जैन मंदिरों में पर्युषण के दौरान अंगरचना की अनोखी परंपरा, आठ दिनों तक हर रोज़ बदलता है भगवान का दिव्य श्रृंगार पर्युषण पर्व के दौरान जैन मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं को रोजाना विशेष आंगी से सजाया जाता है। आठ दिनों तक चलने वाली इस परंपरा में सोने, चांदी और मोतियों से हर दिन अनूठा श्रृंगार तैयार किया जाता है। पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर जैन समाज के देवस्थानों में भक्ति और कला का अद्भूत संगम देखने को मिल रहा है। इस आठ दिवसीय धार्मिक आयोजन में मंदिरों के भीतर पूजा और अनुष्ठान के साथ-साथ तीर्थंकरों की मूर्तियों के विशेष श्रृंगार यानी आंगी की परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। जालौर सहित विभिन्न स्थलों पर स्थित जैन देवालयों में प्रतिदिन प्रभु की प्रतिमाओं को नया रूप दिया जाता है, जिससे दर्शन के लिए पहुँचने वाले श्रद्धालुओं को आठों दिन भगवान के भिन्न-भिन्न दिव्य दर्शन प्राप्त होते हैं। प्रतिमा सुरक्षा और आधार निर्माण का विशेष विधान भगवान की आंगी तैयार करने की यह विधि अत्यंत कलात्मक और सतर्कतापूर्ण होती है। कई प्रमुख मंदिरों में मूर्तियों के अलंकरण के लिए सोने और चाँदी की मूल्यवान सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। हालाँकि, पवित्र प्रतिमा को किसी भी प्रकार की क्षति से सुरक्षित रखने के लिए आंगी की सजावट सीधे मूल मूर्ति पर नहीं की जाती। इसके स्थान पर सबसे पहले चाँदी का एक विशेष ढाँचा तैयार किया जाता है, जिसे प्रतिमा के ऊपर सहजता से स्थापित किया जा सकता है। इस चाँदी के ढाँचे के ऊपर चंदन के बारीक बुरादे का उपयोग करके एक समतल आधार तैयार किया जाता है। आधार बन जाने के पश्चात कारीगर अत्यंत सूक्ष्मता और कुशलता से सजावटी सामग्री का संयोजन करते हैं। इसमें प्राकृतिक मोतियों, चाँदी के वर्क और सोने के महीन सजावटी पत्रों का संयोजन करके आंगी को अंतिम रूप दिया जाता है। इस पूरी व्यवस्था का मूल उद्देश्य यही होता है कि श्रृंगार को आसानी से चढ़ाया और उतारा जा सके तथा मूल प्रतिमा की सुरक्षा पूरी तरह बनी रहे। अद्वितीय परंपरा: कभी दोहराया नहीं जाता एक जैसा श्रृंगार आंगी सजावट की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी अटूट परंपरा है। आठ दिनों के उत्सव के दौरान जिस रूप या रूपरेखा में एक दिन आंगी तैयार की जाती है, उसे पर्व के शेष दिनों में कभी भी दोहराया नहीं जाता। प्रत्येक दिन की अंगरचना पूरी तरह से नवीन और अनूठी होती है। इसके अतिरिक्त, एक बार प्रयोग में लाई गई सजावटी सामग्री का पुन: उपयोग नहीं किया जाता, जिससे हर दिन की प्रस्तुति में ताजगी और विशिष्टता बनी रहती है। स्थानीय संगीतकार सुजल मेहता के अनुसार, पर्युषण के दिनों में मंदिरों में देखने को मिलने वाली यह आंगी परंपरा न केवल गहरी धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह हमारी प्राचीन कलात्मक दृष्टि और उत्कृष्ट कारीगरी की धरोहर को भी दर्शाती है। सोने, चाँदी और मोतियों के अद्भुत तालमेल से निर्मित यह अंगरचना दर्शकों और श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। आठ दिन और आठ अलग-अलग स्वरूप प्रत्येक दिन की संध्या अथवा प्रातः काल जब