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  "type": "article",
  "title": "अज़रबैजान के स्कूलों में हिजाब पर पाबंदी से भड़का विरोध, तुर्की के साथ तल्खी बढ़ी",
  "summary": "अज़रबैजान के सरकारी स्कूलों में नए ड्रेस कोड के जरिए हिजाब पर लगी रोक के बाद छात्राओं और अभिभावकों का विरोध तेज हो गया है, जिस पर तुर्की की कड़ी प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोल दी है।",
  "content": "अज़रबैजान के सरकारी स्कूलों में नए यूनिफॉर्म नियमों को लागू किए जाने के बाद कक्षा में प्रवेश से रोकी गई छात्राओं का आक्रोश सड़कों पर नजर आने लगा है। सोशल मीडिया पर सामने आए कई वीडियो में स्कूल के मुख्य द्वार पर रोके जाने के बाद छात्राएं स्कूल कर्मियों से सवाल करती दिख रही हैं, जहां एक छात्रा ने पूछा कि क्या उसे स्कूल आने की इजाजत नहीं है और वह अपनी आस्था क्यों छोड़े। इस तरह के विरोध प्रदर्शन राजधानी बाकू से लेकर दक्षिणी जिलों तक फैल गए हैं, जिसे नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर धरपकड़ शुरू कर दी है।\n\nड्रेस कोड के नाम पर धार्मिक पोशाक पर सख्ती\nशिक्षा मंत्रालय द्वारा पिछले सोमवार से सख्ती से लागू किए जा रहे इन नियमों की बुनियाद 21 सितंबर को रखे गए उस फैसले पर टिकी है, जिसमें सरकारी शिक्षण संस्थानों में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले किसी भी पहनावे पर रोक लगाने की बात कही गई थी। हालांकि इन नियमों में सीधे तौर पर हिजाब शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन धरातल पर स्कूल प्रशासन छात्राओं के सिर पर बंधे कपड़े को देखकर उन्हें गेट से ही लौटा रहा है। बीते 6 अक्टूबर को इसी तरह के दिशा-निर्देश स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी लागू कर दिए गए थे। राजधानी बाकू के निकट स्थित बालाखानी में स्कूल नंबर 69 के बाहर प्रदर्शन कर रही छात्राओं ने तख्तियां थाम रखी थीं, जिन पर लिखा था कि हिजाब किसी भी व्यक्ति को शिक्षा हासिल करने से नहीं रोकता।\n\nप्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई और धरपकड़\nलगभग 10.5 मिलियन यानी 1 करोड़ 5 लाख आबादी वाले इस तेल और गैस उत्पादक देश में सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन बेहद दुर्लभ माने जाते हैं। आंतरिक मंत्रालय के अनुसार, नियमों के क्रियान्वयन में बाधा डालने और सार्वजनिक व्यवस्था का गंभीर उल्लंघन करने के आरोप में सोमवार को 37 लोगों को हिरासत में लिया गया। राजधानी के मश्तागा जिले में एक स्कूल के बाहर प्रदर्शन करने वाली महिला शाहिज़ा हुसेयनोवा को मंगलवार को हिरासत में ले लिया गया। जर्मनी से संचालित होने वाले अज़रबैजानी भाषा के स्वतंत्र चैनल मेदान टीवी से बातचीत में उनके पति आगा ने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि या तो वे अपनी बच्ची का हिजाब हटाकर उसे स्कूल भेजें या फिर जेल जाने के लिए तैयार रहें।