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  "type": "article",
  "title": "पश्चिमी देशों से निकाले जा रहे रूसी विरोधी नागरिक, वापस वतन लौटते ही जेल और युद्ध का संकट",
  "summary": "यूक्रेन पर हमले के बाद रूस छोड़ने वाले असंतुष्टों और युद्ध-विरोधियों की शरण याचिकाएं अमेरिका और यूरोपीय देश खारिज कर रहे हैं, जिसके बाद स्वदेश भेजे जा रहे नागरिकों को गिरफ्तारी और सीधे सैन्य मोर्चे पर तैनाती का सामना करना पड़ रहा है।",
  "content": "मॉस्को के हवाई अड्डे पर दिसंबर में जब एक विमान उतरा, तो रनवे पर रूसी सुरक्षा तंत्र के कर्मी पहले से मौजूद थे। इस उड़ान में वे रूसी नागरिक सवार थे जिन्हें अमेरिका ने अपने यहाँ शरण देने से इनकार करने के बाद जबरन निर्वासित कर दिया था। वापस भेजे गए लोगों में ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता और नागरिक भी शामिल थे, जिन्होंने यूक्रेन पर सैन्य हमले का खुला विरोध किया था और अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई थी। स्वदेश लौटते ही इन नागरिकों के सामने कानूनी उत्पीड़न और युद्ध में झोंके जाने का सीधा जोखिम खड़ा हो गया।\n\n निर्वासित की गई एक महिला कात्या ने उस पल की दहशत बयां करते हुए बताया कि वह अनुभव रोंगटे खड़े कर देने वाला था और उनके पैर डर के मारे कांप रहे थे। सुरक्षा कारणों से कात्या का वास्तविक नाम गोपनीय रखा गया है, क्योंकि वह अभी भी रूसी सीमाओं के भीतर रह रही हैं। कात्या ने करीब दो वर्ष पहले अपना घर छोड़ा था और अमेरिका पहुंचकर राजनीतिक पनाह की अर्जी दी थी। उनका कहना है कि उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों को दस्तावेजी साक्ष्य सौंपे थे, जिनसे साबित होता था कि उन्होंने युद्ध विरोधी विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था और वह विपक्ष के आंदोलन से जुड़ी हुई थीं। इसके बावजूद अमेरिकी आव्रजन अधिकारियों ने उनकी शरण याचिका खारिज कर दी और उन्हें वापस मॉस्को भेज दिया।\n\n \n\nहवाई अड्डे पर पूछताछ और सैन्य मोर्चे के नोटिस\n\nहवाई अड्डे पर उतरते ही रूसी सुरक्षा सेवा यानी एफएसबी के अधिकारियों ने सभी को रोक लिया। कात्या के अनुसार, सुरक्षा अधिकारियों ने विमान से उतरे सभी पुरुष निर्वासितों को तुरंत सैन्य कागजात थमा दिए, जिसमें उन्हें स्थानीय भर्ती कार्यालय में पंजीकरण कराने का निर्देश दिया गया था। रूस में इसी भर्ती कार्यालय के जरिए नागरिकों को यूक्रेन में जारी युद्ध के मैदान में भेजा जाता है। इस उड़ान में शामिल एक अन्य यात्री और एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने भी इस घटनाक्रम की पूरी पुष्टि की है।\n\n सुरक्षा बलों ने यात्रियों को हिरासत में रखकर घंटों तक सघन पूछताछ की। कात्या बताती हैं कि जांच के दौरान अधिकारियों को उनके मोबाइल फोन में कुछ ऐसी सामग्री मिल गई, जिसे वे आपत्तिजनक मान रहे थे। इस सामग्री को देखते ही अधिकारियों के चेहरे के भाव पूरी तरह बदल गए और उन्हें लगने लगा कि उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर बंद कर दिया जाएगा। हालांकि लंबी पूछताछ के बाद कात्या को जाने दिया गया और वह अपने रिश्तेदारों के पास रहने लगीं, लेकिन उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। स्थानीय पुलिस लगातार उनके घर आ रही है और फोन पर पूछताछ कर रही है, जिससे वह लगातार डर के साये में जी रही हैं।