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  "type": "article",
  "title": "धनतेरस 2026 पर शाम 06:02 बजे से शुरू होगा पूजा का शुभ मुहूर्त, सुख और आरोग्य के लिए अवश्य करें ये 4 आरतियां",
  "summary": "धनतेरस के पावन अवसर पर शाम 06:02 से 07:57 बजे के बीच पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय रहेगा। इस दिन गणेश जी, लक्ष्मी जी, कुबेर देव और भगवान धन्वंतरि की आरती का सही क्रम अपनाकर पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है।",
  "content": "कार्तिक मास के पावन अवसर पर 6 नवंबर 2026 को धनतेरस का पारंपरिक उत्सव श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। लोकमान्यता के अनुसार यह विशेष तिथि नई वस्तुओं, धातुओं और आभूषणों की खरीदारी के लिए सबसे कल्याणकारी मानी जाती है। इसी विश्वास के चलते प्रत्येक परिवार अपने सामर्थ्य अनुसार घर में कोई न कोई नवीन वस्तु अवश्य लेकर आता है। बाजार में रौनक के बीच इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शाम की आध्यात्मिक आराधना है। संध्याकाल में धन की देवी माता लक्ष्मी, समृद्धि के रक्षक कुबेर देवता और आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि की शास्त्रोक्त पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन सभी देव शक्तियों का संयुक्त पूजन मनुष्य को निरोगी काया के साथ अक्षुण्ण धन-धान्य प्रदान करता है। हालांकि सनातन पूजा पद्धति में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी पूजा का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब अनुष्ठान के अंत में निर्धारित क्रम के अनुसार चार प्रमुख आरतियां श्रद्धाभाव से गाई जाएं।\n\nधनतेरस 2026 पर पूजा और आरती का निर्धारित शुभ मुहूर्त\nपंचांग की गणनाओं के अनुसार 6 नवंबर 2026 को धनतेरस की शाम पूजा-अर्चना और आरती संपन्न करने के लिए अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन प्रदोष काल के दौरान पूजा का सबसे उत्तम समय शाम 06:02 बजे से लेकर शाम 07:57 बजे तक निर्धारित है। लगभग एक घंटा पचपन मिनट की इस शुभ समयावधि में देवी-देवताओं का षोडशोपचार पूजन करने के बाद चारों आरतियों का गायन अत्यंत फलदायी बताया गया है। मान्यता है कि इस निश्चित समय सीमा के भीतर एकाग्र मन से दीपक प्रज्वलित कर अर्चना करने से घर-परिवार में दरिद्रता का नाश होता है और पूरे वर्ष संपन्नता बनी रहती है।\n\nपूजा में आरतियों का सटीक क्रम और उसका आध्यात्मिक महत्व\nशास्त्रों के अनुसार देव आराधना में क्रमबद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। धनतेरस के दिन पूजन की पूर्णता के लिए चार विशिष्ट आरतियों का विधान सुनिश्चित किया गया है।\n\n• प्रथम स्थान: विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की वंदना\n• द्वितीय स्थान: धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री माता महालक्ष्मी की आरती\n• तृतीय स्थान: देव कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर की स्तुति\n• चतुर्थ स्थान: अमृत कलशधारी आरोग्य प्रदाता भगवान धन्वंतरि की आरती\n\nप्रथम स्तुति: विघ्न विनाशक भगवान गणेश की आरती\nसनातन परंपरा में किसी भी मांगलिक अनुष्ठान की शुरुआत प्रथम पूज्य गणपति की वंदना से ही होती है, ताकि आराधना बिना किसी विघ्न के संपन्न हो सके। धनतेरस की शाम सबसे पहले भगवान गणेश की पारंपरिक स्तुति की जाती है। इस आरती में पार्वती नंदन और देवाधिदेव महादेव के सुपुत्र गजानन के दिव्य स्वरूप का वर्णन