\n\nइसी बीच प्रभावित छात्राओं की मदद के लिए आगे आए कार्यकर्ताओं पर भी शिकंजा कसता दिख रहा है। मंगलवार को 'लेट लैली गो टू स्कूल' नाम से एक ऑनलाइन मंच शुरू करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता इल्किन हुसेयनोव से उनके दोस्तों का संपर्क टूट गया है। यह मंच कक्षाओं से बाहर की गई छात्राओं को स्वयंसेवी शिक्षकों की मदद से मुफ्त ऑनलाइन पाठ उपलब्ध करा रहा था। एक मित्र के मुताबिक, हुसेयनोव बुधवार को शाम करीब 16:00 बजे कुछ अज्ञात लोगों के साथ बाकू स्थित अपने घर से निकले थे और तब से उनका फोन बंद आ रहा है। अधिकारियों ने इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, जबकि उनके साथियों को आशंका है कि उन्हें हिरासत में ले लिया गया है। गुरुवार को इस मंच का इंस्टाग्राम पेज भी पूरी तरह बंद हो गया, जबकि कई इंटरनेट उपभोक्ताओं ने बिना वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क অর্থাৎ VPN के इंस्टाग्राम और टिकटॉक चलाने में आ रही दिक्कतों की शिकायत की है।\n\nईरान की सीमा से लगते इलाकों में विरोध का केंद्र\nअज़रबैजान में अधिकांश विरोध प्रदर्शन बाकू की बाहरी बस्तियों और दक्षिण में ईरान के साथ लगने वाली 765 किलोमीटर (475 मील) लंबी सीमा के नजदीकी रूढ़िवादी धार्मिक जिलों, जैसे मसाल्ली और जलीलाबाद में केंद्रित रहे हैं। देश में साल 2003 से सत्ता संभाल रहे राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव असहमति की आवाजों को दबाने के लिए जाने जाते हैं, जहां विपक्षी नेता और कई स्वतंत्र पत्रकार जेलों में बंद हैं। अज़रबैजान संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सरकार इसे कड़ाई से लागू करती है। हालांकि यहां की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी शिया मुस्लिम पहचान रखती है, जबकि सीमा पार ईरान में अज़रबैजान की तुलना में अधिक जातीय अज़रबैजानी आबादी निवास करती है। अज़रबैजानी प्रशासन लंबे समय से ईरान के धार्मिक प्रभाव को लेकर सतर्क रहा है।\n\nइस तनाव के बीच 13 अक्टूबर की रात अज़रबैजान की विशेष संचार और सूचना सुरक्षा राज्य सेवा ने जानकारी दी कि एक विदेशी हैकर समूह ने 100 से अधिक सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाया। इस साइबर हमले की जिम्मेदारी खुद को '313 टीम (साइबर इस्लामिक रेजिस्टेंस)' बताने वाले एक ईरान समर्थक समूह ने ली। दूसरी ओर, सरकार के समर्थक इन नियमों का पुरजोर बचाव कर रहे हैं। सांसद निगार अरपदारई ने 1news.az वेबसाइट से बातचीत में तर्क दिया कि बच्चे खुद हिजाब पहनने का फैसला नहीं करते, बल्कि उन पर परिवारों का प्रभाव होता है। उन्होंने कहा कि एक बच्चे के पास धर्म चुनने की स्वतंत्रता नहीं होती और यह वयस्कों का एक सचेत विशेषाधिकार है।\n\nतुर्की के साथ कूटनीतिक तल्खी और आंतरिक विवाद\nइस फैसले की गूंज अब अज़रबैजान के सबसे करीबी सहयोगी तुर्की तक पहुंच गई है, जिसने 2020 में नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया के साथ हुए युद्ध में बाकू को निर्णायक समर्थन दिया था। दोनों देश पारंपरिक रूप से खुद को 'एक राष्ट्र, दो राज्य' के रूप में पेश करते आए हैं। तुर्किक भाषाई परिवार से जुड़े होने के बावजूद दोनों के बीच धार्मिक परिदृश्य अलग है, जहां तुर्की में सुन्नी बहुसंख्या है, वहीं अज़रबैजान शिया बहुल है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, जो एक निष्ठावान मुस्लिम हैं और धार्मिक पीढ़ी तैयार करने की वकालत करते रहे हैं, के मुख्य सलाहकार ओकते सरल ने अज़रबैजान की इस पाबंदी को अस्वीकार्य करार दिया। उन्होंने बाकू से इस गलती को सुधारने का आह्वान करते हुए एक्स पर लिखा कि सिर पर दुपट्टा या हिजाब कोई रुकावट नहीं है, बल्कि यह किसी के विश्वास की आवश्यकता है।