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  "title": "साल 2026 में इस दिन मनाया जाएगा जलझूलनी एकादशी का पर्व, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा की विशेष परंपराएं",
  "summary": "भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की जलझूलनी एकादशी का त्योहार 22 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा, जिसका शुभ मुहूर्त 21 सितंबर की रात से शुरू होगा।",
  "content": "भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली जलझूलनी एकादशी हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखती है। साल 2026 में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना को समर्पित यह पावन पर्व 22 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चार महीने के शयनकाल के दौरान भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं, जिसके कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा गया है। यह तिथि भगवान विष्णु और उनके अवतार श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था प्रकट करने का एक बेहद शुभ अवसर है।\n\nराजस्थान के करौली सहित विभिन्न जिलों और क्षेत्रों में इस पर्व को लेकर अद्भुत उत्साह और अनूठी परंपराएं देखने को मिलती हैं। जलझूलनी एकादशी के इस पावन मौके पर श्रीकृष्ण मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण की बाल स्वरूप प्रतिमा को अत्यंत सुंदर ढंग से सजाया जाता है और फिर उन्हें एक भव्य डोले या पालकी में विराजमान किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के साथ भगवान की दिव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। कई प्राचीन परंपराओं के अनुसार, भगवान के इस डोले को स्थानीय जलाशयों या जल स्रोतों तक ले जाया जाता है, जहां मंत्रोच्चार के बीच भगवान का जलाभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।\n\nभगवान के डोले के नीचे से निकलने की पौराणिक मान्यता\nहिंडौन के रहने वाले ज्योतिषाचार्य पंडित धीरज उपाध्याय ने इस पर्व की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जलझूलनी एकादशी भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का एक महामार्ग है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन पर जब भगवान श्रीकृष्ण का डोला या पालकी नगर भ्रमण पर निकलती है, तो उसके नीचे से गुजरना बेहद कल्याणकारी और शुभ माना जाता है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस पालकी के नीचे से निकलते हैं और इसे सीधे भगवान का परम आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत सुगम माध्यम मानते हैं। ऐसा करने से जीवन के कष्टों का निवारण होता है और सुख की प्राप्ति होती है।\n\nपूजा विधि और दान-पुण्य का महत्व\nज्योतिषाचार्य पंडित धीरज उपाध्याय के अनुसार, जलझूलनी एकादशी के दिन भक्तों को सुबह सवेरे स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ मन से भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की आराधना का संकल्प लेना चाहिए। पूजा के समय भगवान को पीले रंग के सुंदर वस्त्र अर्पित करना, पीले पुष्पों की माला चढ़ाना और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित करना सर्वोत्तम माना जाता है। इसके पश्चात, भगवान के पवित्र मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप करते हुए अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए। इस दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराना, सामर्थ्य के अनुसार अन्न और वस्त्रों का दान करना बेहद फलदायी होता है। भगवान विष्णु के नाम का निरंतर स्मरण करने से जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।\n\nजन्माष्टमी के पश्चात श्रीकृष्ण भक्ति का अनूठा उत्सव\nश्रीकृष्ण के भक्तों के लिए जन्माष्टमी के त्योहार के बाद आने वाली यह एकादशी भक्ति और साधना का एक और महत्वपूर्ण अवसर लेकर आती है। देश भर के कृष्ण मंदिरों में इस दिन डोल यात्रा और जलाशयों पर होने वाली जल पूजा श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र होती है। पंचांग के अनुसार, साल 2026 में परिवर्तिनी यानी जलझूलनी एकादशी की तिथि 22 सितंबर को पड़ रही है। इस एकादशी तिथि की शुरुआत 21 सितंबर 2026 की रात को लगभग 8:00 बजे होगी, जबकि इसका समापन अगले दिन यानी 22 सितंबर 2026 की रात को लगभग 9:43 बजे होगा। श्रद्धालु इस समय अवधि के दौरान अपनी पूजा और व्रत का संकल्प पूर्ण कर सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nइस धार्मिक उत्सव की तिथि और मुहूर्त की स्पष्ट जानकारी होने से श्रद्धालु समय पर अपनी पूजा और व्रत का संकल्प पूरा कर सकते हैं।\n\n• संपूर्ण भारत में: जो श्रद्धालु जलझूलनी एकादशी का व्रत रखते हैं, वे 21 सितंबर की रात से शुरू होकर 22 सितंबर की रात तक रहने वाले शुभ मुहूर्त के अनुसार अपनी पूजा की योजना बना सकते हैं। पीले वस्त्र, तुलसी दल और पीले पुष्पों से पूजा करने तथा सामर्थ्य अनुसार दान करने से उन्हें इस पर्व का पूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिलेगा।\n• राजस्थान (करौली और हिंडौन) में: स्थानीय निवासी और श्रद्धालु करौली एवं हिंडौन सहित विभिन्न क्षेत्रों में निकलने वाली भव्य डोल यात्राओं में शामिल होकर दर्शन कर सकते हैं। इसके अलावा परंपरा के अनुसार पालकी के नीचे से निकलकर वे भगवान का विशेष आशीर्वाद भी प्राप्त कर सकेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nइस एकादशी को मनाने के पीछे मुख्य धार्मिक कारण भगवान विष्णु के शयन काल से जुड़ा हुआ है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू होने वाले चार महीनों के दौरान भगवान योग निद्रा में लीन रहते हैं।\n\n• मुद्रा में परिवर्तन: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस एकादशी तिथि को भगवान विष्णु शयन अवस्था में अपनी करवट बदलते हैं। इसी करवट बदलने की क्रिया के कारण इस तिथि को 'परिवर्तिनी एकादशी' भी कहा जाता है।\n• जल संरक्षण की परंपरा: इस पर्व पर भगवान के डोले को जलाशयों तक ले जाने और जल पूजा करने के पीछे जल स्रोतों के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। वर्षा ऋतु के अंत में जलाशयों के पूजन का विशेष महत्व माना गया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. साल 2026 में जलझूलनी एकादशी कब मनाई जाएगी?\nसाल 2026 में जलझूलनी एकादशी का पावन पर्व 22 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा।\n\n2. परिवर्तिनी एकादशी का नाम इस प्रकार क्यों पड़ा है?\nधार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन चतुर्मास के शयनकाल के दौरान भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।\n\n3. साल 2026 में एकादशी तिथि का शुभ मुहूर्त कब से कब तक है?\nएकादशी तिथि 21 सितंबर 2026 की रात को लगभग 8:00 बजे शुरू होगी और 22 सितंबर 2026 की रात को लगभग 9:43 बजे समाप्त होगी।\n\n4. जलझूलनी एकादशी के दिन पूजा की क्या विधि है?\nसुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण को पीले वस्त्र, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित कर उनकी पूजा और मंत्र जाप करना चाहिए।\n\n5. डोल यात्रा के दौरान पालकी के नीचे से निकलने की क्या मान्यता है?\nश्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान की पालकी या डोले के नीचे से गुजरने से भगवान का सीधा आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।",
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  "category": "त्योहार",
  "publishedAt": "2026-09-16",
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