मिलता है। भक्त गाते हैं कि एकदंत, परम दयालु और चार भुजाओं वाले प्रभु के मस्तक पर सिंदूर शोभायमान है और उनका वाहन मूषक है। पूजन में उन्हें पान के पत्ते, सुगंधित पुष्प, सूखे मेवे और प्रिय मोदक अर्पित किए जाते हैं। इस स्तुति में प्रभु की असीम कृपा का स्मरण करते हुए बताया गया है कि उनकी दया दृष्टि से नेत्रहीनों को दृष्टि, कुष्ठ रोगियों को सुंदर काया, निसंतान को संतान और निर्धनों को धन की प्राप्ति होती है। संकटमोचक गणेश जी दीनों की लाज रखकर भक्तों की समस्त मनोकामनाएं सिद्ध करते हैं।\n\nद्वितीय स्तुति: धन-वैभव प्रदाता माता लक्ष्मी की मंगल आरती\nगणपति पूजन के उपरांत दूसरे क्रम में माता महालक्ष्मी की जगप्रसिद्ध आरती का गायन किया जाता है। त्रिदेवों—ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा नित्य सेवित माता लक्ष्मी को संसार की परम जननी माना गया है। स्तुति के अनुसार उमा, रमा और ब्रह्माणी के रूप में जगत का संचालन करने वाली मां का ध्यान सूर्य, चंद्रमा और नारद मुनि जैसे ऋषि-मुनि निरंतर करते हैं। यह आरती इस सत्य को उद्घाटित करती है कि जिस घर में महालक्ष्मी का वास होता है, वहां सद्गुणों का स्वतः आगमन हो जाता है और मन का संशय समाप्त होता है। संसार के समस्त यज्ञ, उत्तम वस्त्र, भोजन और वैभव उन्हीं के आशीर्वाद से सुलभ होते हैं। क्षीरसागर मंथन से प्रकट हुई देवी के बिना चौदह रत्नों की प्राप्ति संभव नहीं थी। इस पावन आरती का गान करने वाले जातक के अंतःकरण में असीम आनंद का संचार होता है और समस्त पापों का निवारण होता है।\n\nतृतीय स्तुति: धन के रक्षक कुबेर देवता की आराधना\nमहालक्ष्मी के आशीर्वाद को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए तीसरे चरण में यक्षराज कुबेर की आरती की जाती है। भगवान शिव के परम भक्त कुबेर देव अपनी शरण में आए भक्तों के भंडारों को सदा परिपूर्ण रखते हैं। आरती में उनके पराक्रम और वैभवशाली रूप की स्तुति की गई है। स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ़ कुबेर देव के शीश पर राजछत्र सुशोभित है और योगिनियां उनके मंगल गीत गाती हैं। गदा, त्रिशूल और विभिन्न दिव्य अस्त्रों से सुसज्जित यक्षराज अपने धनुष की टंकार से भय और संकटों का निवारण करते हैं। पूजन में उन्हें उड़द, चना और मोहन भोग का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। यह स्तुति स्पष्ट करती है कि कुबेर देव केवल धन ही नहीं, बल्कि बल, बुद्धि और विद्या का भी वरदान देते हैं। कपूर और शुद्ध घी की ज्योत से जो भी साधक उनका गुणगान करता है, उसे सभी मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।\n\nचतुर्थ स्तुति: आरोग्य और आयुर्वेद प्रणेता भगवान धन्वंतरि की वंदना\nधनतेरस की पूजा का समापन भगवान धन्वंतरि की आरती के साथ होता है, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे, तब उन्होंने देवताओं और असुरों के गंभीर संकटों का शमन किया था। उन्होंने संसार को आयुर्वेद का अनमोल ज्ञान दिया और स्वस्थ जीवन जीने के प्राकृतिक नियम समझाए। चार भुजाओं वाले प्रभु के करकमलों में शंख, चक्र और अमृत सुशोभित है, तथा वे दिव्य औषधीय वनस्पतियों से घिरे रहते हैं। आरती में कहा गया है कि धन्वंतरि जी का नित्य ध्यान करने से असाध्य रोगों और बुढ़ापे की व्याधियों का नाश हो जाता है। संपूर्ण वैद्य समाज उनके चरणों की वंदना करता है। जो भी श्रद्धालु इस आरती का गायन करता है, वह रोग और शोक से मुक्त होकर दीर्घायु और सुख-समृद्धि का भागी बनता है।