बुंदेलखंड में नाग पंचमी पर कपड़े की गुड़िया पीटने की अनोखी परंपरा के पीछे छिपी है न्याय की पौराणिक कथा सावन मास की शुक्ल पंचमी पर देश के कई हिस्सों में नाग देवता की विशेष पूजा की जाती है, लेकिन बुंदेलखंड क्षेत्र में कपड़े की गुड़िया पीटने की एक खास लोक रस्म निभाई जाती है। इस अनोखी परंपरा का सीधा नाता भाई-बहन के प्रेम और एक प्राचीन पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। सावन मास के तीसरे सोमवार यानी 17 अगस्त 2026 को नाग पंचमी का पावन पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। हर वर्ष सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हिंदू धर्म में नाग देवता की विधिवत पूजा-अर्चना करने का विधान है। इस दिन श्रद्धालु नाग देवता को प्रसन्न करने के लिए धूप, दीप, दूध और ताजे पुष्प अर्पित करते हैं, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे और सर्प दंश या सर्प भय से मुक्ति मिल सके। प्रकृति और जीवों के प्रति आभार व्यक्त करने वाले इस त्योहार पर पूरे भारत में अलग-अलग धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं। हालांकि, देश के मध्य और उत्तरी हिस्सों में नाग पंचमी से जुड़ी एक ऐसी अनोखी लोक परंपरा निभाई जाती है, जिसे देखकर बाहरी लोग अक्सर हैरान हो जाते हैं। इस दिन विशेष रूप से कपड़े से बनी गुड़िया को डंडों से पीटने की परंपरा प्रचलित है। बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश में कपड़े की गुड़िया बनाने और पीटने की परंपरा उत्तर प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों और विशेषकर बुंदेलखंड क्षेत्र में नाग पंचमी के अवसर पर कपड़े की गुड़िया पीटने का रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है। इस रस्म में किसी जीवित या वास्तविक आकृति का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि सूती या रंग-बिरंगे पुराने कपड़ों की मदद से एक प्रतीकात्मक गुड़िया तैयार की जाती है। त्योहार के दिन सुबह के समय घर की महिलाएं और छोटी लड़कियां मिलकर बड़े चाव से इन कपड़ों को मोड़कर गुड़िया का आकार देती हैं। इसके बाद दोपहर या शाम के समय गांव के पुरुष, युवा और छोटे बच्चे अपने हाथों में डंडे या लाठियां लेकर एकत्रित होते हैं। इन कपड़े की गुड़ियाओं को खुले मैदान या चौराहे पर रखकर डंडों से पीटने की रस्म पूरी की जाती है। बाहरी लोगों के लिए यह दृश्य थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन स्थानीय निवासियों के लिए यह आस्था, सामाजिक शिक्षा और पौराणिक मान्यताओं का एक अभिन्न हिस्सा है। भाई-बहन का स्नेह और सर्प की हत्या: पौराणिक कथा का आरंभ इस अनोखी लोक परंपरा के पीछे एक अत्यंत मार्मिक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध एक भाई और बहन के बीच के प्रगाढ़ प्रेम से है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक परम शिव भक्त युवक रहता था। वह प्रतिदिन नियम से सुबह और शाम भगवान भोलेनाथ के मंदिर जाता था, पूरी निष्ठा के साथ पूजा-पाठ करता था और हमेशा गांव के असहाय लोगों की मदद के लिए तत्पर रहता था। वह अपनी छोटी बहन से भी अटूट स्नेह करता था और उसकी हर जरूरत का ध्यान रखता था। जिस मंदिर में वह युवक रोजाना पूजा करने जाता था, उसी मंदिर परिसर के पास एक सांप रहता था। वह सांप युवक की निश्छल भक्ति और दयालु स्वभाव से बहुत प्रभावित था। युवक के प्रति अपने इसी स्नेह के कारण जब भी वह मंदिर में प्रार्थना करने बैठता, सांप वहां आ जाता और बड़े प्यार से उसके पैरों से लिपट जाता था। युवक भी नाग देवता की मौजूदगी से कभी भयभीत नहीं होता था और उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानता था। भयवश हुई अनहोनी और गांव वालों द्वारा प्रायश्चित का निर्णय एक दिन वह शिव भक्त