\n\n \n\nअमेरिका और यूरोप में सख्त होते आव्रजन नियम\n\nवर्ष 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर व्यापक सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, तब दुनिया के कई पश्चिमी देशों ने अपनी सीमाएं रूसी नागरिकों के लिए खोली थीं और उनका स्वागत किया था। लेकिन चार साल से अधिक का समय बीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय रुख में बड़ा बदलाव आ चुका है। अमेरिका से रूसी नागरिकों का निष्कासन वर्ष 2023 में दर्ज 222 मामलों से बढ़कर वर्ष 2025 में 1,200 से अधिक हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान सीमा नियंत्रण और निर्वासन नीतियों में आई सख्ती के चलते यह आंकड़ा तेजी से ऊपर गया है। नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि निर्वासितों में कई ऐसे लोग शामिल हैं जिन्होंने सेना से बगावत की थी या युद्ध का विरोध किया था, जिन्हें लौटने पर जेल या मोर्चे पर भेज दिया गया।\n\n इसी तरह का एक मामला युद्ध-विरोधी कार्यकर्ता लियोनिद मेलेखिन का है। रूस में विरोध प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार होने के बाद उन्होंने अमेरिका में शरण मांगी थी। उन्होंने इंटरनेट पर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तस्वीरों के साथ उन्हें हत्यारा, फासीवादी और सत्ता हड़पने वाला बताया था। पिछले वर्ष अमेरिका से निर्वासित किए जाने के बाद लियोनिद मेलेखिन पर आतंकवाद को जायज ठहराने के आरोप तय किए गए और उन्हें अदालत ने छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। रूस के निर्वासित विपक्षी नेताओं की एंटी-वॉर कमेटी के आंद्रेई पिवोवारोव ने बताया कि सीमा पार करते ही लोगों को आठ-आठ साल की जेल की सजा सुनाए जाने के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। आंद्रेई पिवोवारोव खुद एक अवांछित संगठन की गतिविधियों को चलाने के आरोप में चार साल तक दंड कॉलोनी में कैद रह चुके हैं।\n\n \n\nयूरोपीय देशों में भी बंद हो रहे पनाह के रास्ते\n\nजर्मनी से भी रूसी नागरिकों को जबरन वापस भेजने की रफ्तार तेज हुई है। जर्मन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023 में जहां केवल सात रूसी नागरिकों को वापस भेजा गया था, वहीं वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 110 से अधिक पहुंच गई। वर्ष 2022 से 2025 के बीच 21,000 से अधिक रूसी नागरिकों ने जर्मनी में पनाह की गुहार लगाई थी। हालांकि आवेदनों को स्वीकार करने की दर वर्ष 2023 के 29 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2025 के पहले ग्यारह महीनों में महज 6.8 प्रतिशत रह गई। जर्मनी की आव्रजन और शरण एजेंसी बीएएमएफ का कहना है कि सुरक्षा केवल उसी स्थिति में दी जाती है जब उत्पीड़न का वास्तविक और पुख्ता आधार मौजूद हो। इसके अलावा बर्लिन प्रशासन ने पिछले साल रूसी नागरिकों के लिए चल रहे मानवीय वीजा कार्यक्रम को भी स्थगित कर दिया था। यूरोपीय संघ के आंकड़ों के अनुसार, पूरे संघ में शरण पाने वाले रूसी आवेदकों का अनुपात वर्ष 2024 के 23 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2025 के शुरुआती नौ महीनों में लगभग 17 प्रतिशत रह गया है।\n\n अधिकार समूह कोवचेग की संस्थापक और वकील अनास्तासिया बुराकोवा बताती हैं कि पश्चिमी सरकारें अब मानवीय कार्यक्रमों और शरणार्थियों की संख्या सीमित करने पर पूरा ध्यान दे रही हैं। यह सख्ती आम जनता की चिंताओं और दक्षिणपंथी दलों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के दबाव में की जा रही है। शरण खारिज होने के बाद नागरिकों को खुद देश छोड़ने का विकल्प दिया जाता है, लेकिन ऐसा न होने पर तीसरे देशों के रास्ते उन्हें जबरन मॉस्को पहुंचा दिया जाता है।