• सादगी और स्वाभाविकता ही सबसे बड़ी ताकत है: बनावट और आडंबर के मुकाबले असलियत हमेशा दिलों को ज्यादा गहराई से छूती है। अपने जीवन की सच्ची भावनाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के व्यक्त करना ही सर्वोत्तम कला है।\n• महानता हमेशा विनम्रता में बसती है: वर्षों के अनुभव और शोहरत के बाद भी दूसरों की श्रेष्ठता को खुले दिल से स्वीकार करना सच्चे कलाकार की पहचान है। नसीरुद्दीन शाह का खुद को कमतर बताना उनकी असाधारण गरिमा को दर्शाता है।",
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  "publishedAt": "2026-09-22",
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