दीवाली के बाद हैदराबाद की सड़कों पर उतरते हैं मुर्रा बुल, सदर उत्सव में दिखता है अनोखा अंदाज तेलंगाना की राजधानी में गोवर्धन पूजा के अवसर पर ऐतिहासिक सदर सम्मेलन का आयोजन किया जाता है, जहाँ लाखों के इनामी मुर्रा बुल अपने पिछले पैरों पर खड़े होकर करतब दिखाते हैं। दीवाली के ठीक अगले दिन जब देश भर में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है, तब तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक बेहद अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा जीवंत हो उठती है। स्थानीय स्तर पर भैंसों के कार्निवल के नाम से मशहूर सदर सम्मेलन के दौरान शहर की सड़कों पर भारी भीड़ जुटती है। करीब आठ दशकों से निरंतर आयोजित हो रहा यह उत्सव हैदराबाद की साझा गंगा-जमुनी तहजीब और चरवाहा संस्कृति के गहरे जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। पूरे देश में अपनी तरह का यह इकलौता आयोजन है, जहाँ शक्ति, अनुशासन और पशु प्रेम का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। निजाम काल से शुरू हुई थी यह ऐतिहासिक परंपरा सदर उत्सव का इतिहास निजाम शासन के दौर से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1946 में यादव समुदाय के वरिष्ठ नेता सालंद्री न्याम चौधरी मल्लैया यादव ने इस आयोजन की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर से निकलकर समय बीतने के साथ यह जलसा एक व्यापक सांस्कृतिक मेले में परिवर्तित हो चुका है। इस पूरे आयोजन का मुख्य आकर्षण नारायणगुड़ा स्थित वाईएमसीए मैदान रहता है। इसके अलावा खैरताबाद, मुशीराबाद और सिकंदराबाद के विभिन्न इलाकों में भी रात भर उत्सव का माहौल बना रहता है और लोग इस अनूठे प्रदर्शन को देखने पहुँचते हैं। शाही खुराक और विशेष श्रृंगार से तैयार होते हैं मुर्रा बुल इस पूरे सम्मेलन का केंद्र बिंदु पंजाब और हरियाणा से विशेष रूप से मंगाए गए मुर्रा नस्ल के विशालकाय बुल होते हैं। इन नर भैंसों का वजन लगभग 1500 से लेकर 2000 किलोग्राम तक होता है और इनकी देखरेख किसी शाही मेहमान की तरह की जाती है। इनकी दैनिक खुराक में बादाम, पिस्ता, सेब के साथ-साथ प्रतिदिन 20 से 25 लीटर ताजा दूध शामिल रहता है। मैदान में लाने से पहले इनकी खास तैयारी की जाती है, जिसके तहत पूरे शरीर पर सरसों के तेल से मालिश की जाती है। उनके सींगों को चटक रंगों और मोरपंखों से सजाया जाता है, जबकि गले में आकर्षक घुंघरू और घंटियां बांधी जाती हैं। प्रदर्शन में सरताज और गोलू जैसे लोकप्रिय बुल हमेशा दर्शकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर दो पैरों पर खड़े होने का करतब सदर की रात जब पारंपरिक ढोल-ताशों और स्थानीय तीन मार बीट्स की तेज धुन गूंजती है, तब अखाड़ों के पहलवान और युवा इन विशालकाय जीवों से हैरतअंगेज करतब करवाते हैं। इशारों पर इन भारी-भरकम बुलों को पिछले दो पैरों पर खड़ा कराया जाता है, जिसे देखने के लिए उमड़ी भीड़ का जोश चरम पर पहुँच जाता है। यह करतब काफी जोखिम भरा होता है, जिसे केवल प्रशिक्षित लोग ही अंजाम देते हैं। इसके साथ ही अखाड़ों से जुड़े पहलवान पारंपरिक कुश्ती के दांव-पेंच, लाठी चलाने और तलवारबाजी के साहसिक प्रदर्शन भी दर्शकों के सामने पेश करते हैं। अनुशासन और तंदुरुस्ती पर लाखों का नकद पुरस्कार सदर सम्मेलन केवल पशुओं के प्रदर्शन तक सीमित न रहकर सामाजिक सौहार्द का एक बड़ा प्रतीक माना जाता है, जिसमें विभिन्न वर्गों और धर्मों के लाखों लोग शामिल होते हैं। कार्यक्रम के समापन पर सबसे सेहतमंद, आकर्षक और अनुशासित बुल के मालिकों को सम्मानित किया जाता है। विजेताओं को प्रोत्साहन के रूप में शील्ड और लाखों रुपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाता है। इसका आप पर असर हैदराबाद के सदर उत्सव से पशुपालकों की आजीविका, पारंपरिक