बुडापेस्ट में सूखे से डेन्यूब नदी का जलस्तर घटा, 80 साल बाद मिले द्वितीय विश्व युद्ध के जर्मन सैनिकों के अवशेष और बाइक यूरोप में पड़े भीषण सूखे के कारण डेन्यूब नदी का जलस्तर ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचने से द्वितीय विश्व युद्ध के दो जर्मन सैनिकों के कंकाल, एक सैन्य मोटरसाइकिल और विस्फोटक बरामद हुए हैं। मध्य यूरोप में पड़े भीषण सूखे की वजह से डेन्यूब नदी का जलस्तर ऐतिहासिक रूप से बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आठ दशकों से नदी की तलहटी में दबे द्वितीय विश्व युद्ध के रहस्य बाहर आने लगे हैं। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में नदी का पानी घटने के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दो जर्मन सैनिकों के कंकाल, उनके व्यक्तिगत सामान, सैन्य पदक, जिंदा एंटी-टैंक माइंस और बेहद अच्छी हालत में एक वेहरमाख्ट सैन्य मोटरसाइकिल बरामद हुई है। इस अप्रत्याशित खोज ने 80 साल से अधिक समय से लापता सैनिकों के परिवारों में अपने पूर्वजों का सुराग मिलने की नई उम्मीद जगा दी है। बुडापेस्ट में नदी किनारे ऐसे हुआ अचानक खुलासा यह पूरा मामला 2 अगस्त का है, जब मध्य बुडापेस्ट में डेन्यूब नदी के किनारे टहल रहे राहगीरों की नजर पत्थरों और कीचड़ के बीच से बाहर निकली एक मोटरसाइकिल के धातुई हिस्से पर पड़ी। पानी घटने के कारण नदी किनारे फंसी इस पुरानी मोटरसाइकिल को देखकर लोगों ने तुरंत स्थानीय प्रशासन को सूचना दी। जब गोताखोरों और राहत दल ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की, तो वाहन के पास ही दो सैनिकों के अवशेष भी मिले। अवशेषों की सफाई और आसपास की खुदाई के दौरान अचानक स्थिति गंभीर हो गई, क्योंकि वहां से कई जिंदा एंटी-टैंक माइंस भी बरामद हुईं। पुराने विस्फोटकों के मिलने से वहां हड़कंप मच गया, जिसके बाद तुरंत बम निरोधक दस्ते को बुलाया गया। सुरक्षा कारणों से बुडापेस्ट के उस नदी तट को कुछ समय के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया और पूरे इलाके को सील कर दिया गया। विशेषज्ञ टीम द्वारा सभी माइंस को सुरक्षित रूप से निष्क्रिय और हटाने के बाद ही खोजी दल ने अपना काम दोबारा शुरू किया। कीचड़ और तेल से 80 साल तक सुरक्षित रही बाइक नदी के पानी से बरामद हुई वस्तुओं में सबसे खास एक सैन्य मोटरसाइकिल थी, जो आठ दशकों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद लगभग सही-सलामत हालत में मिली है। जर्मन सरकार की ओर से युद्ध में मारे गए सैनिकों की खोज और दफनाने का काम करने वाली संस्था जर्मन वॉर ग्रेव्स कमीशन के अनुसार, यह मोटरसाइकिल DKW NZ 350-1 मॉडल की है। इस विशेष मॉडल का निर्माण जर्मनी में 1944 से मुख्य रूप से सैन्य अभियानों के लिए शुरू किया गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि इतने लंबे समय बाद भी मोटरसाइकिल और अन्य सामान के सुरक्षित रहने की मुख्य वजह नदी की तलहटी में मौजूद बंदरगाह का गाद और इंजन का तेल था। कीचड़ और तेल के इस मिश्रण ने सभी धातुई हिस्सों पर एक रोधी परत बना दी, जिससे पानी और ऑक्सीजन का संपर्क कट गया और लोहे में जंग नहीं लगा। मोटरसाइकिल के अलावा मौके से एक शादी की अंगूठी और एक कुबान शील्ड भी मिली है, जो 1943 में कुबान के कठिन युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों को दिया जाने वाला एक प्रमुख सैन्य सम्मान था। पहचान पत्र, वाफेन-एसएस का कनेक्शन और अधूरा इंतजार मारे गए सैनिकों