# जर्मनी के प्रांतीय चुनावों में झटका लगने के बाद भी पद पर डटे रहने की जिद पर अड़े फ्रेडरिक मर्ज

> बर्लिन और मेक्लेनबुर्ग-फोरपोमेर्न के प्रांतीय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बावजूद जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने पद नहीं छोड़ने का संकल्प दोहराया है।

**Type:** article · **Category:** यूरोप · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/europe/jarmani-ke-prantiya-chunavon-men-jhataka-lagane-ke-bada-bhi-pada-para-date-rahane-ki-jida-para-are-friedrich-merz-35411 · **Language:** Hindi
**Tags:** फ्रेडरिक मर्ज, जर्मनी, सीडीयू, एएफडी, बर्लिन, यूरोपीय राजनीति

जर्मनी के दो राज्यों में हुए स्थानीय चुनावों के एग्जिट पोल सामने आने के बाद सियासी हलचल काफी तेज हो गई है। केंद्र की सत्ता संभाल रहे सीडीयू दल को प्रांतीय स्तर पर भारी मतों के नुकसान का सामना करना पड़ा है। इस राजनीतिक झटके के बीच चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने साफ कर दिया है कि वह अपने पद से पीछे हटने वाले नहीं हैं। रविवार की शाम को मतदान खत्म होते ही उन्होंने अपने इरादे जाहिर करते हुए कहा कि वे राष्ट्रीय स्तर पर तय किए गए आर्थिक और नीतिगत बदलावों को हर हाल में आगे बढ़ाते रहेंगे।

## पूर्वोत्तर राज्य में कड़ा मुकाबला और पार्टी की स्थिति
पूर्वोत्तर के प्रांत मेक्लेनबुर्ग-फोरपोमेर्न में सामने आए शुरुआती अनुमानों ने सत्तारूढ़ दल की चिंता बढ़ा दी है। इस इलाके में धुर दक्षिणपंथी मानी जाने वाली एएफडी सबसे बड़े दल के रूप में उभरती नजर आ रही है। सार्वजनिक प्रसारणकर्ता जेडीएफ के चुनावी आंकड़ों के अनुसार एएफडी को लगभग 38% वोट शेयर मिलने की संभावना जताई गई है। इसके ठीक पीछे केंद्र-वाम झुकाव वाली एसपीडी लगभग 36% वोट हासिल करके दूसरे स्थान पर बनी हुई है। वहीं चांसलर के अपने दल क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन की स्थिति इतनी कमजोर रही कि वह संसद में न्यूनतम सीमा पार कर बमुश्किल प्रवेश करने की स्थिति में दिख रहा है।

इन निराशाजनक नतीजों को खुद फ्रेडरिक मर्ज ने अपनी पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी तबाही करार दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि मतदाताओं का यह रुख उनके संगठन के लिए बेहद चिंताजनक है। हालांकि सबसे ज्यादा वोट हासिल करने की ओर अग्रसर होने के बाद भी एएफडी के सरकार बनाने की संभावना काफी कम आंकी जा रही है, क्योंकि अन्य प्रमुख दलों ने उसके साथ किसी भी तरह का गठबंधन करने अथवा काम करने से साफ इनकार कर रखा है।

## राजधानी बर्लिन में वामपंथी दल ने बनाई बढ़त
देश की राजधानी बर्लिन में भी चांसलर के दल को कड़वे अनुभवों का सामना करना पड़ा है। स्थानीय प्रशासन में प्रभाव रखने वाली सीडीयू को वहां डाई लिन्के यानी वामपंथी दल ने पीछे छोड़ दिया है। मतदान केंद्र बंद होने के वक्त सामने आए आंकड़ों में वामपंथी पार्टी को लगभग 26% मत मिलने के संकेत मिले हैं, जबकि सीडीयू सिमटकर केवल 20% मतों के आसपास रह गई है। बड़े शहरों में मतदाताओं के इस मिजाज ने यह साफ कर दिया है कि पारंपरिक नीतियों के प्रति असंतोष लगातार गहराता जा रहा है।

स्थानीय समयानुसार शाम 18:00 बजे और ब्रिटिश ग्रीष्मकालीन समय के मुताबिक शाम 17:00 बजे दोनों राज्यों में मतदान संपन्न हुआ। शुरुआती अनुमानों के बाद अंतिम आधिकारिक आंकड़ों की प्रतीक्षा की जा रही है, परंतु प्राथमिक रुझानों ने यह संकेत दे दिया है कि क्षेत्रीय राजनीति में ध्रुवीकरण किस हद तक बढ़ चुका है।

## सुधारों के एजेंडे पर आगे बढ़ने की तैयारी
चुनावी निराशा के बाद पत्रकारों से संवाद करते हुए जर्मन चांसलर ने अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उनका गठबंधन सरकार कल्याणकारी नियमों, कराधान प्रणाली और अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने के वादे से डिगने वाला नहीं है। अपने रुख को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि सुधारों को लागू करना ही होगा और वे देश को आगे ले जाने के लिए यह पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले रहे हैं।

चांसलर ने समाज में उभर रही उग्र राजनीतिक प्रवृत्तियों पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने आगाह किया कि लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत रखने के लिए साहसिक कदम उठाने की जरूरत है। उनके अनुसार प्रस्तावित नीतिगत बदलाव उस सत्तावादी जहर का सटीक तोड़ हैं जो समाज में धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमा रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि आर्थिक परेशानियों और अनिश्चितता का फायदा उठाकर जो ताकतें व्यवस्था को कमजोर करना चाहती हैं, उन्हें केवल ठोस सुधारों के जरिए ही रोका जा सकता है।

