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  "title": "रक्षा बंधन पर क्यों नहीं बांधी जाती भद्रा काल में राखी? जानिए सूर्यपुत्री की पौराणिक कथा और 2026 की शुभ तिथि",
  "summary": "सनातन परंपरा में रक्षा बंधन पर भद्रा काल के दौरान राखी बांधना वर्जित माना जाता है। पौराणिक कथाओं में भद्रा के उग्र स्वभाव और पंचांग के विष्टि करण से लेकर 28 अगस्त 2026 को भद्रा मुक्त मुहूर्त तक की पूरी जानकारी जानिए।",
  "content": "रक्षा बंधन का पावन पर्व भाई और बहन के बीच अटूट स्नेह, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है। इस विशेष अवसर पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और उनके दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख तथा समृद्धि की मंगल कामना करती हैं। सनातन धर्म की मान्यताओं में किसी भी प्रकार के मांगलिक अथवा शुभ कार्य का शुभारंभ करने से पहले शुभ मुहूर्त का विचार करना अनिवार्य माना गया है। यही कारण है कि रक्षा बंधन पर राखी बांधते समय भद्रा काल का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा के समय राखी बांधना अत्यंत अशुभ होता है और इस दौरान सभी प्रकार के मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। पौराणिक ग्रंथों में भद्रा के स्वरूप, उनकी उत्पत्ति और पंचांग में उनकी स्थिति को लेकर विस्तृत उल्लेख मिलता है।\n\nसूर्य देव और छाया की पुत्री भद्रा की पौराणिक कथा\nपौराणिक कथाओं के वर्णन के अनुसार भद्रा का जन्म भगवान सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के घर हुआ था। इस प्रकार भद्रा न्याय के देवता शनिदेव की सगी बहन हैं। ग्रंथों में भद्रा के शारीरिक स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वह काले वर्ण, लंबे केश, विशाल दांतों वाली तथा अत्यंत भयंकर और उग्र रूप धारण करने वाली कन्या हैं। उनका स्वभाव जन्म से ही बेहद क्रोधी और विनाशकारी माना गया है। भद्रा ने अपने जन्म लेते ही विभिन्न यज्ञों, अनुष्ठानों और धार्मिक आयोजनों में विघ्न डालना आरंभ कर दिया था। उनके इस विनाशकारी व्यवहार को देखकर पिता सूर्य देव उनके विवाह को लेकर अत्यधिक चिंतित रहने लगे। हालांकि उनके उग्र और भयंकर स्वभाव के कारण अनेक ऋषियों और देवताओं ने उनके विवाह प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। बेटी की चिंता में व्याकुल होकर सूर्य देव ने अंततः सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव से मार्गदर्शन प्राप्त करने का निर्णय लिया।\n\nब्रह्मदेव का आदेश और पंचांग में भद्रा का स्थान\nसूर्य देव की समस्या सुनने के पश्चात ब्रह्मदेव ने भद्रा के उग्र स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए एक विशेष व्यवस्था बनाई। ब्रह्मदेव ने भद्रा को पंचांग के विष्टि करण में स्थान प्रदान किया और उनके विचरण के लिए निश्चित समय और लोक निर्धारित किए। ब्रह्मदेव के विधान के अनुसार भद्रा को तीनों लोकों अर्थात पृथ्वी लोक, स्वर्ग लोक और पाताल लोक में समय समय पर भ्रमण करने की अनुमति दी गई। इसके साथ ही ब्रह्मदेव ने भद्रा को यह अधिकार भी दिया कि यदि कोई मनुष्य उनके निर्धारित समय काल के दौरान उनके प्रभाव का सम्मान किए बिना कोई शुभ या मांगलिक कार्य करेगा, तो भद्रा उसके कार्य में विघ्न उत्पन्न कर सकती हैं। इस प्रकार हिंदू पंचांग की काल गणना में भद्रा को विष्टि करण के रूप में शामिल किया गया।\n\nहिंदू पंचांग की गणना और विष्टि करण का गणित\nहिंदू पंचांग के पांच मुख्य अंग होते हैं जिन्हें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में एक तिथि के आधे भाग को करण की संज्ञा दी गई है, जिसके अनुसार प्रत्येक तिथि में दो करण होते हैं। पंचांग की संपूर्ण गणना में कुल 11 करण माने गए हैं, जिन्हें दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। पहली श्रेणी में 7 चर करण आते हैं, जिनके नाम बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि हैं। दूसरी श्रेणी में 4 स्थिर करण शामिल हैं, जिनके नाम शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न हैं। इन सभी 11 करणों में से विष्टि करण को ही भद्रा कहा जाता है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार भद्रा का विचरण समय निश्चित तिथियों के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में निर्धारित होता है।