# दो राज्यों में करारी हार के बाद जर्मन चांसलर ने गठबंधन बचाने का लिया संकल्प

> मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न और बर्लिन में चुनावों में भारी झटके के बाद चांसलर फ्रीडरिख मेर्त्ज ने कहा कि वह जर्मनी के लोकतांत्रिक भविष्य की खातिर अपना सत्तारूढ़ गठबंधन बनाए रखेंगे।

**Type:** article · **Category:** यूरोप · **Published:** 2026-09-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/europe/do-rajyon-men-karari-hara-ke-bada-german-chancellor-ne-gathabndhana-bachane-ka-liya-snkalpa-35893 · **Language:** Hindi
**Tags:** जर्मनी, फ्रीडरिख मेर्त्ज, जर्मन राजनीति, सीडीयू, एएफडी, बर्लिन, यूरोप

जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिख मेर्त्ज ने दो प्रांतीय चुनावों में अपनी पार्टी के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद देश के राजनीतिक भविष्य को स्थिर रखने का भरोसा दिलाया है। मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न और राजधानी बर्लिन में सामने आए चौंकाने वाले चुनावी नतीजों के बाद सरकार की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इन झटकों के बावजूद चांसलर ने स्पष्ट किया है कि वह अपने सत्तारूढ़ गठबंधन को टूटने नहीं देंगे। उनका कहना है कि जर्मनी के लोकतांत्रिक भविष्य की रक्षा करने और मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए गठबंधन की एकता बेहद आवश्यक है।

## सत्तारूढ़ गठबंधन और चुनावी झटके
चांसलर मेर्त्ज ने अपनी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) के साझा गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि वे देश के सामने मौजूद ऐतिहासिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। रविवार को हुए मतदान के परिणामों ने केंद्र की सत्ता पर भारी दबाव बना दिया है। उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न में दक्षिणपंथी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) पार्टी ने सबसे अधिक मत हासिल किए हैं। इस इलाके में CDU का प्रदर्शन इतना निराशाजनक रहा कि पार्टी राज्य संसद में प्रवेश के लिए आवश्यक न्यूनतम सीमा तक भी नहीं पहुंच सकी।

दूसरी ओर, राजधानी बर्लिन में भी हालात केंद्र की सत्ता के लिए अनुकूल नहीं रहे। वहां वामपंथी दल डी लिंके ने शीर्ष स्थान हासिल किया, जबकि चांसलर की पार्टी दूसरे स्थान पर खिसक गई। इसके साथ ही AfD ने बर्लिन में भी अपनी स्थिति काफी मजबूत की है। एक ही दिन में आए इन दोनों नतीजों ने जर्मनी के पारंपरिक राजनीतिक संतुलन को हिलाकर रख दिया है।

## चुनावी नतीजों पर चांसलर का आत्ममंथन
सोमवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में चांसलर ने मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न के नतीजों को अपनी पार्टी के लिए एक करारा झटका बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह चुनाव एक गहरा मोड़ साबित हुआ है और जर्मनी में CDU के इतिहास में यह बेहद नाटकीय और अप्रत्याशित परिणाम है। राज्य में पार्टी 5% की उस न्यूनतम सीमा को भी पार नहीं कर पाई जो संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए अनिवार्य होती है। यह आंकड़ा पहले से लगाए गए सबसे खराब अनुमानों से भी नीचे चला गया, जिसे उन्होंने एक बड़ी तबाही माना।

अपनी घटती लोकप्रियता और पद को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए मेर्त्ज ने साफ किया कि परिणामों के बाद उनके पद को लेकर कोई आंतरिक चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने इस धारणा को खारिज करने की कोशिश की कि हार की इकलौती वजह उनकी व्यक्तिगत अलोकप्रियता है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति के रूप में इन चुनावों में उनकी भूमिका जरूर रही है, लेकिन नतीजों के कारण सिर्फ उन तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार जर्मनी की राजनीतिक पार्टी व्यवस्था एक बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जैसा कि दुनिया के कई अन्य देशों में भी देखने को मिल रहा है।

## नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें और विपक्ष का रुख
सत्ता में केवल 16 महीने बिताने के बाद ही मेर्त्ज की कार्यशैली और गिरती रेटिंग्स को लेकर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चाएं भी सामने आई थीं कि गिरते समर्थन को देखते हुए मध्यावधि में चांसलर स्वैप के तहत उनकी जगह किसी अन्य नेता को कमान सौंपी जा सकती है। हालांकि उन्होंने इन अटकलों को दरकिनार करते हुए गठबंधन को आगे बढ़ाने की बात कही है।

दूसरी तरफ, दक्षिणपंथी खेमे ने सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। AfD की सह-नेता एलिस वीदेल ने चांसलर के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह बहुत जल्द पद छोड़ देंगे। हालांकि मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद AfD बहुमत से काफी दूर है। अन्य मुख्यधारा के दलों द्वारा उसके साथ मिलकर सरकार बनाने से इनकार किए जाने के कारण उसके सत्ता में आने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। घरेलू खुफिया एजेंसी द्वारा पार्टी की कुछ शाखाओं को दक्षिणपंथी चरमपंथी के रूप में वर्गीकृत किया गया है, हालांकि पार्टी इस तमगे का कड़ा विरोध करती रही है।

