बिना एयरपोर्ट और मुद्रा वाले सबसे अमीर मुल्क के प्रिंस एलॉइस चार दिन के भारतीय दौरे पर पहुंचे यूरोपीय रियासत लिकटेंस्टीन के कार्यवाहक प्रमुख प्रिंस एलॉइस अपनी पत्नी प्रिंसेस सोफी और कारोबारी दल के साथ नई दिल्ली पहुंचे हैं। इस यात्रा के दौरान आर्थिक साझेदारी, तकनीक और नवाचार पर भारतीय नेतृत्व के साथ उच्चस्तरीय चर्चा होगी। यूरोप के केंद्र में आल्प्स की खूबसूरत वादियों में बसे अनोखे देश लिकटेंस्टीन के कार्यवाहक राष्ट्रप्रमुख प्रिंस एलॉइस रविवार को चार दिनों के आधिकारिक दौरे पर भारत पहुंचे। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी प्रिंसेस सोफी और प्रमुख उद्योगपतियों का एक बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी आया है। अपनी इस महत्वपूर्ण यात्रा के दौरान वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ व्यापक द्विपक्षीय बातचीत करेंगे, जिसका मुख्य फोकस दोनों देशों के बीच वाणिज्य, पूंजी निवेश, विज्ञान और आधुनिक नवाचार को बढ़ावा देना है। कम आबादी लेकिन बेहिसाब आर्थिक ताकत भौगोलिक रूप से बहुत छोटा होने के बावजूद यह देश वैश्विक पटल पर अपनी जबरदस्त आर्थिक समृद्धि के लिए जाना जाता है। केवल 40,000 की आबादी वाले इस देश ने आर्थिक संपन्नता के कई रिकॉर्ड बनाए हैं। वर्ल्ड एटलस के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 में लिकटेंस्टीन की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP (PPP) 195,372 अमेरिकी डॉलर दर्ज की गई। इसी असाधारण आंकड़े की बदौलत 2026 में इसने दुनिया के सर्वाधिक अमीर राष्ट्र होने का गौरव हासिल किया। प्रकृति की गोद में बसी इस छोटी सी रियासत में साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। स्विस फ्रैंक पर टिकी अर्थव्यवस्था और साझा व्यवस्था स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया की सीमाओं से घिरे इस देश की राजधानी वाडुज़ है। इस संप्रभु मुल्क की सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि इसका न तो कोई अपना केंद्रीय बैंक है और न ही अपनी कोई राष्ट्रीय मुद्रा चलती है। यह देश पूरी तरह से स्विस फ्रैंक (CHF) पर निर्भर है, जिसका संचालन स्विस नेशनल बैंक करता है। पड़ोसी स्विट्जरलैंड के साथ सीमा शुल्क और मौद्रिक समझौते के जरिए इस पूरे वित्तीय तंत्र को औपचारिक रूप दिया गया है। पड़ोसी मुल्क पर वित्तीय निर्भरता के बाद भी लिकटेंस्टीन एक पूरी तरह से आजाद और संप्रभु राष्ट्र के रूप में कार्य करता है। सैकड़ों साल पुराना इतिहास और सैन्य तटस्थता की मिसाल अमेरिकी विदेश विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, इस छोटे राष्ट्र का एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व वर्ष 1719 से दर्ज है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो ऑस्ट्रिया के लिकटेंस्टीन राजघराने ने साल 1699 में वाडुज़ और 1713 में शेलनबर्ग के इलाकों को अपने नियंत्रण में लिया था। आगे चलकर 1719 में पवित्र रोमन साम्राज्य के तहत इन दोनों रियासतों को मिलाकर लिकटेंस्टीन नाम से एक स्वतंत्र रियासत का औपचारिक गठन किया गया था। नेपोलियन के दौर में फ्रांसीसी सेना ने कुछ वर्षों तक इस इलाके पर अधिकार जमाया था, मगर 1815 में बने नए जर्मन परिसंघ के भीतर इस मुल्क को दोबारा पूर्ण स्वतंत्रता मिल गई। इसके बाद वर्ष 1868 में जब यह परिसंघ समाप्त हुआ, तब लिकटेंस्टीन ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए अपनी 80 जवानों वाली छोटी सेना को हमेशा के लिए