पुरानी आंगी को हटाया जाता है, तो कारीगर अगले दिन के लिए एक नए रूप की योजना पर कार्य प्रारंभ कर देते हैं। आठ दिनों की इस पूरी अवधि में भगवान के आठ अलग-अलग भव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के सामने प्रकट होते हैं। यही कारण है कि पर्युषण पर्व के दौरान जैन मंदिरों में प्रतिदिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो प्रभु के इस नित-नवीन श्रृंगार का दर्शन कर आत्मिक शांति और पुण्य लाभ अर्जित करती है। इसका आप पर असर पर्युषण पर्व के दौरान जैन मंदिरों की आंगी परंपरा श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों दोनों के लिए विशेष महत्व रखती है। • श्रद्धालुओं के लिए: आठ दिनों तक प्रतिदिन मंदिर जाने पर भगवान का एक नया और अनूठा स्वरूप देखने का अवसर मिलता है। दर्शनार्थियों को हर दिन अलग धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है। • सांस्कृतिक व कला प्रेमी: प्राचीन भारतीय हस्तकला, सोने-चांदी के बारीक वर्क और मोतियों के काम की विलुप्त होती कारीगरी को प्रत्यक्ष देखने का मौका मिलता है। • संरक्षण और सुरक्षा: मंदिर प्रबंधन द्वारा मूर्तियों को बिना नुकसान पहुंचाए सजावट करने की इस तकनीक से प्राचीन धरोहरों के संरक्षण का संदेश मिलता है। ऐसा क्यों हुआ जैन मंदिरों में पर्युषण के दौरान आंगी सजावट करने के पीछे धार्मिक आस्था और मूर्तियों की सुरक्षा दोनों मुख्य कारण हैं। • प्रतिमा की सुरक्षा: सोने, चांदी और मोतियों की सजावट अगर सीधे मूर्ति पर की जाए तो रसायन और घर्षण से मूर्ति को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए चांदी के ढांचे पर चंदन के बुरादे का आधार बनाकर आंगी तैयार की जाती है। • नवीनता की परंपरा: आठ दिनों में किसी भी आंगी डिजाइन और उपयोग की गई सजावटी सामग्री को दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता ताकि भक्ति भाव में ताजगी बनी रहे। • प्राचीन कला का जीवंत रूप: यह परंपरा सदियों पुरानी भारतीय कारीगरी और सौंदर्यशास्त्र को नई पीढ़ी के सामने जीवंत बनाए रखने का काम करती है। सवाल-जवाब 1. पर्युषण पर्व कितने दिनों तक मनाया जाता है? पर्युषण पर्व आठ दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें हर दिन धार्मिक आयोजन होते हैं। 2. आंगी सजावट क्या होती है? यह जैन मंदिरों में भगवान की प्रतिमाओं पर सोने, चांदी, चंदन और मोतियों से की जाने वाली एक विशेष अंगरचना या श्रृंगार है। 3. आंगी को सीधे मूर्ति पर क्यों नहीं बनाया जाता? भगवान की प्रतिमा को सुरक्षित रखने और किसी भी नुकसान से बचाने के लिए पहले चांदी का ढांचा लगाया जाता है और उसी पर आंगी बनाई जाती है। 4. क्या आंगी की सामग्री दोबारा उपयोग में ली जाती है? नहीं, आठ दिनों में एक बार इस्तेमाल की गई सजावटी सामग्री और डिजाइन को दोबारा दोहराया नहीं जाता। 5. आंगी का आधार किस चीज से तैयार किया जाता है? चांदी के ढांचे के ऊपर चंदन के बारीक बुरादे से आंगी का समतल आधार तैयार किया जाता है। https://trendkia.com/festivals/jain-mndiron-men-paryushan-ke-daurana-angarachana-ki-anokhi-parnpara-atha-dinon-taka-hara-roza-badalata-hai-bhagavana-ka-divya-shr-31492 TrendKia — Har trend, sabse pehle.