की पहचान से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण सुराग दो धातुई पहचान पत्र (डॉग टैग) के रूप में मिले। जर्मन वॉर ग्रेव्स कमीशन की जांच में सामने आया कि इनमें से एक पहचान पत्र सामान्य जर्मन थलसेना (वेहरमाख्ट) के सैनिक का था, जबकि दूसरा वाफेन-एसएस के सदस्य का था। वाफेन-एसएस नाजी पार्टी की सैन्य शाखा थी, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1946 के न्यूरमबर्ग ट्रायल्स में युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए एक आपराधिक संगठन घोषित किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना में डॉग टैग के इस्तेमाल का एक विशेष नियम था। इन धातु की पट्टियों के बीच में एक कट का निशान होता था ताकि सैनिक की मौत होने पर उसे आसानी से दो टुकड़ों में तोड़ा जा सके। नियम के मुताबिक, डॉग टैग का एक हिस्सा मृत सैनिक के शव के साथ ही छोड़ दिया जाता था ताकि भविष्य में शव निकालने पर पहचान हो सके, जबकि दूसरा आधा हिस्सा जर्मन सैन्य मुख्यालय भेजा जाता था। मुख्यालय उसी के आधार पर हताहतों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करता था और सैनिक के परिवार को उसकी मौत की सूचना भेजता था। बुडापेस्ट में मिले दोनों डॉग टैग बिना टूटे पूरी तरह से साबुत थे, जिसका मतलब है कि इन दोनों सैनिकों की मौत की खबर कभी सैन्य अधिकारियों तक पहुंची ही नहीं और उनके परिवार 80 साल तक उनके लौटने का इंतजार करते रह गए। फॉरेंसिक जांच और पहचान सुलझाने की जटिल पहेली जर्मन वॉर ग्रेव्स कमीशन के प्रतिनिधि आर्ने श्राडर ने एक जर्मन समाचार पत्र को बताया कि सैनिकों की सटीक पहचान तय करना एक बेहद जटिल और लंबी प्रक्रिया होगी। उन्होंने कहा कि पहचान पत्र पर दर्ज नंबरों के आधार पर पुराने सैन्य अभिलेखों से मूल नाम तो जल्द ही सामने आ सकते हैं, लेकिन यह साबित करना कि मिले हुए कंकाल उन्हीं नाम वाले सैनिकों के हैं, एक बड़ी पहेली है। जांच अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नदी के बहाव या युद्ध की अराजकता के दौरान पहचान पत्र और कुबान शील्ड किसी अन्य सैनिक के सामान से तो नहीं बदल गए। इसके लिए फॉरेंसिक वैज्ञानिक कंकालों का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जिसमें हड्डियों की संरचना, मौत के समय अनुमानित उम्र, लंबाई, दांतों का ढांचा और चोटों के निशानों की जांच की जाएगी। इन सभी फॉरेंसिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों का मिलान करने के बाद ही आधिकारिक तौर पर सैनिकों के नामों की पुष्टि हो सकेगी। बुडापेस्ट का खूनी इतिहास और भीषण घेराबंदी डेन्यूब नदी से इन अवशेषों का मिलना द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दौर में बुडापेस्ट में हुए भीषण युद्ध की याद दिलाता है। 1944 के अंत और 1945 की शुरुआत में, सोवियत रेड आर्मी ने बुडापेस्ट शहर को चारों तरफ से घेर लिया था। शहर पर कब्जे के लिए सोवियत सेना और रक्षा कर रही जर्मन वेहरमाख्ट तथा हंगेरियन टुकड़ियों के बीच महीनों तक आमने-सामने की खूनी लड़ाई चली थी। डेन्यूब नदी के पुलों और तटों पर हुए भारी हमलों के दौरान अनगिनत सैनिक और सैन्य वाहन नदी में डूब गए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में रुचि रखने वाले सामाजिक समूहों और ऑनलाइन मंचों पर इस खोज की काफी चर्चा हो रही है। युद्ध में लापता हुए अपने पूर्वजों की जानकारी खोजने वाले लोगों ने संतोष व्यक्त किया है कि भले ही सूखा एक चिंताजनक प्राकृतिक