भंग कर दिया और खुद को सैन्य दृष्टि से पूर्णतः तटस्थ घोषित कर दिया। इस ऐतिहासिक तटस्थता का सम्मान दोनों विश्व युद्धों की भारी विभीषिका के दौरान भी पूरी तरह कायम रहा। यातायात का अनोखा ढांचा: न कोई हवाई अड्डा, न बंदरगाह लिकटेंस्टीन के पास अपना कोई अंतरराष्ट्रीय या घरेलू हवाई अड्डा नहीं है और चारों तरफ जमीन से घिरे होने के कारण यहां कोई समुद्री बंदरगाह भी मौजूद नहीं है। बाहर से आने वाले यात्री अमूमन पड़ोसी ऑस्ट्रिया अथवा स्विट्जरलैंड के हवाई अड्डों पर उतरते हैं और वहां से रेल, बस या निजी कारों के जरिए सीमा पार करके वाडुज़ पहुंचते हैं। आपात और विशिष्ट उड़ानों के लिए बाल्ज़र्स में केवल एक छोटा हेलीपोर्ट तैयार किया गया है, जो हेलीकॉप्टरों की आवाजाही को संभालता है। राजशाही और संसद के बीच शक्ति का अनूठा संतुलन शासन व्यवस्था की बात करें तो लिकटेंस्टीन में वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र प्रणाली लागू है, जहां राजकुमार राष्ट्र के सर्वोच्च प्रमुख होते हैं। राजकुमार विदेशी मंचों पर देश की नुमाइंदगी करते हैं और वैश्विक स्तर की संधियों पर हस्ताक्षर करने का अंतिम अधिकार रखते हैं। वहीं आंतरिक प्रशासन एक सामूहिक निकाय संभालता है, जिसमें सरकार के प्रमुख और चार अन्य पार्षद शामिल होते हैं। संसद की मंजूरी मिलने के उपरांत ही राजकुमार द्वारा इन सभी सरकारी पार्षदों की आधिकारिक नियुक्ति की जाती है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, देश के कानून निर्माण में राजकुमार को अहम अधिकार हासिल हैं, जिनमें सरकारी विधेयक पेश कराने की पहल और संसदीय फैसलों पर वीटो लगाने की शक्ति शामिल है। राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा जनहित पर बड़ा संकट आने की स्थिति में वे आपातकालीन शाही आदेश जारी कर सकते हैं, यद्यपि इसके वैध होने के लिए सरकार के प्रमुख के प्रति-हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। व्यापारिक साझेदारी को नई गति देने की तैयारी विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, प्रिंस एलॉइस के इस चार दिवसीय दौरे से भारत और लिकटेंस्टीन के मध्य सहयोग का नया अध्याय शुरू होगा। विशेष रूप से वर्ष 2025 में प्रभाव में आए भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) के उपरांत दोनों पक्षों के व्यापारिक संबंधों में नई ऊर्जा आई है। MEA ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यह दौरा आपसी साझेदारी को गहरा करने और आर्थिक एवं तकनीकी मोर्चे पर भविष्य के नए रास्ते तलाशने का बेहतरीन मौका साबित होगा। इसका आप पर असर इस द्विपक्षीय यात्रा से भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र के बीच वाणिज्यिक निवेश और उच्च-तकनीक के अवसरों को गति मिलेगी। • भारतीय उद्योग पर असर: भारतीय विनिर्माताओं और सेवा निर्यातकों को उच्च-स्तरीय यूरोपीय तकनीक और निवेश हासिल करने में सीधी मदद मिलेगी। इस साझेदारी से उन्नत विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा और आईटी सेवा क्षेत्रों में नए संयुक्त उपक्रम स्थापित हो सकते हैं। • आयात और शुल्क व्यवस्था: भारत और ईएफटीए देशों के बीच हुए समझौते के तहत व्यापारिक प्रक्रियाओं में और सुगमता आने के आसार हैं। इससे चुनिंदा आधुनिक उपकरणों और विशेषीकृत सामानों के आयात पर लागत कम हो सकती है। • छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए अवसर: विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में सहयोग बढ़ने से भारतीय