इनुइट महिलाओं पर ज़बरन गर्भनिरोधक थोपने के मामले में ग्रीनलैंड सरकार का बड़ा बयान, नरसंहार के आरोपों पर बहस जारी डेनमार्क के डॉक्टरों द्वारा 1960 और 70 के दशक में ग्रीनलैंड की हज़ारों इनुइट महिलाओं और बच्चियों को बिना सहमति आईयूडी लगाने की जाँच रिपोर्ट जारी होने के बाद सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह इसे सीधे तौर पर नरसंहार करार नहीं दे सकती। ग्रीनलैंड में 1960 और 1970 के दशक के दौरान इनुइट समुदाय की महिलाओं तथा नाबालिग लड़कियों पर लागू किए गए ज़बरन गर्भनिरोधक कार्यक्रम को लेकर दो विशेषज्ञ रिपोर्ट सामने आई हैं। इन निष्कर्षों के सार्वजनिक होने के बाद ग्रीनलैंडिक न्याय मंत्री मरियाने पावियासेन ने कहा कि सरकार यह स्पष्ट रूप से तय नहीं कर सकती कि यह कदम सीधे तौर पर नरसंहार की श्रेणी में आता था या नहीं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस संवेदनशील विषय पर विभिन्न पक्षों और विशेषज्ञों के बीच बहस आगे भी जारी रह सकती है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब डेनमार्क सरकार द्वारा अपने इस स्वायत्त क्षेत्र में रहने वाली इनुइट महिलाओं और बालिकाओं के साथ हुए भेदभाव के लिए औपचारिक रूप से माफी माँगे एक वर्ष का समय बीत चुका है। जाँच पैनल में मतभेद और दो अलग-अलग रिपोर्टों का निष्कर्ष इस ऐतिहासिक प्रकरण में मानवाधिकारों के उल्लंघन और नरसंहार की परिभाषा लागू होने की संभावना की समीक्षा करने के लिए चार विशेषज्ञों का एक विशेष पैनल गठित किया गया था। हालाँकि जाँच प्रक्रिया के दौरान यह पैनल दो गुटों में विभाजित हो गया। दो सदस्यों ने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र देकर एक स्वतंत्र रिपोर्ट तैयार की, जबकि मूल पैनल में बने रहे दो अन्य विशेषज्ञों ने अपनी अलग विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। मूल पैनल में बचीं अलास्का की अधिवक्ता डैली सांम्बो डोरो और कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में कानून की प्रोफेसर मिरियम कुलेन ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट स्वीकार किया कि ग्रीनलैंड की इनुइट महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का गंभीर हनन हुआ था। इसके बावजूद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि केवल गर्भनिरोधक नीतियों और आईयूडी प्रत्यारोपण के साक्ष्यों के आधार पर कानूनी तौर पर नरसंहार का अंतिम दावा नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ दल ने यह भी जोड़ा कि यदि कोई अदालत भविष्य में इस मामले पर विचार करती है, तो वह अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को मिलाकर डेनिश अधिकारियों की नरसंहार संबंधी मंशा का अनुमान लगा सकती है। उदाहरण के तौर पर, इनुइट बच्चों को उनके जैविक परिवारों से अलग करके डेनिश परिवारों में पालन-पोषण के लिए भेजने की घटनाओं को भी इस दायरे में शामिल किया जा सकता है। दूसरी ओर, त्यागपत्र देने वाले सदस्यों—डेनिश इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन राइट्स के पूर्व प्रमुख जोनास क्रिस्टोफरसेन और ग्रीनलैंड में कार्य कर चुकीं मनोवैज्ञानिक जेन्सिन नेडेरगार्ड—ने अपनी अलग रिपोर्ट में यह स्वीकार किया कि महिलाओं के साथ भारी अन्याय हुआ था। हालांकि, वे दुर्व्यवहार की सटीक सीमा तय करने में असमर्थ रहे। उन्होंने अपनी पड़ताल में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं पाने का दावा किया जिससे यह साबित हो सके कि किसी स्वास्थ्य अधिकारी या प्रशासनिक संस्था की मंशा ग्रीनलैंडिक आबादी को पूरी तरह या आंशिक रूप से नष्ट करने की थी। दोनों रिपोर्टों के विरोधाभासी परिणामों पर टिप्पणी करते हुए न्याय मंत्री मरियाने पावियासेन ने कहा कि एक रिपोर्ट नरसंहार की संभावना को पूरी तरह खारिज करती है, जबकि दूसरी इसे एक संभावित कानूनी व्याख्या मानती है। पुनर्मिलन आयोग का गठन और प्रभावितों के लिए मुआवज़े का प्रावधान इस मामले की गहराई को देखते हुए ग्रीनलैंडिक प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने एक विशेष पुनर्मिलन आयोग गठित करने का निर्णय लिया है। वहीं डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने भरोसा दिलाया है कि दोनों देशों की सरकारें मिलकर इस राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया को तार्किक अंत तक पहुँचाएँगी। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस संवेदनशील ऐतिहासिक मोड़ पर दोनों पक्षों का एक साथ मिलकर सही राह तलाशना बेहद आवश्यक है। डेनिश सरकार ने इस नीति से सीधे प्रभावित हुई महिलाओं को वित्तीय राहत देने के लिए एक विशेष मुआवज़ा कानून भी पारित किया है। इस कानून के तहत पीड़ित प्रत्येक महिला को 300,000 डेनिश क्रोन देने का प्रावधान किया गया है, जो ब्रिटेन की मुद्रा में लगभग 34,404 पाउंड और अमेरिकी डॉलर में 46,800 डॉलर के बराबर है। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष अगस्त में मेटे फ्रेडरिकसेन ने ग्रीनलैंडिक महिलाओं और उनके परिजनों से डेनिश प्रशासन द्वारा की गई संस्थागत और व्यवस्थित असमानता के लिए खुले तौर पर माफी माँगी थी। इससे पहले 2024 में ग्रीनलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री मुटे बी एगेडे ने सार्वजनिक मंचों पर इस पूरी कार्रवाई को नरसंहार के रूप में परिभाषित किया था। 4,500 महिलाओं पर असर और जनसांख्यिकी में तेज़ गिरावट राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, वर्ष 1966 से 1970 के बीच ग्रीनलैंड की लगभग 4,500 महिलाओं और बालिकाओं के शरीरों में इंट्रा-यूटेरिन डिवाइस (IUD) रोपित किए गए थे। इनमें से कई बालिकाओं की आयु उस समय मात्र 13 वर्ष थी। यह पूरा अभियान डेनमार्क के डॉक्टरों की देखरेख में चलाया गया एक व्यवस्थित जन्म-नियंत्रण कार्यक्रम था। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में पीड़ित महिलाओं ने सामने आकर यह दर्दनाक खुलासा किया है कि उन्हें बिना किसी पूर्व जानकारी या उनकी सुविचारित सहमति के ये उपकरण लगाए गए थे। डेनमार्क प्रशासन ने यह आक्रामक अभियान 1950 के दशक के बाद ग्रीनलैंड में तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के उद्देश्य से शुरू किया था। आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और रहन-सहन में सुधार के कारण द्वीप की आबादी तेज़ी से बढ़ रही थी, और साथ ही कम उम्र में माताओं के गर्भवती होने की दर भी बढ़ गई थी, जिससे डेनिश अधिकारी चिंतित थे। इस अभियान को 1970 में डेनिश नीति निर्माताओं द्वारा बेहद सफल माना गया था क्योंकि इससे प्रजनन दर में भारी गिरावट आई थी। 1966 से 1974 तक के आठ वर्षों के भीतर ग्रीनलैंड की औसत प्रजनन दर प्रति महिला 7 बच्चों से घटकर 2.3 बच्चे पर आ गई। इस व्यापक और जबरन लागू की गई नीति का नतीजा यह हुआ कि द्वीप की कुल जनसांख्यिकीय वृद्धि दर कई दशकों के लिए सुस्त पड़ गई। पीड़ित महिलाओं का दर्द और ऐतिहासिक औपनिवेशिक पृष्ठभूमि इस पूरी जाँच प्रक्रिया और रिपोर्टों के निष्कर्षों पर प्रभावित इनुइट महिलाओं ने गहरी निराशा और रोष व्यक्त किया है। पीड़ित महिला हेनरिएटे बर्टेलसेन ने रिपोर्ट सार्वजनिक होने से पहले कहा था कि जाँच दल की संरचना ही पक्षपातपूर्ण थी क्योंकि इसमें एक भी स्थानीय ग्रीनलैंडिक इनुइट को विशेषज्ञ के रूप में शामिल नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि यह केवल इतिहास या राजनीति का अमूर्त विषय नहीं है, बल्कि उनके अपने शरीर, जीवन और आत्मनिर्णय के मौलिक अधिकार से जुड़ा व्यक्तिगत मामला है। