कुमाऊं की अनोखी परंपरा में बहन बनीं माता गौरा और जीजाजी बने शिव, जानिए बागेश्वर के सातूं-आठू उत्सव की पूरी कहानी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में सातूं-आठू का पावन लोकपर्व पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है, जिसमें माता गौरा को मायके आई बेटी और भगवान शिव को जीजाजी के रूप में पूजा जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में सांस्कृतिक धरोहर और रिश्तों की आत्मीयता से समृद्ध सांतू-आठू पर्व की अनुपम छटा बिखरी हुई है। यह पावन त्योहार केवल कर्मकांडीय अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह पर्व पर्वतीय समाज में मायके और ससुराल के प्रगाढ़ संबंधों, पारिवारिक संवेदनाओं तथा सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है। भाद्रपद महीने की पावन सप्तमी और अष्टमी तिथि को आयोजित होने वाले इस लोकपर्व में देवी गौरा को परिवार की बेटी व दीदी तथा देवों के देव महादेव भगवान शिव को आदरणीय जीजाजी मानकर पूजा अर्चना करने का अनोखा विधान है। बागेश्वर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। तहसील क्षेत्र में स्थित वरिष्ठ पत्रकार एवं व्यापारी केशव भट्ट तथा व्यापारी सुनीता भट्ट के घर पर यह लोकपर्व पूरी धार्मिक निष्ठा, नियम और पारम्परिक रीति-रिवाजों के अनुसार मनाया जा रहा है, जहां पूरा परिवेश भक्तिमय लोक धुनों से गुंजायमान है। पंचमी से शुरू होने वाली तैयारियां और बिरुड़ भिगोने का पावन विधान सांतू-आठू महोत्सव की आधिकारिक शुरुआत भाद्रपद मास की पंचमी तिथि से ही आरंभ हो जाती है। स्थानीय जानकार माधुरी उपाध्याय के अनुसार, पंचमी के दिन बिरुड़ भिगोने की बेहद पवित्र परंपरा निभाई जाती है। इस विशेष अनुष्ठान के लिए पांच प्रमुख अनाजों का चयन किया जाता है, जिनमें गहत, मक्का, गेहूं, कल्यूं और अन्य पारंपरिक अनाज शामिल होते हैं। इन सभी अनाजों को अत्यंत सतर्कता के साथ साफ-सुथरा करने के बाद एक पवित्र बर्तन में जल भरकर भिगोया जाता है। बिरुड़ तैयार करने की यह विधि इस लोकपर्व का बेहद अहम और प्राथमिक अंग मानी जाती है। महिलाएं पूर्ण पवित्रता, नियम तथा अपार श्रद्धा भावना के साथ इस कार्य को संपन्न करती हैं। इस अनुष्ठान के साथ ही समूचे घर-परिवार में मांगलिक कार्यों और उत्सव का विशेष माहौल निर्मित हो जाता है। सातूं पर मायके आगमन और आठूं पर शिव-गौरा के पावन मिलन का भाव पर्व के धार्मिक व पौराणिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए स्थानीय जानकार निकिता उपाध्याय बताती हैं कि सातूं यानी सप्तमी तिथि के दिन माता गौरा के अपने मायके पधारने की लोक मान्यता है। परंपरा के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि माता गौरा किसी बात पर मान-मनोव्वल के बाद या रूठकर अपने मायके आती हैं। इसी भाव को केंद्र में रखकर घर की महिलाएं गौरा का आतिथ्य सत्कार करती हैं और उन्हें अपनी सगी बहन या दीदी का दर्जा देकर पूजती हैं। इस अवसर पर महिलाएं निर्जला अथवा फलाहारी व्रत धारण कर अपने परिवार की सुख, शांति, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। वहीं, आगे के घटनाक्रम की जानकारी देते हुए स्थानीय जानकार मोहिनी उपाध्याय बताती हैं कि आठूं यानी अष्टमी के पावन दिन भगवान शिव अर्थात महेश्वर अपनी अर्धांगिनी माता गौरा को लिवाने के लिए ससुराल पहुंचते हैं। इसी कारण इस दिन को गौरा और महेश के पुनर्मिलन के पावन पर्व के रूप में हर्षाेल्लास से मनाया जाता है। महिलाएं भगवान शिव को जीजाजी के रूप में पूजती हैं और पूजा-अर्चना के दौरान पारम्परिक लोकगीतों के माध्यम से गौरा-महेश के पारिवारिक प्रसंगों तथा उनके दिव्य दांपत्य जीवन की गाथाओं का स्मरण करती हैं। झोड़ा-चांचरी के सुर और हुड़का की थाप से सराबोर माहौल सांतू-आठू पर्व केवल पूजा