\n\nइसका आप पर असर\nधनतेरस पर सही समय और विधि से की गई पूजा परिवार में आध्यात्मिक शांति और समृद्धि लाती है।\n\n• समय का सदुपयोग: शाम 06:02 बजे से 07:57 बजे के बीच पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त है। इस निर्धारित समय में पूजन और चारों आरतियां पूरी करने से अनुष्ठान का पूर्ण फल मिलता है।\n• पारिवारिक परंपरा: खरीदारी के साथ-साथ चारों आरतियों का सामूहिक पाठ करना चाहिए। इससे घर के सदस्यों में धार्मिक मूल्यों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ती है।\n• आरोग्य का संदेश: भगवान धन्वंतरि की आराधना खान-पान और जीवनशैली को अनुशासित रखने की प्रेरणा देती है। यह अनुष्ठान मौसमी बीमारियों से बचाव और सतर्कता का संकल्प लेने का अवसर है।\n• खर्च और बचत का संतुलन: कुबेर देव और लक्ष्मी जी का पूजन आर्थिक संतुलन का प्रतीक है। खरीदारी के उत्साह में अनावश्यक कर्ज लेने से बचें और विवेकपूर्ण वित्तीय योजना बनाएं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nधनतेरस का पर्व केवल व्यापारिक खरीदारी का दिन नहीं, बल्कि देवताओं के प्राकट्य और प्रकृति के उपहारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। समुद्र मंथन से जुड़े पौराणिक संदर्भ और ऋतु परिवर्तन के स्वास्थ्य नियम इस उत्सव की नींव हैं।\n\n• समुद्र मंथन का प्रसंग: समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन ही भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर अवतरित हुए थे। इसी कारण इस तिथि को धन्वंतरि जयंती और धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा।\n• आरोग्य और ऐश्वर्य का समन्वय: सनातन परंपरा में स्वास्थ्य को पहला सुख और धन को दूसरा सुख माना गया है। इसीलिए धन की देवी लक्ष्मी और कोषपाल कुबेर के साथ आयुर्वेद प्रणेता धन्वंतरि की संयुक्त पूजा अनिवार्य की गई।\n• गणेश पूजन की शास्त्रीय अनिवार्यता: किसी भी अनुष्ठान को निर्विघ्न संपन्न करने के लिए प्रथम पूज्य गणेश जी का स्मरण आवश्यक होता है। इसी कारण आरतियों के क्रम में सबसे पहला स्थान विघ्नहर्ता को दिया गया है।\n• शुभ मुहूर्त का खगोलीय आधार: प्रदोष काल में स्थिर लग्न का संयोग धनतेरस की शाम को बनता है। यह खगोलीय स्थिति साधना और संकल्प के स्थायी प्रभाव के लिए सबसे अनुकूल मानी जाती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. धनतेरस 2026 पर पूजा और आरती का सबसे शुभ समय क्या है?\nधनतेरस पर पूजन और आरती करने का सबसे शुभ समय शाम 06:02 बजे से लेकर शाम 07:57 बजे तक रहेगा।\n\n2. धनतेरस की शाम कौन-कौन सी 4 आरतियां करनी चाहिए?\nइस दिन भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, कुबेर देवता और भगवान धन्वंतरि की आरती करने का विधान है।\n\n3. आरती का सही क्रम क्या होना चाहिए?\nसबसे पहले गणेश जी की आरती करें, उसके बाद लक्ष्मी जी, तीसरे क्रम में कुबेर देव और अंत में भगवान धन्वंतरि की आरती करनी चाहिए।\n\n4. धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों की जाती है?\nभगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे और आयुर्वेद के प्रणेता हैं, इसलिए उत्तम स्वास्थ्य और निरोगी जीवन के लिए उनकी पूजा की जाती है।\n\n5. धनतेरस 2026 किस तारीख को मनाई जा रही है?\nवर्ष 2026 में धनतेरस का पावन पर्व 6 नवंबर को मनाया जा रहा है।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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    "लक्ष्मी आरती",
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