नस्ल संरक्षण और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। • भारत में: देश भर के पशुपालकों में उच्च नस्ल के मवेशियों और मुर्रा बुल के वैज्ञानिक संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। इससे उन्नत पशुपालन और बेहतर दुग्ध उत्पादन के तरीकों को प्रोत्साहन मिलता है। • हैदराबाद में: स्थानीय निवासियों और व्यापारियों को दीवाली के तुरंत बाद एक भव्य सांस्कृतिक और आर्थिक उत्सव का अनुभव मिलता है। शहर के नारायणगुड़ा, खैरताबाद और सिकंदराबाद जैसे क्षेत्रों में उत्सव के दौरान भारी भीड़ के चलते व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आती है। • पशुपालकों के लिए: विजेताओं को मिलने वाले लाखों के नकद इनाम और राष्ट्रीय पहचान से मवेशियों के मालिकों को आर्थिक संबल मिलता है। इससे हरियाणा और पंजाब के पशुपालकों के लिए दक्षिण भारत में एक बड़ा बाजार भी तैयार होता है। • दर्शकों के लिए: आम जनता को पारंपरिक कुश्ती, लाठीबाजी और पशु करतब जैसे साहसिक लोक कलाओं को प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिलता है। परिवारों और युवाओं के लिए यह सामूहिक सामाजिक जुड़ाव का केंद्र बनता है। ऐसा क्यों हुआ सदर उत्सव की शुरुआत 1946 में सामाजिक एकता और चरवाहा समुदाय की समृद्ध विरासत को मंच देने के लिए की गई थी। • चरवाहा संस्कृति का सम्मान: दीवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा पर मवेशियों की पूजा और आभार व्यक्त करने की सदियों पुरानी परंपरा रही है। यादव समुदाय ने पशुओं के महत्व को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस सार्वजनिक कार्निवल का स्वरूप तैयार किया। • निजाम कालीन पृष्ठभूमि: 1946 में समुदाय के नेता सालंद्री न्याम चौधरी मल्लैया यादव ने तत्कालीन हैदराबाद में लोगों को एकजुट करने के लिए सम्मेलन की नींव रखी थी। समय के साथ यह सीमित सभा से विस्तृत होकर शहर के बड़े सांस्कृतिक मेले में बदल गया। • प्रजनन और शक्ति प्रदर्शन: उत्तर भारत की मुर्रा नस्ल के भारी-भरकम बुलों की ताकत और चुस्ती को दिखाने के लिए यह मंच बना। नियमित अभ्यास, पौष्टिक खुराक और अनुशासन के बल पर इन पशुओं से हैरतअंगेज करतब करवाए जाते हैं। सवाल-जवाब 1. सदर उत्सव किस अवसर पर और कहाँ आयोजित किया जाता है? यह उत्सव दीवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के मौके पर तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में मनाया जाता है। 2. सदर सम्मेलन की शुरुआत कब और किसने की थी? इसकी शुरुआत 1946 में निजाम के दौर में यादव समुदाय के नेता सालंद्री न्याम चौधरी मल्लैया यादव ने की थी। 3. इस उत्सव में किन खास मवेशियों को शामिल किया जाता है? मेले में विशेष रूप से हरियाणा और पंजाब से लाए गए 1500 से 2000 किलो वजनी मुर्रा नस्ल के विशालकाय बुल शामिल होते हैं। 4. इन बुलों को क्या विशेष आहार दिया जाता है? इन्हें बादाम, पिस्ता, सेब और रोजाना 20 से 25 लीटर ताजा दूध जैसी शाही खुराक दी जाती है। 5. सदर उत्सव में बुल कौन से करतब दिखाते हैं? पहलवानों और युवाओं के इशारों पर ये विशालकाय बुल अपने पिछले दो पैरों पर सीधे खड़े होकर हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं। 6. हैदराबाद में इस उत्सव के मुख्य केंद्र कौन से हैं? इसका मुख्य केंद्र नारायणगुड़ा का वाईएमसीए मैदान है, जबकि खैरताबाद, मुशीराबाद और सिकंदराबाद में भी जश्न मनता है। 7. विजेता बुलों के मालिकों को क्या पुरस्कार मिलता है? सबसे तंदुरुस्त और अनुशासित बुल के मालिकों को शील्ड और लाखों रुपये का नकद इनाम दिया जाता है। https://trendkia.com/festivals/divali-ke-bada-hyderabad-ki-sarakon-para-utarate-hain-murrah-bula-sadar-utsava-men-dikhata-hai-anokha-andaja-54815 TrendKia — Har trend, sabse pehle.