\n\nकिन तिथियों में होता है भद्रा का वास और रावण की कथा\nज्योतिषीय गणना के अनुसार शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में तथा चतुर्थी और एकादशी तिथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा का प्रभाव रहता है। वहीं कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी तिथि के उत्तरार्द्ध में तथा सप्तमी और चतुर्दशी तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा विद्यमान रहती हैं। जब भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर होता है, तब वह समय किसी भी शुभ कार्य के लिए अत्यंत विनाशकारी और अनुकूल नहीं माना जाता। इसी उग्रता के कारण भद्रा काल में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और रक्षा सूत्र बांधने जैसे शुभ कार्य पूरी तरह से वर्जित होते हैं। पौराणिक मान्यताओं में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि लंकापति रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल के दौरान ही रावण को रक्षा सूत्र बांधा था, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप रावण के पूरे कुल का विनाश हो गया था।\n\nरक्षा बंधन 2026 पर भद्रा का नहीं रहेगा कोई साया\nवर्ष 2026 में रक्षा बंधन का पवित्र त्योहार 28 अगस्त, शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। ज्योतिषचार्यों और पंचांगीय गणना के अनुसार इस वर्ष रक्षा बंधन के दिन भद्रा का साया बहनों और भाइयों के लिए कोई अड़चन नहीं पैदा करेगा। 28 अगस्त को भद्रा काल सूर्योदय होने से पहले ही समाप्त हो जाएगा। इसका अर्थ यह है कि रक्षा बंधन के पूरे दिन शुभ कार्य करने के लिए भद्रा की कोई बाधा नहीं रहेगी। उपलब्ध पंचांग की गणना के आधार पर 28 अगस्त 2026 की सुबह का पावन मुहूर्त पूरी तरह से भद्रा मुक्त रहेगा, जिससे बहनें बिना किसी संशय या भय के अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकेंगी।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: रक्षा बंधन पर भद्रा समय की धार्मिक जानकारी से श्रद्धालुओं को सही और शास्त्रसम्मत समय पर राखी बांधने की स्पष्टता मिलती है।\n\nत्योहार मनाने वालों के लिए: 28 अगस्त 2026 को सूर्योदय से पहले भद्रा समाप्त होने के कारण पूरे दिन बिना किसी विघ्न के रक्षा बंधन का पर्व आसानी से मनाया जा सकेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भद्रा कौन हैं और उनके पिता कौन हैं?\nपौराणिक कथाओं के अनुसार भद्रा सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की पुत्री हैं तथा शनिदेव की बहन हैं।\n\n2. भद्रा काल में राखी बांधना क्यों अशुभ माना जाता है?\nभद्रा का स्वभाव अत्यंत उग्र और विनाशकारी माना गया है। मान्यता है कि भद्रा काल में किए गए शुभ कार्य निष्फल या बाधाओं से भरे होते हैं।\n\n3. पंचांग में भद्रा को किस नाम से जाना जाता है?\nपंचांग के 11 करणों में से 7वें चर करण 'विष्टि करण' को ही भद्रा कहा जाता है।\n\n4. रावण से जुड़ी भद्रा काल की पौराणिक कथा क्या है?\nमान्यता है कि रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण और उसके वंश का विनाश हुआ।\n\n5. रक्षा बंधन 2026 पर भद्रा काल का क्या समय रहेगा?\n28 अगस्त 2026, शुक्रवार को भद्रा सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी, इसलिए उस दिन राखी बांधने में भद्रा की कोई बाधा नहीं रहेगी।",
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  "publishedAt": "2026-08-22",
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    "भद्रा काल",
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