\n\nतुर्की की सत्तारूढ़ एके पार्टी के कई अन्य सांसदों ने भी इस रुख का समर्थन किया। तुर्की में हिज़्ब उत-तहरीर से जुड़े इस्लामी आंदोलन कोकलू देगिशिम ने अंकारा में अज़रबैजानी दूतावास के बाहर और रूढ़िवादी इस्लामी समूह ओजगुर-देर ने इस्तांबुल स्थित वाणिज्य दूतावास के सामने छोटे पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। इसके जवाब में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव की न्यू अज़रबैजान पार्टी ने तुर्की के अधिकारियों पर खुले तौर पर मानहानि अभियान चलाने और निराधार आरोप लगाने का आरोप लगाया। पार्टी ने चेतावनी दी कि ओकते सरल की टिप्पणियां द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती हैं, साथ ही देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नसीहत दी। इससे पहले इसी महीने इल्हाम अलीयेव ने दो टूक शब्दों में कहा था कि किसी को भी उनके जीने के तौर-तरीकों में नाक नहीं अड़ाना चाहिए।\n\nक्षेत्रीय कूटनीति और इज़राइल से रिश्तों की उलझन\nइस विवाद के पीछे एक और गहरा कूटनीतिक पहलू छिपा है। तुर्की में प्रदर्शन कर रहे गुटों ने हिजाब संबंधी नए नियमों को अज़रबैजान के इज़राइल के साथ मजबूत होते संबंधों से जोड़ा है। इज़राइल बाकू को हथियारों की आपूर्ति करता है और बदले में अज़रबैजान से कच्चा तेल खरीदता है। गाजा संकट के बाद तुर्की और इज़राइल के कूटनीतिक संबंध लगभग पूरी तरह टूट चुके हैं, जबकि अज़रबैजान दोनों देशों के साथ अपने रिश्ते संतुलित रखने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है।\n\nयह कूटनीतिक संतुलन बाकू के लिए कितना मुश्किल होता जा रहा है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण गुरुवार को देखने को मिला। जब इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने बाकू में आयोजित एक क्षेत्रीय सुरक्षा शिखर सम्मेलन को संबोधित करना शुरू किया, तब तुर्की, ईरान और कई अन्य देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने हॉल से वॉकआउट कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।\n\nइसका आप पर असर\nअज़रबैजान में शिक्षण संस्थानों के भीतर ड्रेस कोड के कड़े नियमों और क्षेत्रीय कूटनीतिक तनाव का सीधा असर आम नागरिकों की शिक्षा और दैनिक स्वतंत्रता पर पड़ रहा है।\n\n• शिक्षा पर असर: हिजाब पहनने वाली छात्राओं को स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। इसके चलते कई छात्राओं की नियमित पढ़ाई रुक गई है और परिवारों के सामने कानूनी कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा है।\n• इंटरनेट व सूचना पर प्रभाव: प्रदर्शनों के बाद इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसी सोशल मीडिया सेवाओं पर तकनीकी रुकावटें आ रही हैं। आम उपयोगकर्ताओं को इन मंचों तक पहुंचने के लिए वीपीएन का सहारा लेना पड़ रहा है।\n• कानूनी व सुरक्षा जोखिम: स्कूलों के बाहर नियम का विरोध करने वाले माता-पिता और कार्यकर्ताओं को पुलिस हिरासत में ले रही है। सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन के आरोप में जेल जाने या गंभीर कानूनी कार्रवाई का सीधा खतरा बना हुआ है।