युवक अपनी बहन को भी अपने साथ मंदिर दर्शन कराने ले गया। मंदिर में पूजा समाप्त करने के बाद जब दोनों भाई-बहन वापस लौटने लगे, तभी वही सांप अचानक वहां आया और हमेशा की तरह युवक के पैर से लिपट गया। युवक तो इस बात से भलीभांति परिचित था, लेकिन उसकी बहन ने पहली बार इतना बड़ा सांप अपने भाई के पैर से लिपटा हुआ देखा। अपनी बहन के मन में यह डर बैठ गया कि सांप उसके भाई को डस लेगा और उसकी जान चली जाएगी। भाई की रक्षा की घबराहट में उसने बिना सोचे-समझे पास में पड़ी एक भारी लकड़ी उठाई और सांप पर ताबड़तोड़ वार कर दिए। इससे पहले कि भाई अपनी बहन को रोक पाता या उसे स्थिति समझा पाता, डंडे के लगातार प्रहारों से उस निर्दोष सांप की मौके पर ही मृत्यु हो गई। जब इस घटना की जानकारी गांव के बुजुर्गों और अन्य निवासियों को हुई, तो सभी अत्यंत दुखी हुए। निरपराध जीव की हत्या से गांव पर दोष न लगे, इसलिए गांव वालों ने तय किया कि इस पाप का प्रायश्चित करना अनिवार्य है। सांकेतिक सजा और नाग पंचमी पर परंपरा का महत्व गांव की पंचायत और बड़े-बुजुर्गों ने यह विचार किया कि लड़की ने यह अपराध जानबूझकर या किसी दुष्ट भावना से नहीं किया था, बल्कि अपने भाई की जान बचाने के डर में उससे यह अनजाने में भूल हुई थी। ऐसे में किसी मासूम बच्ची को शारीरिक दंड देना न्यायसंगत नहीं था। इसलिए गांव के ज्ञानी लोगों ने एक अनोखा उपाय निकाला। उन्होंने कपड़े की एक प्रतीकात्मक गुड़िया बनाई और सांकेतिक रूप से उस पर डंडे बरसाए। इस तरह लड़की को सीधे दंड दिए बिना, गलती की प्रतीकात्मक सजा दी गई और नाग देवता को न्याय अर्पित किया गया। तभी से नाग पंचमी के पावन अवसर पर कपड़े की गुड़िया पीटने की यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से गुड़िया को पीटने की यह रस्म मन के भीतर छिपे अहंकार, बुराई, अनजाने में हुए पापों और पुराने दोषों के प्रतीकात्मक अंत का संदेश देती है। कई स्थानों पर इसे नाग देवता की कृपा प्राप्त करने, सर्प दोष से मुक्ति पाने और अपने परिवार की खुशहाली व सुरक्षा की कामना के रूप में देखा जाता है। इसका आप पर असर • भारत में: सावन के तीसरे सोमवार (17 अगस्त 2026) को नाग पंचमी पर श्रद्धालु नाग देवता की पूजा कर सुख-समृद्धि और सर्प भय से मुक्ति की प्रार्थना कर सकते हैं। • उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में: स्थानीय निवासी और बच्चे पारंपरिक रूप से कपड़े की गुड़िया बनाकर और पीटकर इस पौराणिक लोक परंपरा में भाग ले सकते हैं। सवाल-जवाब 1. नाग पंचमी 2026 में कब मनाई जा रही है? नाग पंचमी सावन मास के तीसरे सोमवार यानी 17 अगस्त 2026 को सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाई जा रही है। 2. नाग पंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा कहां निभाई जाती है? यह अनोखी परंपरा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और विशेषकर बुंदेलखंड क्षेत्र में निभाई जाती है। 3. कपड़े की गुड़िया पीटने की रस्म कौन निभाता है? घर की महिलाएं और लड़कियां कपड़े की प्रतीकात्मक गुड़िया तैयार करती हैं, जबकि पुरुष और बच्चे उन्हें डंडे से पीटने की रस्म निभाते हैं। 4. नाग पंचमी पर गुड़िया पीटने का पौराणिक कारण क्या है? पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक लड़की ने अनजाने में अपने भाई के पैर से लिपटे शिव भक्त सांप को मार दिया था, जिसके प्रायश्चित और सांकेतिक सजा के रूप में कपड़े की गुड़िया पीटने की प्रथा शुरू हुई। 5. गुड़िया पीटने की रस्म का आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक संदेश क्या है? यह रस्म मन की बुराई, अहंकार, अतीत के दोषों और अनजाने में हुई भूलों के प्रतीकात्मक अंत का संदेश देती है। 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