कक्ष तक सीमित न रहकर घर के आंगन और समूचे गांव-मोहल्ले में लोक संगीत की तान छेड़ देता है। स्थानीय जानकार कमला उपाध्याय बताती हैं कि इस पर्व के दौरान घर के आंगनों में लोकगीत, झोड़ा और चांचरी गाने की समृद्ध परंपरा देखने को मिलती है। महिलाएं समूह में एकत्रित होकर एक-दूसरे का हाथ थामकर या गोला बनाकर पारंपरिक गीतों का गायन करती हैं। कई स्थानों पर पारम्परिक वाद्य यंत्र हुड़का की सुमधुर थाप पर झोड़ा और चांचरी नृत्य का आयोजन किया जाता है। इन लोकगीतों के बोलों में माता गौरा और भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति भावना के साथ-साथ पहाड़ी जीवन के संघर्षों, प्राकृतिक सौंदर्य और रिश्तों की गहराई की सुंदर झलक मिलती है। इस दौरान क्षेत्र की महिलाएं एक स्थान पर एकत्र होकर अपनी खुशियां साझा करती हैं। बागेश्वर में भव्य आयोजन और पावन विसर्जन की प्रक्रिया बागेश्वर तहसील क्षेत्र में केशव भट्ट और सुनीता भट्ट के निवास स्थान पर सांतू-आठू का आयोजन बड़े पैमाने पर हो रहा है। महिलाएं प्रातःकाल से ही पूजन सामग्री संजोने, बिरुड़ तैयार करने और गौरा-महेश की मूर्तियों को सजाने में जुटी हुई हैं। घर का पूरा वातावरण पौराणिक मान्यताओं और सुमधुर लोकगीतों की गूंज से सराबोर है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह आयोजन अपनी प्राचीन जड़ों और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का एक सुअवसर बन गया है। सांतू-आठू पर्व के अंतिम चरण में गौरा-महेश की पूरे विधि-विधान से अंतिम पूजा संपन्न की जाती है। इसके पश्चात पूजित मूर्तियों और अंकुरित बिरुड़ को पास के किसी पवित्र मंदिर, नदी या जलस्रोत में विसर्जित कर दिया जाता है। इस विसर्जन अनुष्ठान के साथ ही इस बहुप्रतीक्षित लोकपर्व का औपचारिक समापन होता है, और श्रद्धालु अगले वर्ष पुनः माता गौरा के आगमन की प्रतीक्षा का संकल्प लेकर विदाई देते हैं। इसका आप पर असर भारत भर में: यह पर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और पारंपरिक त्योहारों की महत्ता को दर्शाता है। उत्तराखंड और बागेश्वर में: स्थानीय निवासियों के लिए यह त्योहार अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और सामुदायिक भाईचारे को मजबूत करने का खास अवसर प्रदान करता है। सवाल-जवाब 1. कुमाऊं में सांतू-आठू पर्व किस तिथि को मनाया जाता है? यह पर्व भाद्रपद मास की सप्तमी (सांतू) और अष्टमी (आठू) तिथि को मनाया जाता है, जिसकी तैयारियां पंचमी तिथि से शुरू हो जाती हैं। 2. बिरुड़ भिगोने की परंपरा में किन अनाजों का प्रयोग होता है? पंचमी के दिन बिरुड़ तैयार करने के लिए गहत, मक्का, गेहूं और कल्यूं सहित पांच प्रकार के अनाजों को धोकर पानी में भिगोया जाता है। 3. सांतू-आठू में माता गौरा और भगवान शिव के साथ क्या संबंध माना जाता है? इस पर्व में माता गौरा को मायके आई बेटी या दीदी (बहन) और भगवान शिव को जीजाजी के रूप में मानकर पूजा जाता है। 4. सांतू और आठू के दिनों की धार्मिक मान्यताएं क्या हैं? सप्तमी (सातूं) को माना जाता है कि गौरा रूठकर मायके आती हैं, जबकि अष्टमी (आठू) को भगवान शिव उन्हें लेने ससुराल पहुंचते हैं। 5. उत्सव के दौरान कौन से लोकनृत्य और लोकगीत आयोजित किए जाते हैं? महिलाएं समूह में हुड़का वाद्य यंत्र की थाप पर पारंपरिक झोड़ा और चांचरी लोकगीत तथा नृत्य प्रस्तुत करती हैं। 6. सांतू-आठू पर्व का समापन किस प्रकार किया जाता है? पूजा-अर्चना के अंतिम चरण में गौरा-महेश की प्रतिमाओं और अंकुरित बिरुड़ का स्थानीय मंदिर, नदी या जलस्रोत में विसर्जन किया जाता है। https://trendkia.com/festivals/kumaon-ki-anokhi-parnpara-men-bahana-banin-mata-gaura-aura-jijaji-bane-shiva-janie-bageshwar-ke-saantu-aathoo-utsava-ki-puri-kahan-19053 TrendKia — Har trend, sabse pehle.