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  "title": "राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ से जुड़ी है नाग पंचमी, जानिए सावन में नाग देव की पूजा का रहस्य",
  "summary": "सावन शुक्ल पंचमी पर नाग पंचमी का पावन पर्व मनाया जाता है। जानिए राजा जनमेजय के सर्प सत्र यज्ञ, आस्तीक मुनि द्वारा नागों की रक्षा और कालसर्प दोष निवारण की पौराणिक कथा।",
  "content": "सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को देश भर में नाग पंचमी का पावन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर नाग देवता की कृपा पाने के लिए श्रद्धालु उन्हें कच्चा दूध, लावा, फूल और ताजे फल अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के अवसर पर नाग देव की विधिवत पूजा-अर्चना करने से जातक की कुंडली में मौजूद कालसर्प दोष का प्रभाव शीघ्र समाप्त हो जाता है। इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस पर्व का महत्व कई गुना बढ़ गया है। ज्योतिष शास्त्र में ऐसे शुभ योग को अत्यंत फलदायी माना गया है, जिसमें भगवान महादेव और नाग देव की एक साथ आराधना करने से घर परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और निरंतर तरक्की का वास होता है।\n\nराजा जनमेजय का सर्प सत्र यज्ञ और पौराणिक संदर्भ\nपौराणिक ग्रंथों में नाग पंचमी पर्व की शुरुआत को लेकर एक अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण कथा का वर्णन मिलता है। यह कथा कुरुवंश के प्रतापी राजा परीक्षित से जुड़ी हुई है, जो वीर अभिमन्यु के पुत्र थे। एक बार शमीक ऋषि के श्राप के प्रभाव से राजा परीक्षित को तक्षक नाग ने डस लिया था, जिसके कारण उनकी अकाल मृत्यु हो गई। अपने पिता की इस प्रकार हुई मृत्यु का समाचार पाकर उनके पुत्र राजा जनमेजय अत्यंत क्रोधित और व्याकुल हो उठे। पिता की हत्या का बदला लेने और संपूर्ण ब्रह्मांड से सर्पों का अस्तित्व समाप्त करने के उद्देश्य से राजा जनमेजय ने एक विशाल और अत्यंत शक्तिशाली सर्प सत्र महायज्ञ का आयोजन किया।\n\nराजा जनमेजय द्वारा आयोजित इस महायज्ञ में प्रकांड ऋषियों और मुनियों ने भाग लिया। जब ऋषियों ने यज्ञ कुंड के समक्ष बैठकर अति शक्तिशाली मंत्रों का सस्वर उच्चारण आरंभ किया, तो उन मंत्रों के दिव्य प्रभाव से संपूर्ण विश्व के छोटे-बड़े सर्प स्वयं खिंचे चले आने लगे। वे बेबस होकर यज्ञ कुंड की धधकती अग्नि में गिरकर भस्म होने लगे। चारों ओर सर्प जाति में भय और हाहाकार मच गया। अपनी जान बचाने के लिए तक्षक नाग भागकर देवलोक पहुंचे और देवराज इंद्र के सिंहासन से कसकर लिपट गए।\n\nआस्तीक मुनि का आगमन और नागों को अभयदान\nजब ऋषियों को यह आभास हुआ कि तक्षक नाग देवराज इंद्र की शरण में छिपा हुआ है, तो उन्होंने ऐसे प्रचंड मंत्रों का जाप शुरू कर दिया जिनसे तक्षक के साथ-साथ इंद्रदेव का सिंहासन भी यज्ञ कुंड की ओर खिंचने लगा। इस दृश्य को देखकर पूरे देवलोक में अत्यंत भय और अफरा-तफरी फैल गई। समस्त देवताओं ने तुरंत माता मनसा देवी से प्रार्थना की कि वे इस विनाशकारी यज्ञ को रुकवाने का कोई उपाय निकालें। देवताओं के आग्रह पर माता मनसा देवी के सुपुत्र और परम विद्वान युवा आस्तीक मुनि राजा जनमेजय के यज्ञ स्थल पर पधारे।