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  "type": "article",
  "title": "गणेश चतुर्थी पर दिल्ली में छाया महाराष्ट्र का पेण शिल्प, कनॉट प्लेस में मिल रहे पर्यावरण-अनुकूल बप्पा",
  "summary": "दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित महाराष्ट्र एम्पोरियम में महाराष्ट्र से आई इको-फ्रेंडली गणपति की मूर्तियां लोगों का ध्यान खींच रही हैं। पेण और रायगढ़ की 100 साल पुरानी पारंपरिक कला से बनी इन मूर्तियों की शुरुआती कीमत 1200 रुपये है।",
  "content": "गणेश उत्सव की शुरुआत से ठीक पहले राजधानी दिल्ली के बाजारों में बप्पा के स्वागत की जोरदार तैयारियां चल रही हैं। इस बार दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित महाराष्ट्र एम्पोरियम में महाराष्ट्र की मिट्टी से बनी इको-फ्रेंडली गणपति मूर्तियों का खास संग्रह प्रस्तुत किया गया है। ये प्रतिमाएं न केवल देखने में आकर्षक और कलात्मक हैं, बल्कि पर्यावरण सुरक्षा के मानकों पर भी पूरी तरह खरी उतरती हैं। गणेशोत्सव के बाद जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से इन्हें पूरी तरह प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया गया है, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।\n\nमहाराष्ट्र लघु उद्योग विकास महामंडल की विशेष पहल\nइन अनूठी मूर्तियों की प्रदर्शनी के लिए महाराष्ट्र से दिल्ली पहुंचीं सपना जाधव ने बताया कि उन्हें यह अवसर महाराष्ट्र लघु उद्योग विकास महामंडल की मदद से मिला है। उन्होंने संस्थान के अधिकारियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि दिल्ली में पहली बार आकर उन्हें बेहद खुशी हो रही है। सपना के अनुसार, दिल्ली के लोग इको-फ्रेंडली मूर्तियों की खरीदारी में काफी रुचि दिखा रहे हैं। विभिन्न डिजाइनों और आकारों की ये मूर्तियां स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रही हैं।\n\nपेण और रायगढ़ की 100 साल पुरानी विरासत\nइन मूर्तियों के निर्माण के पीछे महाराष्ट्र की एक सदी पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है। सपना ने जानकारी दी कि प्रतिमाएं बनाने की यह कला लगभग 100 साल पुरानी है और इसका मुख्य केंद्र महाराष्ट्र का रायगढ़ तथा पेण क्षेत्र रहा है। पेण इलाका पूरे देश में अपनी बारीक और सुंदर गणेश मूर्तियों के लिए जाना जाता है। इस पारंपरिक कला में आधुनिक पर्यावरणीय आवश्यकताओं का समावेश करते हुए कारीगरों ने प्राकृतिक मूर्तियों का निर्माण शुरू किया है। पारंपरिक स्वरूप के साथ नए प्रयोगों का मेल इन मूर्तियों को आम प्रतिमाओं से अलग बनाता है।\n\nकागज की लुगदी और प्राकृतिक मिट्टी का संयोजन\nपर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए इन मूर्तियों को बनाने में पेपर पल्प यानी कागज की लुगदी और विशेष प्राकृतिक मिट्टी का उपयोग किया जाता है। सपना जाधव ने बताया कि इन प्रतिमाओं में प्रयुक्त सभी सामग्रियां और रंग पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं, जो जल में आसानी से घुल जाती हैं। इन मूर्तियों को बनाने का अधिकांश कार्य महिला कारीगरों की टीम संभालती है। आकार के अनुसार मूर्तियों का वजन भी तय होता है, जिसमें छोटी मूर्तियों का वजन करीब 4 किलोग्राम और बड़ी प्रतिमाओं का वजन लगभग 15 किलोग्राम तक रहता है।\n\nतकनीकी अनुभव से कम हुआ रंगाई का समय\nप्रतिमाओं को नया रूप देने की प्रक्रिया पर बात करते हुए सपना ने बताया कि पहले मूर्तियों के शुरुआती रंगाई कार्य में लगभग एक घंटे का समय लग जाता था। हालांकि, अब सालों के अनुभव और आधुनिक तकनीकों की मदद से यह काम महज 15 मिनट के भीतर शुरू हो जाता है। मूर्तियों की अंतिम फिनिशिंग और सजावट का समय उनके आकार और बारीक नक्काशी पर निर्भर करता है। महिला कारीगरों का दल दिल्ली में रहकर भी इन पारंपरिक मूर्तियों को फिनिशिंग देने का कार्य कर रहा है।\n\n1200 रुपये से 25 हजार रुपये तक की रेंज\nमहाराष्ट्र एम्पोरियम में ग्राहकों की सहूलियत के लिए हर बजट और आकार के गणपति उपलब्ध कराए गए हैं। यहां उपलब्ध 6 इंच की शुरुआती मूर्ति की कीमत 1200 रुपये रखी गई है। इसके अलावा 8 इंच की मूर्ति 2100 रुपये और 10 इंच की प्रतिमा लगभग 3100 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही है। एम्पोरियम में 6 इंच से लेकर 30 इंच तक के गणपति के विकल्प मौजूद हैं, जबकि बड़े और विशेष नक्काशी वाले गणपति की कीमत 25,000 रुपये तक तय की गई है।