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि एक बार फिर बाहरी लोग ही यह तय कर रहे हैं कि उनके साथ क्या हुआ था। इसी तरह 70 वर्षीया पीड़िता इंगर प्लेटो ने अपने साथ हुई आपबीती साझा करते हुए बताया कि उन्हें एक मामूली ऑपरेशन का झाँसा देकर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जब वे बेहोशी से जागीं तो उन्हें पता चला कि उनकी सहमति के बिना उनके शरीर में आईयूडी लगा दिया गया है। उन्होंने कहा कि इनुइट महिलाओं के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया गया और उन्हें बच्चे पैदा करने से रोकने के लिए अमानवीय तरीके अपनाए गए। कॉइल की वजह से आई जटिलताओं के कारण वे जीवन भर कभी गर्भवती नहीं हो सकीं और बाद में उन्होंने कोलंबिया से दो बच्चों को गोद लिया। उन्होंने दर्द व्यक्त करते हुए कहा कि औपनिवेशिक व्यवस्था की संतान होने के कारण वे हमेशा प्रशासनिक अधिकारियों के आदेशों को चुपचाप मानने के लिए विवश थीं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो ग्रीनलैंड वर्ष 1953 तक डेनमार्क का एक औपचारिक उपनिवेश था। इसके बाद 1979 में इसे गृह शासन प्राप्त हुआ, लेकिन कोपेनहेगन का नियंत्रण 1992 तक द्वीप की संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर बना रहा। वर्तमान में ग्रीनलैंड की कुल 56,000 की आबादी में लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इनुइट या मिश्रित डेनिश-इनुइट मूल के निवासियों का है, जो अपने अतीत के इस दर्दनाक अध्याय के न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसका आप पर असर यह मामला ऐतिहासिक उपनिवेशवाद, मानवाधिकारों के हनन और राज्य प्रायोजित चिकित्सा अभियानों के प्रति जवाबदेही के वैश्विक सिद्धांतों को उजागर करता है। • भारत में: यह घटना अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों, सहमति आधारित चिकित्सा प्रणाली और मूल निवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के महत्व को दर्शाती है। भारतीय पाठकों के लिए यह नीतिगत पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की जागरूकता का संदेश देता है। • ग्रीनलैंड और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर: डेनमार्क द्वारा 300,000 डेनिश क्रोन (लगभग 46,800 डॉलर) का दिया जाने वाला मुआवज़ा पीड़ित महिलाओं के लिए वित्तीय और नैतिक क्षतिपूर्ति का कार्य करेगा। • स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र: किसी भी चिकित्सीय प्रक्रिया या जन्म-नियंत्रण उपाय से पहले मरीज की सुविचारित सहमति (Informed Consent) को अनिवार्य बनाने की वैश्विक प्रतिबद्धता को बल मिलता है। • ऐतिहासिक जवाबदेही: औपनिवेशिक दौर में हुई ज्यादतियों के लिए सरकारी माफी और पुनर्मिलन आयोगों की स्थापना अन्य देशों के लिए भी एक मिसाल पेश करती है। सवाल-जवाब 1. ग्रीनलैंड सरकार ने नरसंहार के दावों पर क्या रुख अपनाया है? ग्रीनलैंडिक न्याय मंत्री मरियाने पावियासेन ने कहा कि सरकार उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाल सकती कि ज़बरन गर्भनियंत्रण की नीति नरसंहार थी या नहीं, और इस पर बहस जारी रह सकती है। 2. 1966 से 1970 के बीच कितनी महिलाओं पर इस नीति का असर पड़ा? सरकारी अभिलेखागार के अनुसार लगभग 4,500 इनुइट महिलाओं और लड़कियों को बिना उनकी सुविचारित सहमति के आईयूडी (IUD) लगाए गए थे। 3. पीड़ित महिलाओं को कितना मुआवज़ा दिया जा रहा है? डेनमार्क ने एक मुआवज़ा कानून पारित किया है जिसके तहत प्रत्येक प्रभावित महिला को 300,000 डेनिश क्रोन (लगभग 46,800 डॉलर) दिए जाएँगे। 4. इस अभियान से ग्रीनलैंड की प्रजनन दर पर क्या प्रभाव पड़ा? 1966 से 1974 के बीच ग्रीनलैंड की औसत प्रजनन दर प्रति महिला 7 बच्चों से तेजी से घटकर 2.3 बच्चे रह गई थी। 5. जाँच करने वाले विशेषज्ञ पैनल में क्या मतभेद थे? चार सदस्यीय पैनल विभाजित हो गया था; दो सदस्यों ने इस्तीफा देकर अलग रिपोर्ट सौंपी जिसमें नरसंहार की मंशा का कोई सबूत न मिलने की बात कही गई, जबकि शेष दो सदस्यों ने माना कि मानवाधिकार उल्लंघन हुआ पर केवल गर्भनिरोधक नीति के आधार पर नरसंहार का दावा सिद्ध नहीं होता। https://trendkia.com/europe/inuit-mahilaon-para-zabarana-garbhanirodhaka-thopane-ke-mamale-men-greenland-sarakara-ka-bara-bayana-narasnhara-ke-aropon-para-bah-23909 TrendKia — Har trend, sabse pehle.