## जर्मनी की बदलती राजनीतिक दिशा
AfD के आप्रवासन विरोधी, जर्मनी फर्स्ट और रूस के प्रति नरम रुख वाले एजेंडे को देश के पूर्व कम्युनिस्ट पूर्वी हिस्से में व्यापक समर्थन हासिल हुआ है। यह क्षेत्रीय विभाजन जर्मनी के चुनावी परिदृश्य को लगातार जटिल बना रहा है। बर्लिन में CDU की पराजय के बाद डी लिंके के नेतृत्व में एक नया गठबंधन बनने का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे राजधानी की प्रशासनिक दिशा में बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा। चांसलर के सामने अब न सिर्फ अपने गठबंधन को एकजुट रखने की चुनौती है, बल्कि मुख्यधारा के मतदाताओं का भरोसा दोबारा जीतने का भी कठिन काम है।

## इसका आप पर असर
जर्मनी के दो प्रांतीय चुनावों के नतीजे यूरोपीय संघ के सबसे बड़े देश में नीतिगत स्थिरता और शासन पर सीधा प्रभाव डालने वाले हैं।

- **यूरोपीय नीतियों पर:** जर्मन केंद्र सरकार में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने से यूरोपीय संघ स्तर पर बड़े आर्थिक और विदेश नीतिगत फैसलों में देरी हो सकती है। गठबंधन के सहयोगी दल आंतरिक विवादों को सुलझाने में अधिक समय बिताएंगे जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े निर्णय लेना मुश्किल होगा।
- **आप्रवासन और सुरक्षा पर:** दक्षिणपंथी दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण मुख्यधारा की पार्टियां अपनी सीमा नियंत्रण और नागरिकता नीतियों को और सख्त कर सकती हैं। इससे भविष्य में जर्मनी आने वाले विदेशी छात्रों, कामगारों और प्रवासियों के लिए नियम पहले से अधिक कड़े हो सकते हैं।
- **जर्मनी में रहने वाले प्रवासियों पर:** प्रांतीय स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ने से स्थानीय प्रशासन और सामाजिक माहौल में राजनीतिक तनाव महसूस किया जा सकता है। प्रवासियों को वीजा नवीनीकरण और स्थानीय कल्याणकारी योजनाओं को लेकर आगामी नीतिगत बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
- **आर्थिक सुधार और व्यापार पर:** गठबंधन पर लगातार मंडराता संकट देश के बजटीय प्रस्तावों और औद्योगिक सुधारों की रफ्तार को धीमा कर सकता है। व्यापारिक समुदाय नीतिगत अनिश्चितता के चलते नए पूंजी निवेश की योजनाओं को फिलहाल रोक सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
जर्मनी की पारंपरिक सत्तारूढ़ पार्टियों को मिले इस झटके के पीछे लंबे समय से सुलग रहा जन असंतोष और बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएं मुख्य कारण रही हैं।

- **मतदाताओं की नाराजगी:** बढ़ती महंगाई, ऊर्जा लागत और जीवनयापन के संकट ने मतदाताओं में केंद्र सरकार के प्रति गहरा रोष पैदा कर दिया था। इसके चलते पारंपरिक मध्यमार्गी दलों से मोहभंग होकर लोगों ने किनारों की पार्टियों का रुख किया।
- **आप्रवासन पर ध्रुवीकरण:** देश में प्रवासियों के आगमन और आंतरिक सुरक्षा को लेकर जारी चिंताओं ने दक्षिणपंथी ताकतों को बढ़त दिलाई। पूर्व कम्युनिस्ट पूर्वी राज्यों में ऐतिहासिक रूप से रहा असंतोष इस एजेंडे के लिए अनुकूल साबित हुआ।
- **गठबंधन की आंतरिक खींचतान:** 16 महीनों के कार्यकाल के दौरान शासन की स्पष्ट दिशा न दिखने और चांसलर की गिरती लोकप्रियता ने सरकार की साख को भारी नुकसान पहुंचाया। मतदाताओं ने प्रांतीय चुनावों को केंद्र सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह के तौर पर देखा।

## सवाल-जवाब

### 1. जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मेर्त्ज ने चुनाव परिणामों के बाद क्या घोषणा की?
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह देश के लोकतांत्रिक भविष्य की रक्षा करने और मौजूदा चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने सत्तारूढ़ गठबंधन को एकजुट रखेंगे।

### 2. मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न राज्य में किस पार्टी ने जीत हासिल की?
वहां दक्षिणपंथी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सबसे अधिक मत प्राप्त किए, जबकि चांसलर की पार्टी संसद में प्रवेश के लिए जरूरी 5% की सीमा भी नहीं छू सकी।

### 3. बर्लिन के चुनावों में कौन सा दल पहले स्थान पर रहा?
बर्लिन में वामपंथी पार्टी डी लिंके ने शीर्ष स्थान हासिल किया, जबकि क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) दूसरे स्थान पर रही।

### 4. क्या चांसलर मेर्त्ज अपने पद से इस्तीफा दे रहे हैं?
मेर्त्ज ने कहा कि चुनाव नतीजों के बाद उनके इस्तीफे या नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है।

### 5. मेर्त्ज कितने समय से जर्मनी के चांसलर पद पर हैं?
वह पिछले 16 महीनों से देश के चांसलर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

### 6. क्या सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद AfD मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न में सरकार बना पाएगी?
इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि पार्टी बहुमत से दूर है और अन्य प्रमुख राजनीतिक दल उसके साथ गठबंधन करने से इनकार कर रहे हैं।

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