जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मर्ज़ की कुर्सी पर मंडराया संकट, प्रांतीय चुनावों में करारी शिकस्त के बाद नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज प्रांतीय चुनावों में दक्षिणपंथी पार्टी की भारी बढ़त और अपनी लोकप्रियता में रिकॉर्ड गिरावट के बीच जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मर्ज़ की राजनीतिक साख बेहद कमजोर पड़ गई है, जिससे पूरे यूरोप के राजनीतिक और आर्थिक संतुलन पर असर पड़ने का अंदेशा है। जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिख मर्ज़ इस समय एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़े हैं जहां उनके नाम अनचाहे रिकॉर्ड दर्ज हो रहे हैं। केवल 16 महीने पुरानी सरकार चलाने के बावजूद मर्ज़ की व्यक्तिगत लोकप्रियता का आंकड़ा गिरकर महज 13 प्रतिशत पर आ गया है। जनमत सर्वेक्षणों का इतिहास शुरू होने के बाद से यह किसी भी जर्मन चांसलर की सबसे कमजोर रेटिंग है। पूर्व कॉरपोरेट वकील रहे मर्ज़ की छवि को लेकर मतदाता उन्हें आम लोगों की वास्तविक परेशानियों से दूर और अहंकारी मान रहे हैं। पद संभालने के बाद से उनकी लोकप्रियता में गिरावट की रफ्तार पूर्ववर्तियों के मुकाबले सबसे तेज रही है, जिसने अब उनके खुद के पद पर बने रहने पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। प्रांतीय चुनावों में कंजर्वेटिव पार्टी का बिखराव और दक्षिणपंथ का उभार हालिया दो हफ्तों के दौरान जर्मनी के तीन राज्यों में संपन्न हुए प्रांतीय चुनावों ने मर्ज़ के नेतृत्व वाली क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) को तगड़ा झटका दिया है। पार्टी इन चुनावों में बेहद निराशाजनक प्रदर्शन का सामना कर रही है। ठीक इसके विपरीत आव्रजन विरोधी और राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने इन चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। यह वही AfD है जिसके जनाधार को खत्म करने का वादा मर्ज़ ने CDU के अध्यक्ष पद की दौड़ के दौरान प्रमुखता से किया था। तीन में से दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में AfD सबसे बड़े राजनीतिक गुट के रूप में उभरी है। पार्टी ने एक और अप्रत्याशित मुकाम छूते हुए सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में सरकार बनाने तक की संभावना हासिल कर ली है। यह स्थिति तब बनी है जब जर्मन सुरक्षा प्राधिकरणों ने AfD को आंशिक रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध और दक्षिणपंथी चरमपंथी के रूप में वर्गीकृत कर रखा है। जर्मनी के नाजी अतीत को देखते हुए राष्ट्रीय जनमत सर्वेक्षणों में AfD का शीर्ष पर पहुंचना देश के भीतर एक बेहद संवेदनशील विषय बन चुका है। राजनीतिक ध्रुवीकरण और जनभावनाओं का बदलता रुख टीनो ख्रुपाल्ला और एलिस वीडेल के नेतृत्व वाली AfD खुद पर लगने वाले दक्षिणपंथी चरमपंथी तमगे को पूरी तरह खारिज करती है। पार्टी का कहना है कि उसका जर्मन नाम अल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी 'जर्मनी के लिए विकल्प' सीधे तौर पर उस बात को दर्शाता है जो जनता अब चाहती है। हालिया चुनावों में सैक्सनी-अनहाल्ट और मैक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न में AfD के शानदार उभार तथा बर्लिन में भी उसके बढ़ते प्रभाव के बाद एलिस वीडेल ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया। बर्लिन में कट्टर वामपंथी पार्टी डी लिंके ने जीत दर्ज की है, लेकिन वीडेल का तर्क है कि AfD ने अब सेंटर-राइट CDU को विस्थापित करके देश की वास्तविक 'फोल्क्सपार्टी' यानी सर्वसमावेशी जनपार्टी का स्थान ले लिया है। AfD के अनुसार मर्ज़ अपने उन बुनियादी वादों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहे हैं जो उन्होंने चुनाव के दौरान किए थे। इनमें कभी पूरे यूरोप का आर्थिक इंजन मानी जाने वाली लड़खड़ाती जर्मन अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना और आम सड़कों पर सुरक्षा व आव्रजन को लेकर मतदाताओं के भय का व्यावहारिक समाधान खोजना शामिल था। दक्षिणपंथी पार्टी का दावा है कि अब मुल्क में राजनीतिक बदलाव का सही समय आ चुका है। नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट और चांसलर की सफाई लगातार झटकों के बीच चांसलर के तौर पर मर्ज़ की पकड़ बेहद कमजोर नजर आने लगी है। पार्टी हलकों में पिछले कई हफ्तों से अंदरूनी तख्तापलट की फुसफुसाहट चल रही है, जिसके तहत उन्हें हटाकर किसी अधिक लोकप्रिय CDU नेता को चांसलर बनाने की योजना बनाई जा रही है। उत्तराधिकारी के तौर पर कई संभावित नामों की चर्चा राजनीतिक गलियारों में तैर रही है, हालांकि जब तक पार्टी का पूरा समर्थन पक्का नहीं हो जाता, तब तक कोई भी वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से अपनी दावेदारी आगे नहीं कर रहा है। जर्मनी की राजनीति ऐतिहासिक रूप से स्थिरता को प्राथमिकता देने के लिए जानी जाती है, ऐसे में मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल असामान्य मानी जा रही है। यदि मर्ज़ किसी तरह अपने पद पर टिके भी रहते हैं, तो भी एक खींचतान भरी गठबंधन सरकार के भीतर उनकी राजनीतिक शक्ति, विश्वसनीयता और निर्णय लेने का दायरा बेहद सीमित हो जाएगा। रविवार की शाम चुनावी नतीजे पूरी तरह घोषित होने से पहले ही मर्ज़ ने राष्ट्र को टेलीविजन के माध्यम से संबोधित किया। इस दौरान वे काफी मायूस नजर आए। उन्होंने अपने संबोधन में जोर देकर कहा कि वे समृद्धि लाने के लिए टैक्स, सामाजिक कल्याण और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे। मर्ज़ का कहना था कि मौजूदा हालात से निपटने के लिए दृढ़ता, धैर्य और मजबूत इरादों की सख्त आवश्यकता है। मतदाताओं के पुराने असंतोष की ऐतिहासिक जड़ें जर्मनी और समूचे यूरोप में मतदाताओं ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दशकों तक मुख्यधारा की सेंटर-लेफ्ट पार्टियों, जैसे SPD, या सेंटर-राइट CDU को सत्ता सौंपी है। हालांकि आर्थिक भविष्य को लेकर बढ़ती असुरक्षा ने पारंपरिक दलों के प्रति जनता में गहरी हताशा और अलगाव पैदा किया है। यह जन-असंतोष वर्ष 2007 और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के समय से गहराना शुरू हुआ था। उस दौर में आम परिवारों ने देखा कि सरकारों ने संकट में फंसे बड़े बैंकों को अरबों रुपयों की मदद देकर बचा लिया, जबकि आम नागरिकों की बचत घटती गई और उनके जीवन स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद वर्ष 2015 का प्रवासन संकट सामने आया, जब तस्करों की नौकाओं के जरिए भूमध्य सागर पार करके और यूरोप के रास्तों पर पैदल चलकर 10 लाख से अधिक शरणार्थी व अन्य प्रवासी संपन्न पश्चिमी देशों में पहुंचे। अकेले जर्मनी ने इस दौरान 10 लाख प्रवासियों को अपने यहां शरण दी। समय बीतने के साथ समाज में इन प्रवासियों के एकीकरण के परिणाम मिले-जुले रहे हैं। इस दौरान प्रवासियों द्वारा किए गए कई हिंसक हमलों ने जर्मन समाज को स्तब्ध और भयभीत किया। इनमें से कुछ घटनाओं में हमलावरों का मानसिक बीमारी का इतिहास रहा, जबकि अन्य मामलों में जर्मन अधिकारियों ने हमलावरों के संबंध इस्लामी चरमपंथी गुटों और उनकी विचारधारा से पाए। उदाहरण के लिए दिसंबर के महीने में पुलिस ने म्यूनिख के एक क्रिसमस बाजार पर हमले की साजिश रचने के संदेह में पांच लोगों को गिरफ्तार किया, जिनके