\n• क्षेत्रीय कूटनीति: तुर्की और अज़रबैजान के बीच कूटनीतिक तल्खी से दोनों देशों के पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। दोनों देशों के नागरिकों के बीच इस मुद्दे पर वैचारिक विभाजन गहरा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nअज़रबैजान में यह विवाद सरकारी स्कूलों में 21 सितंबर को अनुमोदित धर्मनिरपेक्ष यूनिफॉर्म नियमों को कड़ाई से लागू करने के बाद पैदा हुआ है। सरकार देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को सख्ती से बनाए रखने और सीमा पार से आने वाले धार्मिक प्रभावों को सीमित करने का प्रयास कर रही है।\n\n• धर्मनिरपेक्षता की अनिवार्यता: अज़रबैजान का संविधान धर्मनिरपेक्ष है और प्रशासन किसी भी तरह के धार्मिक प्रतीक को सरकारी शिक्षण संस्थानों से दूर रखना चाहता है। इसी नीति के तहत 21 सितंबर को नए नियम बने और 6 अक्टूबर को शिक्षकों पर भी लागू किए गए।\n• ईरान का धार्मिक प्रभाव: अज़रबैजान की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी शिया मुस्लिम है और देश की 765 किलोमीटर लंबी सीमा ईरान से लगती है। सरकार लंबे समय से सीमा पार से आने वाले धार्मिक व राजनीतिक प्रभाव को लेकर सतर्क रही है।\n• तुर्की की वैचारिक प्रतिक्रिया: तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन एक धार्मिक पीढ़ी तैयार करने की नीति पर चलते हैं। इस कारण उनके सलाहकारों और सांसदों ने बाकू की इस पाबंदी को सीधे धार्मिक आस्था पर हमला मानते हुए सार्वजनिक विरोध दर्ज कराया।\n• इज़राइल के साथ संबंध: इज़राइल से हथियार खरीदने और तेल बेचने के अज़रबैजान के संबंधों को लेकर तुर्की के रूढ़िवादी समूह नाराज हैं। गाजा संकट के बाद इस नाराजगी ने हिजाब प्रतिबंध के विरोध को और अधिक हवा दी है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अज़रबैजान के स्कूलों में किस बात को लेकर विवाद शुरू हुआ?\nसरकारी स्कूलों में नए यूनिफॉर्म नियमों के तहत हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश देने से रोक दिया गया, जिससे विरोध शुरू हुआ।\n\n2. अज़रबैजान की पुलिस ने कितने लोगों को हिरासत में लिया है?\nआंतरिक मंत्रालय के अनुसार, नियमों के कार्यान्वयन में बाधा डालने और व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में 37 लोगों को हिरासत में लिया गया है।\n\n3. तुर्की ने अज़रबैजान के इस कदम पर क्या प्रतिक्रिया दी?\nतुर्की के राष्ट्रपति के मुख्य सलाहकार ओकते सरल ने इस प्रतिबंध को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि सिर का दुपट्टा आस्था का हिस्सा है, कोई रुकावट नहीं।\n\n4. क्या हिजाब प्रतिबंध के नियम में सीधे हिजाब शब्द लिखा गया है?\nनहीं, 21 सितंबर के नियमों में हिजाब का नाम नहीं है, बल्कि शिक्षा में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विपरीत कपड़ों पर रोक लगाई गई है।\n\n5. 'लेट लैली गो टू स्कूल' अभियान क्या था?\nयह इल्किन हुसेयनोव द्वारा शुरू किया गया एक ऑनलाइन मंच था, जो स्कूल से रोकी गई छात्राओं को मुफ्त ऑनलाइन शिक्षा दे रहा था।\n\n6. बाकू शिखर सम्मेलन में इज़राइल के राष्ट्रपति के भाषण के दौरान क्या हुआ?\nजब इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भाषण शुरू किया, तो तुर्की और ईरान सहित कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने वॉकआउट किया।",
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  "publishedAt": "2026-10-15",
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