\n\n \n\nसेना छोड़कर भागे सैनिकों की दास्तान और अनसुलझी अपीलें\n\nरूसी सेना के एक पूर्व सैनिक अर्योम वर्ष 2022 में उस समय सेना छोड़कर भाग निकले थे जब वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें यूक्रेन युद्ध में भेजने की धमकी दी थी। उन्होंने अमेरिका में शरण मांगते हुए दस्तावेज दिखाए कि रूस में उनके खिलाफ भगोड़ा घोषित कर आपराधिक जांच शुरू हो चुकी है। इसके बावजूद अमेरिकी अधिकारियों ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया और उन्हें मिस्र के रास्ते वापस मॉस्को निर्वासित कर दिया। मॉस्को में अर्योम को एक सैन्य हिरासत केंद्र में रखा गया था, लेकिन वह वहां से भागने में सफल रहे और अब किसी अन्य देश में छिपकर रह रहे हैं। उनका कहना है कि अगर उन्हें किसी अन्य देश में निष्पक्ष जांच का मौका मिलता तो उनकी जान बच सकती थी, लेकिन सीधे रूस भेजे जाने से उनका जीवन बर्बाद हो गया। इस मामले पर अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग का पक्ष है कि सभी अवैध प्रवासियों को कानूनी प्रक्रिया का अवसर दिया जाता है और यदि आव्रजन न्यायाधीश यह पाते हैं कि किसी व्यक्ति को देश में रहने का अधिकार नहीं है, तो उसे निष्कासित किया जाता है।\n\n इधर फिनलैंड में मिखाइल और उनकी पत्नी दाशा अपनी संभावित रवानगी के डर में जी रहे हैं। मिखाइल के युद्ध-विरोधी पोस्ट के कारण रूस में उनके सोशल मीडिया खाते बंद कर दिए गए थे और पुलिस ने उनकी मां से पूछताछ की थी। दाशा यहोवा के साक्षी समूह से जुड़ी हैं, जिसे रूस में चरमपंथी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित किया गया है। फिनलैंड आव्रजन सेवा ने उनकी शरण याचिका पांच बार यह कहकर खारिज कर दी कि उनके गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के जोखिम का कोई ठोस आधार नहीं है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी है कि इस दंपति को वापस भेजे जाने पर गिरफ्तारी, मुकदमेबाजी और यातना का गंभीर खतरा है। नोबेल पुरस्कार विजेता मानवाधिकार समूह मेमोरियल के अनुसार, रूस में राजनीतिक बंदियों की संख्या वर्ष 2025 में 803 से बढ़कर 1,265 पहुंच चुकी है, जो दमन के अभूतपूर्व स्तर को दर्शाती है।\n\nइसका आप पर असर\nपश्चिमी देशों में शरण नीति सख्त होने से विदेश में पनाह की उम्मीद रखने वाले प्रवासियों और मानवाधिकार संरक्षण चाहने वालों के लिए कानूनी रास्ते बेहद संकरे हो गए हैं।\n\n• वैश्विक शरणार्थियों पर असर: अमेरिका और यूरोपीय संघ में शरण स्वीकृति की दरों में भारी गिरावट आई है। युद्ध या तानाशाही नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिकों के लिए अब विदेशी अदालतों में उत्पीड़न साबित करना पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है।\n• निर्वासन और कानूनी जोखिम: आवेदन खारिज होते ही प्रवासियों को तुरंत अपने गृह देश भेजे जाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। ऐसे नागरिकों को स्वदेश लौटते ही बिना किसी सुरक्षा कवच के स्थानीय खुफिया एजेंसियों और सख्त मुकदमों का सामना करना पड़ता है।