बारे में जांच एजेंसियों ने इस्लामी मकसद से प्रेरित होने की जानकारी दी थी। ऊर्जा संकट और आर्थिक मोर्चे पर चौतरफा दबाव वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण सैन्य आक्रमण ने जर्मन अर्थव्यवस्था पर एक और गहरा जख्म छोड़ा है। वर्तमान में जर्मन नागरिक यूरोप में सबसे महंगी बिजली और ऊर्जा दरों का भुगतान कर रहे हैं। सस्ती रूसी ऊर्जा की आपूर्ति रुकने से जर्मनी के विशाल कार कारखानों और प्रमुख भारी उद्योगों को जबर्दस्त धक्का लगा, जो दशकों से इसी सस्ते ईंधन पर टिके थे। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापारिक शुल्क और चीन से मिल रही आक्रामक आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने जर्मनी की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना दिया है। राजनीतिक पटल पर जब एक ओर दक्षिणपंथी AfD पार्टी CDU के वोट बैंक में सेंध लगा रही है, तो दूसरी तरफ वामपंथी पार्टी डी लिंके अन्य क्षेत्रों में मतदाताओं को अपनी ओर खींच रही है। इन परिस्थितियों ने पारंपरिक दलों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। यूरोपीय संघ के बजट और सुरक्षा पर असर जर्मनी यूरोप और संपूर्ण यूरोज़ोन मुद्रा क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसके साथ ही वह इस समय यूक्रेन को सबसे अधिक द्विपक्षीय वित्तीय सहायता देने वाला अकेला देश है और यूरोपीय संघ (EU) के केंद्रीय बजट में सबसे बड़ा शुद्ध योगदानकर्ता भी है। जब जर्मनी के घरेलू वित्त संकट में घिरते हैं और उसका राजनीतिक नेतृत्व अंदरूनी विवादों में उलझता है, तो इसका असर उसकी राष्ट्रीय सीमाओं से कहीं आगे तक महसूस किया जाता है। घरेलू वित्तीय दबावों से जूझते हुए मर्ज़ अन्य धनी यूरोपीय देशों के एक समूह के साथ मिलकर यूरोपीय संघ के साझा बजट में अपने राष्ट्रीय योगदान को कम करने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं। मर्ज़ का यह रुख ऐसे नाजुक समय में सामने आया है जब ब्रसेल्स संयुक्त रक्षा परियोजनाओं, प्रवासन प्रबंधन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) व उन्नत प्रौद्योगिकी पर अपने खर्च को घटाने के बजाय बढ़ाना चाहता है। रूस और चीन से कथित रणनीतिक खतरों, मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों को प्रभावित करने वाले संघर्षों तथा डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की अनिश्चित और कई यूरोपीय विश्लेषकों के अनुसार अविश्वसनीय नीतियों के बीच ब्रसेल्स का स्पष्ट मत है कि सभी यूरोपीय देशों को एकजुट रहना चाहिए। ब्रसेल्स मर्ज़ की गिरती राजनीतिक साख के साथ-साथ दक्षिणपंथी AfD और कट्टर वामपंथी डी लिंके के मजबूत होने को लेकर गहरी चिंता में है। जर्मनी के ये प्रांतीय चुनाव यूरोपीय संघ के भीतर होने वाले चुनावों के एक विशाल दौर की शुरुआत में आए हैं, जहां फ्रांस, इटली, स्पेन और पोलैंड जैसी सभी प्रमुख ताकतें चुनावी मैदान में उतरेंगी। अनुमान जताया जा रहा है कि इनमें राष्ट्रवादी, यूरो-संदेहवादी और आव्रजन विरोधी दल शानदार प्रदर्शन कर सकते हैं, जिस पर बीजिंग और मॉस्को दोनों की पैनी नजरें टिकी हुई हैं। इसका आप पर असर जर्मनी के इस राजनीतिक संकट का सबसे बड़ा व्यावहारिक असर यूरोपीय संघ के बजट आवंटन और यूरोप में आर्थिक नीतियों पर पड़ने वाला है। • वैश्विक आर्थिक नीति: जर्मनी अपने बजटीय अंशदान में कटौती की मांग कर रहा है, जिससे यूरोपीय साझा परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। इसका परिणाम यह होगा कि संघ के स्तर पर रक्षा और तकनीकी नवाचार के नए फंड सीमित हो सकते हैं। • व्यापार और उद्योग: यूरोपीय विनिर्माण उद्योग उच्च