समस्या है, लेकिन इसके कारण कम से कम आठ दशकों से लापता सैनिकों के अवशेष उनके परिवारों को सौंपे जा सकेंगे और उन्हें सम्मानजनक विदाई मिल सकेगी। बुडाओर्स में अंतिम संस्कार और डेन्यूब का व्यापक असर सभी फॉरेंसिक प्रक्रियाओं और कानूनी औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद, दोनों सैनिकों के अवशेषों को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट के पास स्थित बुडाओर्स के जर्मन युद्ध कब्रिस्तान में पूरे सम्मान के साथ दफनाया जाएगा। जर्मन वॉर ग्रेव्स कमीशन दुनिया भर में फैले युद्ध स्थलों से अपने सैनिकों के अवशेषों को खोजकर उन्हें सम्मानपूर्वक दफनाने का अभियान लगातार चला रहा है। डेन्यूब नदी में द्वितीय विश्व युद्ध के अवशेष मिलने की यह कोई अकेली घटना नहीं है। यूरोप में लगातार पड़ रहे सूखे के कारण मध्य और पूर्वी यूरोप से गुजरने वाली डेन्यूब नदी का जलस्तर कई जगहों पर घट गया है। इससे पहले सर्बिया के प्राहोवो के पास नदी का पानी कम होने से द्वितीय विश्व युद्ध के समय डूबे हुए कई जर्मन युद्धपोत और उनके कंकाल पानी के ऊपर तैरते हुए दिखाई दिए थे। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तनों के कारण नदियां सूख रही हैं, इतिहास के पन्नों में दबे ऐसे कई राज बाहर आ रहे हैं। इसका आप पर असर यूरोप और वैश्विक स्तर पर: जलवायु परिवर्तन और सूखे के कारण नदियों का जलस्तर घटने से जलमार्गों में छिपे ऐतिहासिक युद्ध अवशेष और पुराने विस्फोटक सामने आ रहे हैं, जिससे तटीय इलाकों में सुरक्षा जांच जरूरी हो गई है। परिवारों और शोधकर्ताओं के लिए: द्वितीय विश्व युद्ध में लापता हुए सैनिकों के परिजनों को 80 साल बाद उनके अवशेष और पहचान मिलने से लंबे समय से जारी अनिश्चितता खत्म हो रही है। सवाल-जवाब 1. बुडापेस्ट में डेन्यूब नदी से क्या बरामद हुआ है? सूखे की वजह से नदी का जलस्तर घटने पर द्वितीय विश्व युद्ध के दो जर्मन सैनिकों के कंकाल, एक DKW NZ 350-1 मोटरसाइकिल, पहचान पत्र (डॉग टैग), एक शादी की अंगूठी, कुबान शील्ड और जिंदा एंटी-टैंक माइंस बरामद हुए। 2. 80 साल तक पानी में रहने के बाद भी सामान इतना सुरक्षित कैसे रहा? जर्मन वॉर ग्रेव्स कमीशन के अनुसार, नदी की तलहटी में मौजूद बंदरगाह के गाद (कीचड़) और इंजन के तेल के मिश्रण ने सामान पर एक सुरक्षात्मक परत बना दी, जिससे धातु में जंग नहीं लगा। 3. युद्ध के दौरान इन सैनिकों के परिवारों को इनकी मौत की खबर क्यों नहीं मिली? जर्मन सेना के नियम के मुताबिक मौत होने पर डॉग टैग को तोड़कर आधा हिस्सा मुख्यालय भेजा जाता था। चूंकि दोनों टैग साबुत मिले, इसलिए सैन्य अधिकारियों तक मौत की सूचना नहीं पहुंची और परिवार इंतजार करते रह गए। 4. जांच पूरी होने के बाद सैनिकों के अवशेषों का क्या किया जाएगा? फॉरेंसिक और हड्डियों की जांच से पहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अवशेषों को बुडापेस्ट के पास बुडाओर्स स्थित जर्मन युद्ध कब्रिस्तान में सम्मानपूर्वक दफनाया जाएगा। 5. खोज के दौरान नदी तट को क्यों बंद करना पड़ा था? अवशेषों के साथ जिंदा एंटी-टैंक माइंस मिलने के कारण सुरक्षा के लिहाज से नदी किनारे को अस्थायी रूप से बंद करके बम निरोधक दस्ते द्वारा विस्फोटक निष्क्रिय कराए गए। https://trendkia.com/europe/budapest-men-sukhe-se-danube-nadi-ka-jalastara-ghata-80-sala-bada-mile-dvitiya-vishva-yuddha-ke-jarmana-sainikon-ke-avashesha-aura-16011 TrendKia — Har trend, sabse pehle.