\n• अनिवार्य सैन्य भर्ती का खतरा: राजनीतिक रूप से संवेदनशील देशों में लौटे पुरुषों को तुरंत सेना के भर्ती नोटिस थमाए जा रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि निष्कासित युवाओं को अपनी इच्छा के विरुद्ध सीधे युद्ध के मोर्चे पर उतारा जा सकता है।\n• मानवीय कार्यक्रमों में कटौती: पश्चिमी देशों ने मानवीय और आपातकालीन वीजा योजनाओं को निलंबित या बेहद सीमित कर दिया है। राजनीतिक असहमति जताने वाले परिवारों के लिए अब किसी तीसरे सुरक्षित देश में जाकर ही वैकल्पिक रास्ते तलाशने की मजबूरी बन गई है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपश्चिमी देशों में शरण नीतियों में आई यह सख्ती व्यापक आव्रजन नियमों के कड़े होने, घरेलू राजनीति के दबाव और प्रशासनिक मूल्यांकन में आए बदलाव का नतीजा है।\n\n• घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव: अमेरिका और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में अनियमित प्रवासियों की भारी आमद को लेकर जनता में चिंताएं बढ़ी हैं। दक्षिणपंथी और लोकलुभावन दलों के उभार ने सरकारों को अपनी सीमाओं पर नियंत्रण कड़ा करने और निष्कासन तेज करने पर मजबूर किया है।\n• शरण के मानकों का सख्त मूल्यांकन: आव्रजन न्यायाधिकरणों और एजेंसियों ने उत्पीड़न के व्यक्तिगत खतरे की परिभाषा को बेहद संकीर्ण कर दिया है। कई मामलों में अधिकारी यह मान रहे हैं कि केवल सोशल मीडिया पर विरोध जताना या सैन्य सेवा से भागना पनाह देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।\n• प्रशासनिक नीतियों में बड़ा बदलाव: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के तहत देशव्यापी निष्कासन अभियान को बढ़ावा मिला है। वहीं जर्मनी और फिनलैंड जैसे देशों ने घरेलू सुरक्षा और भारी आवेदनों के बोझ को देखते हुए मानवीय वीजा कार्यक्रमों को स्थगित किया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अमेरिका से रूसी नागरिकों के निर्वासन में कितनी बढ़ोतरी हुई है?\nअमेरिका से रूसी नागरिकों का निष्कासन वर्ष 2023 के 222 मामलों से बढ़कर वर्ष 2025 में 1,200 से अधिक हो गया है।\n\n2. रूस लौटने पर निर्वासित पुरुषों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?\nहवाई अड्डे पर सुरक्षा अधिकारियों ने पुरुष यात्रियों को सीधे सैन्य कागजात थमाए और भर्ती कार्यालय में पंजीकरण कराने का आदेश दिया।\n\n3. लियोनिद मेलेखिन को रूस में कितनी सजा सुनाई गई?\nअमेरिका से निर्वासित किए जाने के बाद लियोनिद मेलेखिन पर आतंकवाद को सही ठहराने का आरोप लगा और उन्हें छह साल जेल की सजा मिली।\n\n4. जर्मनी में शरण स्वीकृति की दर में क्या बदलाव आया?\nजर्मनी में सकारात्मक शरण निर्णयों का अनुपात वर्ष 2023 के 29 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2025 में केवल 6.8 प्रतिशत रह गया।\n\n5. रूस में राजनीतिक बंदियों की संख्या कितनी हो गई है?\nमानवाधिकार संस्था मेमोरियल के अनुसार वर्ष 2025 के दौरान राजनीतिक बंदियों की संख्या 803 से बढ़कर रिकॉर्ड 1,265 पहुंच गई।\n\n6. फिनलैंड में मिखाइल और दाशा को पनाह क्यों नहीं मिल सकी?\nफिनिश आव्रजन सेवा ने पांच बार उनकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनके गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के शिकार होने का ठोस आधार नहीं है।",
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  "category": "यूरोप",
  "publishedAt": "2026-10-18",
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