\n\nविट्ठल माउली की प्रतिमा बनी आकर्षण का केंद्र\nगणेश प्रतिमाओं के अतिरिक्त इस प्रदर्शनी में महाराष्ट्र की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ी ‘विट्ठल माउली’ की मूर्ति भी रखी गई है। पंढरपुर के भगवान विट्ठल को समर्पित यह कलाकृति अपनी पारंपरिक पोशाक और सौम्य स्वरूप के कारण श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। दिल्ली यात्रा का अपना अनुभव साझा करते हुए सपना जाधव ने बताया कि राजधानी के लोगों से उन्हें अत्यधिक प्रेम, अपनापन और सहयोग मिला है।\n\nइसका आप पर असर\nकनॉट प्लेस स्थित महाराष्ट्र एम्पोरियम में इको-फ्रेंडली गणपति की उपलब्धता से दिल्ली-एनसीआर के निवासियों को बिना जल प्रदूषण फैलाए त्योहार मनाने का सीधा विकल्प मिल गया है।\n\n• भारत भर में: पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों के बढ़ते चलन से देश की प्रमुख नदियों और तालाबों में मूर्ति विसर्जन के बाद होने वाले जहरीले रसायनों के प्रभाव को रोकने में मदद मिलती है।\n• दिल्ली-एनसीआर में: स्थानीय श्रद्धालु 1200 रुपये से लेकर 25,000 रुपये तक की कीमत में विभिन्न आकारों (6 से 30 इंच) की पेपर पल्प और प्राकृतिक मिट्टी से बनी मूर्तियां कनॉट प्लेस से खरीद सकते हैं।\n• कारीगरों के लिए: महाराष्ट्र के पेण और रायगढ़ की पारंपरिक महिला कारीगरों के हस्तशिल्प को राष्ट्रीय स्तर का बाजार और उचित मूल्य प्राप्त हो रहा है।\n• पर्यावरण संरक्षण: प्राकृतिक मिट्टी और इको-फ्रेंडली रंगों से बनी मूर्तियां पानी में महज 15 से 30 मिनट में बिना किसी प्रदूषण के घुल जाती हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमहाराष्ट्र की 100 साल पुरानी पेण हस्तकला को दिल्ली में बढ़ावा देने और गणेशोत्सव पर रासायनिक मूर्तियों से होने वाले जल प्रदूषण को रोकने के लिए इस विशेष बिक्री प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है।\n\n• सरकारी प्रोत्साहन: महाराष्ट्र लघु उद्योग विकास महामंडल ने राज्य की पारंपरिक महिला कारीगरों को राष्ट्रीय मंच देने के लिए इस प्रदर्शनी का आयोजन किया।\n• ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: महाराष्ट्र का पेण और रायगढ़ क्षेत्र पिछले 100 वर्षों से बारीक गणेश मूर्तियों के निर्माण का ऐतिहासिक केंद्र रहा है।\n• पर्यावरणीय जरूरत: प्लास्टर ऑफ पेरिस और हानिकारक रासायनिक रंगों के कारण विसर्जन के बाद जल निकायों में होने वाले गंभीर प्रदूषण से निपटने के लिए इको-फ्रेंडली विकल्प तैयार किए गए।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिल्ली में ये इको-फ्रेंडली गणपति मूर्तियां कहां मिल रही हैं?\nयह मूर्तियां दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित महाराष्ट्र एम्पोरियम में उपलब्ध हैं।\n\n2. इन इको-फ्रेंडली मूर्तियों की शुरुआती कीमत क्या है?\nयहां 6 इंच की शुरुआती मूर्ति की कीमत 1200 रुपये से शुरू होती है।\n\n3. इन मूर्तियों को बनाने में किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है?\nइन्हें तैयार करने में पेपर पल्प (कागज की लुगदी), प्राकृतिक मिट्टी और इको-फ्रेंडली रंगों का इस्तेमाल किया गया है।\n\n4. यह मूर्तिकला किस क्षेत्र से जुड़ी हुई है?\nयह महाराष्ट्र के पेण और रायगढ़ क्षेत्र की लगभग 100 साल पुरानी पारंपरिक कला से जुड़ी हुई है।\n\n5. एम्पोरियम में उपलब्ध सबसे बड़ी मूर्ति की कीमत और आकार क्या है?\nयहां करीब 30 इंच तक की प्रतिमाएं उपलब्ध हैं और विशेष नक्काशीदार बड़ी मूर्तियों की कीमत 25,000 रुपये तक है।\n\nप्रेरणा और सबक\nमहाराष्ट्र के पेण की महिला कारीगरों ने 100 साल पुरानी अपनी पारंपरिक कला को आधुनिक समय की पर्यावरण-अनुकूल जरूरतों के साथ जोड़कर एक मिसाल पेश की है।\n\n• विरासत और नवाचार का मेल: अपनी 100 साल पुरानी पारंपरिक मूर्तिकला को छोड़े बिना उसमें प्राकृतिक मिट्टी और पेपर पल्प का इस्तेमाल कर नया मोड़ दिया।\n• महिला सशक्तिकरण: महिला कारीगरों की पूरी टीम आत्मनिर्भर बनकर हस्तशिल्प के जरिए अपनी आजीविका संवार रही है और राज्य की सीमाओं से बाहर बाजार तलाश रही है।\n• पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी: कलात्मक गुणवत्ता से समझौता किए बिना समाज को सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त त्योहार मनाने का बेहतर विकल्प दिया।",
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  "category": "त्योहार",
  "publishedAt": "2026-09-13",
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