## नेतृत्व पर सवाल और भविष्य की राजनीतिक राह
फ्रेडरिक मर्ज ने चांसलर की कुर्सी संभाले हुए केवल 16 महीने का समय बिताया है, लेकिन इतने कम कार्यकाल में ही उन पर चौतरफा दबाव बन चुका है। जनमत सर्वेक्षणों में घटती लोकप्रियता और गठबंधन के भीतर आंतरिक मतभेदों के चलते हाल के दिनों में यह चर्चा जोरों पर रही कि क्या कार्यकाल के बीच में ही चांसलर बदलने की नौबत आ सकती है। चुनाव से ठीक पहले देश भर के राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार अटकलें थीं कि यदि प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ तो नेतृत्व परिवर्तन तय है।

हालांकि मौजूदा संकट से ठीक पहले जर्मनी के आठ प्रमुख राज्यों के मुख्य नेताओं ने मर्ज के प्रति अपना खुला समर्थन जताया था। प्रांतीय मुख्यमंत्रियों के इस भरोसे ने चांसलर को अपनी ही पार्टी के भीतर बगावत से कुछ समय के लिए राहत जरूर दी थी। अब इन दो राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या गठबंधन के सहयोगी और प्रांतीय नेतृत्व का यह समर्थन बरकरार रहता है या फिर केंद्रीय नेतृत्व के भविष्य को लेकर नए सिरे से खींचतान शुरू होती है।

## इसका आप पर असर
जर्मनी के राज्य चुनावों में आए इस नाटकीय बदलाव का सीधा असर यूरोपीय संघ की नीतियों और घरेलू सुधार कार्यक्रमों पर पड़ेगा।

- **राजनीतिक स्थिरता:** चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के नेतृत्व पर आंतरिक सवाल उठने से संघीय सरकार के नीतिगत फैसलों में देरी हो सकती है। आने वाले हफ्तों में गठबंधन के सहयोगियों के बीच खींचतान बढ़ने से कई महत्वपूर्ण कानूनों के पारित होने में रुकावट आ सकती है।
- **आर्थिक सुधार और कर नीतियां:** सरकार ने टैक्स और कल्याणकारी योजनाओं में व्यापक बदलाव का वादा किया है जिसे लागू करना अब और कठिन हो जाएगा। यदि संसद में आम सहमति नहीं बन पाती है तो व्यापारिक जगत और आम वेतनभोगियों को नई योजनाओं के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
- **कल्याणकारी योजनाएं:** प्रांतीय स्तर पर वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के मजबूत होने से सामाजिक सुरक्षा बजट पर बहस छिड़ सकती है। नागरिकों को मिलने वाली सरकारी वित्तीय सहायता और सामाजिक योजनाओं की समीक्षा की रफ्तार पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- **यूरोपीय राजनीति पर प्रभाव:** सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते जर्मनी की राजनीतिक अनिश्चितता पूरे यूरोप के बाजारों को प्रभावित करती है। इस सियासी उथल-पुथल से यूरोजोन में दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों के समन्वय को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
जर्मनी के दो प्रांतों में सत्तारूढ़ दल को मिली यह करारी शिकस्त देश में बढ़ती आर्थिक बेचैनी और पारंपरिक नेतृत्व के प्रति गहराते असंतोष का सीधा परिणाम है।

- **घटती लोकप्रियता और सत्ता विरोधी लहर:** चांसलर के 16 महीनों के कार्यकाल के दौरान आर्थिक मोर्चे पर जनता की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं। जनमत सर्वेक्षणों में लगातार गिरती अप्रूवल रेटिंग्स ने स्थानीय चुनावों में पार्टी के खिलाफ व्यापक नाराजगी का रूप ले लिया।
- **ध्रुवीकरण और गैर-पारंपरिक दलों का उभार:** मतदाताओं ने मध्यमार्गी गठबंधन के बजाय वामपंथी और दक्षिणपंथी विकल्पों को तरजीह दी। पूर्वोत्तर में एएफडी द्वारा 38% और बर्लिन में डाई लिन्के द्वारा लगभग 26% मत हासिल करना पारंपरिक दलों के सिकुड़ते जनाधार को उजागर करता है।
- **नीतिगत सुधारों पर अनिश्चितता:** टैक्स और कल्याणकारी सुधारों को लेकर आम जनता में असुरक्षा की भावना बनी हुई थी। सुधारों की घोषणाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर राहत न दिखने के कारण मतदाताओं ने प्रांतीय मतपेटियों के जरिए अपना कड़ा संदेश दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. मेक्लेनबुर्ग-फोरपोमेर्न राज्य में किस पार्टी ने सबसे ज्यादा मत हासिल किए हैं?
प्रारंभिक एग्जिट पोल के अनुसार दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी ने लगभग 38% वोट शेयर के साथ पहला स्थान हासिल किया है।

### 2. बर्लिन के स्थानीय चुनाव में किस दल को बढ़त मिली है?
बर्लिन में वामपंथी पार्टी डाई लिन्के ने करीब 26% मतों के साथ बढ़त बनाई, जबकि सीडीयू को 20% वोट मिले।

### 3. चुनाव परिणामों के बाद चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने क्या रुख अपनाया है?
उन्होंने खराब नतीजों को आपदा मानते हुए भी पद पर बने रहने और प्रस्तावित आर्थिक सुधारों को पूरा करने का संकल्प लिया है।

### 4. क्या एएफडी मेक्लेनबुर्ग-फोरपोमेर्न में सरकार बना सकती है?
इसकी संभावना बेहद कम है क्योंकि राज्य के अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों ने उसके साथ गठबंधन में काम करने से साफ मना कर दिया है।

### 5. फ्रेडरिक मर्ज कितने समय से जर्मनी के चांसलर पद पर हैं?
फ्रेडरिक मर्ज को इस पद पर कार्य करते हुए केवल 16 महीने का समय हुआ है।

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