ऊर्जा लागत और व्यापारिक शुल्कों के दोहरे दबाव से जूझ रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं और निर्यात पर निर्भर व्यवसायों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। • राजनीतिक ध्रुवीकरण: पारंपरिक दलों के कमजोर होने से आगामी यूरोपीय चुनावों में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी दलों का प्रभाव बढ़ेगा। इससे आव्रजन और साझा बजट से जुड़े नियमों में कड़े नीतिगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं। • यूक्रेन सहायता पर प्रभाव: जर्मनी यूक्रेन को वित्तीय सहायता देने वाला सबसे बड़ा व्यक्तिगत दाता देश है। घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल बढ़ने से भविष्य में विदेशी सहायता पैकेज को घरेलू स्तर पर कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ जर्मनी में उत्पन्न यह राजनीतिक संकट दशकों से संचित आर्थिक असंतोष, आव्रजन से जुड़ी चिंताओं और हालिया भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा परिणाम है। • आर्थिक और ऊर्जा दबाव: यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद सस्ती रूसी गैस की आपूर्ति रुकने से जर्मन उद्योगों की ऊर्जा लागत अत्यधिक बढ़ गई। इसके साथ ही अमेरिकी व्यापारिक शुल्कों और चीनी प्रतिस्पर्धा ने देश के निर्यात केंद्रित मॉडल को गंभीर क्षति पहुंचाई। • दशकों पुराना जन-असंतोष: वर्ष 2007 और 2008 के वित्तीय संकट के दौरान बैंकों के बेलआउट और घटती बचत ने पारंपरिक दलों के प्रति अविश्वास की नींव रखी। इसके बाद 2015 के प्रवासन संकट में दस लाख लोगों के आगमन और सुरक्षा चिंताओं ने जनता के असंतोष को और भड़का दिया। • चुनावी वादों की विफलता: चांसलर बनने के बाद फ्रीडरिख मर्ज़ अर्थव्यवस्था को गति देने और दक्षिणपंथी दलों के प्रभाव को कम करने के अपने प्रमुख चुनावी वादों को निभाने में संघर्ष करते दिखे, जिससे उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता गिरकर 13 प्रतिशत पर आ गई। सवाल-जवाब 1. जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मर्ज़ की लोकप्रियता कितनी गिर चुकी है? जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार फ्रीडरिख मर्ज़ की लोकप्रियता गिरकर महज 13 प्रतिशत रह गई है, जो जर्मन चांसलर के लिए अब तक की सबसे कम रेटिंग है। 2. हालिया प्रांतीय चुनावों में अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) का प्रदर्शन कैसा रहा? AfD ने हाल के तीन प्रांतीय चुनावों में से दो में सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में जीत हासिल की और सैक्सनी-अनहाल्ट में सरकार बनाने की दौड़ में शामिल हो गई। 3. बर्लिन के हालिया चुनाव में किस राजनीतिक दल को जीत मिली? बर्लिन के प्रांतीय चुनाव में कट्टर वामपंथी पार्टी डी लिंके ने जीत दर्ज की। 4. जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर किन अंतरराष्ट्रीय कारकों का बुरा असर पड़ा है? सस्ती रूसी ऊर्जा आपूर्ति का बंद होना, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापारिक शुल्क और चीन से मिल रही प्रतिस्पर्धा ने जर्मन अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। 5. यूरोपीय संघ के बजट को लेकर चांसलर मर्ज़ का क्या रुख है? घरेलू आर्थिक दबाव के चलते मर्ज़ कुछ धनी देशों के साथ मिलकर यूरोपीय संघ के साझा बजट में अपने देश के योगदान को घटाने की मांग कर रहे हैं। https://trendkia.com/europe/german-chansalara-friedrich-merz-ki-kursi-para-mndaraya-snkata-prantiya-chunavon-men-karari-shikasta-ke-bada-netritva-parivartana--35856 TrendKia — Har trend, sabse pehle.