शोधकर्ताओं को अल्पाइन क्षेत्र के आधुनिक संस्थानों के साथ काम करने का मंच मिलेगा। उच्च शिक्षा और तकनीकी आदान-प्रदान के नए मार्ग प्रशस्त होंगे। • वैश्विक निवेश और वित्तीय प्रवाह: लिकटेंस्टीन जैसे अत्यंत समृद्ध वित्तीय केंद्र के साथ मजबूत संबंध भारत के बुनियादी ढांचे में विदेशी संस्थागत निवेश को आकर्षित करने में सहायक होंगे। भारतीय स्टार्टअप्स और फिनटेक कंपनियों को नए निवेशक मिल सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ प्रिंस एलॉइस की यह भारत यात्रा दोनों देशों के बीच व्यापारिक, वैज्ञानिक और तकनीकी रिश्तों को औपचारिक रूप से और मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित की गई है। • आर्थिक समझौते को व्यावहारिक रूप देना: वर्ष 2025 में लागू हुए भारत-EFTA व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) के बाद द्विपक्षीय संबंधों को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए यह उच्चस्तरीय बैठक आवश्यक थी। दोनों देश व्यापारिक प्रवाह को तेजी से बढ़ाने के लिए ठोस रोडमैप तैयार करना चाहते हैं। • नवाचार और निवेश की साझा जरूरत: लिकटेंस्टीन अपने भारी वित्तीय अधिशेष और उन्नत तकनीक के लिए नए बड़े बाजारों की तलाश में है, जबकि भारत को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए वैश्विक पूंजी की आवश्यकता है। यह परस्पर आर्थिक पूरकता इस बैठक की मुख्य वजह बनी। • कूटनीतिक संपर्क का विस्तार: भारत लगातार यूरोप के सभी महत्वपूर्ण और आर्थिक रूप से संपन्न देशों के साथ सीधे राजनयिक संबंध प्रगाढ़ कर रहा है। प्रिंस एलॉइस का यह दौरा इसी बहुपक्षीय और द्विपक्षीय कूटनीतिक रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है। सवाल-जवाब 1. प्रिंस एलॉइस की भारत यात्रा का मुख्य उद्देश्य क्या है? इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य भारत और लिकटेंस्टीन के बीच व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्रों में द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करना है। 2. प्रिंस एलॉइस के साथ भारत दौरे पर कौन-कौन आया है? प्रिंस एलॉइस के साथ उनकी पत्नी प्रिंसेस सोफी और प्रमुख उद्योगपतियों का एक उच्चस्तरीय व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भारत आया है। 3. लिकटेंस्टीन किस मुद्रा का उपयोग करता है? लिकटेंस्टीन की अपनी कोई मुद्रा नहीं है; यह स्विट्जरलैंड के साथ मौद्रिक समझौते के तहत स्विस नेशनल बैंक द्वारा जारी स्विस फ्रैंक (CHF) का इस्तेमाल करता है। 4. साल 2026 में लिकटेंस्टीन की प्रति व्यक्ति आय कितनी आंकी गई? वर्ल्ड एटलस के अनुसार, 2026 में लिकटेंस्टीन की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP (PPP) 195,372 अमेरिकी डॉलर रही, जिससे यह दुनिया का सबसे अमीर देश बना। 5. लिकटेंस्टीन में हवाई अड्डे न होने पर लोग वहां कैसे पहुंचते हैं? लोग पड़ोसी देश ऑस्ट्रिया या स्विट्जरलैंड के हवाई अड्डों पर उतरकर वहां से सड़क मार्ग, ट्रेन या बस के जरिए लिकटेंस्टीन पहुंचते हैं, जबकि बाल्ज़र्स में एक हेलीपोर्ट भी है। 6. लिकटेंस्टीन में सेना कब भंग की गई थी? साल 1868 में जर्मन परिसंघ भंग होने के बाद लिकटेंस्टीन ने अपनी 80 सैनिकों वाली सेना को समाप्त कर खुद को स्थायी रूप से तटस्थ घोषित कर दिया था। https://trendkia.com/europe/bina-eyaraporta-aura-mudra-vale-sabase-amira-mulka-ke-prince-alois-chara-dina-ke-bharatiya-daure-para-pahunche-53366 TrendKia — Har trend, sabse pehle.