\n\nआस्तीक मुनि ने अपने अगाध ज्ञान, नीतिगत तर्कों और मधुर वाणी से राजा जनमेजय को अत्यधिक प्रभावित एवं प्रसन्न कर लिया। यज्ञ के समापन के अवसर पर राजा जनमेजय ने आस्तीक मुनि से अपनी इच्छानुसार कोई भी वरदान मांगने का निवेदन किया। तब आस्तीक मुनि ने राजा से अपने लिए कुछ न मांगकर, नाग वंश की रक्षा हेतु इस विनाशकारी सर्प सत्र महायज्ञ को तत्काल प्रभाव से रोकने और समस्त नागों को अभयदान देने का वरदान मांग लिया। राजा जनमेजय आस्तीक मुनि के वचनों से बंधे थे, इसलिए उन्होंने सहर्ष यज्ञ की समाप्ति की घोषणा कर दी। इस प्रकार तक्षक नाग सहित बचे हुए समस्त सर्पों के प्राण बच गए।\n\nनाग पंचमी का धार्मिक महत्व और पूजा की परंपरा\nजिस पावन तिथि पर आस्तीक मुनि ने सर्प सत्र यज्ञ को रुकवाकर नागों के जीवन की रक्षा की थी, उस दिन सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। यज्ञ की अग्नि से तपे हुए सर्पों के शरीर की जलन और पीड़ा को शांत करने के लिए आस्तीक मुनि ने उन पर कच्चा दूध और पवित्र जल छिड़का था। इस दया भाव से प्रसन्न होकर नाग देव ने आशीर्वाद दिया कि जो भी मनुष्य सावन शुक्ल पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करेगा और उन्हें दूध अर्पित करेगा, उसे कभी भी सर्प भय या सर्पदंश का सामना नहीं करना पड़ेगा। उसी समय से प्रतिवर्ष इस तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।\n\nज्योतिषीय दृष्टिकोण से नाग पंचमी के दिन सावन सोमवार का पड़ना एक अद्भुत अवसर है। इस दिन प्रातः काल स्नान के पश्चात शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करने और नाग देवता पर दूध, अक्षत, लावा और पुष्प चढ़ाने का विधान है। ऐसा करने से न केवल भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, बल्कि जातक के जीवन से कालसर्प दोष, राहु-केतु के अशुभ प्रभाव और भय का हमेशा के लिए नाश हो जाता है।\n\nइसका आप पर असर\nधार्मिक श्रद्धालुओं के लिए: सावन सोमवार और नाग पंचमी के दुर्लभ संयोग में भगवान शिव और नाग देव की पूजा करने से कालसर्प दोष व भय का निवारण होता है तथा घर में सुख-समृद्धि आती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नाग पंचमी कब मनाई जाती है?\nनाग पंचमी हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है।\n\n2. नाग पंचमी के दिन किसकी पूजा की जाती है और क्या चढ़ाया जाता है?\nइस दिन नाग देवता और भगवान शिव की पूजा की जाती है तथा उन्हें कच्चा दूध, लावा, फल और फूल अर्पित किए जाते हैं।\n\n3. नाग पंचमी की पौराणिक कथा राजा जनमेजय से कैसे जुड़ी है?\nराजा जनमेजय ने अपने पिता राजा परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए 'सर्प सत्र महायज्ञ' शुरू किया था, जिसे आस्तीक मुनि ने सावन शुक्ल पंचमी के दिन रुकवाकर सर्पों के प्राण बचाए थे।\n\n4. नाग पंचमी पर पूजा करने से कौन सा दोष दूर होता है?\nधार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देव और शिव जी की पूजा करने से कालसर्प दोष का प्रभाव समाप्त हो जाता है।",
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  "category": "त्योहार",
  "publishedAt": "2026-08-16",
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