# तेलंगाना के गांवों में दिवाली पर गाय के गोबर, चावल के आटे और गेरू से सजते हैं घर

> तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में दिवाली की सुबह प्लास्टिक स्टिकर्स और केमिकल रंगों के बजाय गाय के गोबर से बनी गोब्बेम्मा, चावल के आटे की रंगोली और गेरू के लेप से आंगन सजाए जाते हैं.

**Type:** article · **Category:** त्योहार · **Published:** 2026-11-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/festivals/telangana-ke-ganvon-men-divali-para-gaya-ke-gobara-chavala-ke-ate-aura-geru-se-sajate-hain-ghara-54365 · **Language:** Hindi
**Tags:** तेलंगाना, दिवाली, गोब्बेम्मा, पारंपरिक दिवाली, दक्कनी वास्तुकला, प्राकृतिक रंगोली, पर्यावरण अनुकूल त्योहार

त्योहारों के बदलते तौर-तरीकों के बीच तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक घरों में दिवाली का सवेरा आज भी ठेठ देसी अंदाज़ में बिखरता है. बाज़ारों में मिलने वाले कृत्रिम रंगों, प्लास्टिक के स्टिकर्स और रासायनिक उत्पादों की चमक-दमक से दूर यहां का वातावरण गीली मिट्टी और ताजे गोबर की सोंधी खुशबू से महकता है. गांव के लोग अपनी सदियों पुरानी विरासत को सहेजते हुए उत्सव की शुरुआत प्रकृति और ज़मीन से सीधे जुड़कर करते हैं, जो आधुनिक शहरी जीवन से बिल्कुल जुदा अनुभव देता है.

## सुबह की शुरुआत और चावल के आटे से बनी रंगोली
दिवाली की सुबह सूरज उगने से पहले ही घर की महिलाएं जाग जाती हैं. सबसे पहले आंगनों में पानी का छिड़काव किया जाता है और झाड़ू लगाकर पूरी जगह को स्वच्छ बनाया जाता है. इसके बाद साफ फर्श पर कलात्मक रंगोली सजाई जाती है. इस रंगोली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बाजारू केमिकल रंगों की जगह पूरी तरह प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल होता है. महिलाएं शुद्ध चावल के आटे और चूने के मेल से बारीक आकृतियां उकेरती हैं. यह केवल सजावट का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक संवेदनशील मान्यता भी जुड़ी है. चावल का आटा जमीन पर रेंगने वाली नन्ही चींटियों और दूसरे सूक्ष्म जीवों के लिए दिन के पहले भोजन के रूप में काम आता है, जिससे जीव-जंतुओं के प्रति दया का भाव झलकता है.

## गोब्बेम्मा का पूजन और उसका पारंपरिक शृंगार
रंगोली तैयार होने के बाद उसके बिल्कुल मध्य भाग में और मुख्य प्रवेश द्वार की चौखट पर गाय के ताजे गोबर से छोटे-छोटे शंक्वाकार पिरामिड बनाकर रखे जाते हैं. स्थानीय बोलचाल में इन आकृतियों को गोब्बेम्मा कहा जाता है. लोक मान्यताओं के अनुसार इन पिरामिडों को देवी लक्ष्मी और गोदा देवी का साक्षात जीवंत स्वरूप माना जाता है. गोब्बेम्मा को केवल सामान्य रूप से नहीं रखा जाता, बल्कि उनका बाकायदा शृंगार किया जाता है. घर की महिलाएं इन गोबर के पिरामिडों पर भक्ति भाव से हल्दी और कुमकुम के टीके लगाती हैं. इसके बाद इनके सबसे ऊपरी सिरे पर गेंदे, कन्नेरु या सीताफल के ताजे पीले फूलों के साथ दूर्वा घास को सजाया जाता है. यह सजावट पूरे परिवार के लिए सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है.

## लाल गेरू, पीली मिट्टी और दक्कनी वास्तुकला की छाप
दीपावली के अवसर पर घरों की चौखटों के साथ-साथ दीवारों के निचले हिस्से को खास तौर पर सजाया जाता है. इसके लिए पीली मिट्टी और लाल गेरू का गाढ़ा लेप तैयार किया जाता है. लाल और पीले रंगों का यह पारंपरिक संगम सदियों से दक्कनी लोक वास्तुकला की प्रमुख पहचान रहा है. यह प्राकृतिक लेप सादे से सादे घर को भी एक भव्य, पारंपरिक और उत्सवमय स्वरूप प्रदान कर देता है. इससे घर का कोना-कोना उत्सव के रंग में रंगा हुआ नजर आने लगता है.

## प्राकृतिक सैनिटाइजेशन और कीटों से सुरक्षा का विज्ञान
घरों को इस तरह संवारने की यह प्राचीन प्रथा केवल कोई अंधविश्वास या बाहरी दिखावा भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार मौजूद है. गाय का गोबर और शुद्ध हल्दी अपने आप में बेहद असरदार प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल एजेंट होते हैं. चूंकि दिवाली का यह पावन पर्व ठीक बारिश का मौसम समाप्त होने के तुरंत बाद आता है, इसलिए इस समय वातावरण में नमी की वजह से कीड़े-मकोड़े और अन्य कीट काफी अधिक संख्या में पनपते हैं. चौखटों और दीवारों पर गेरू, मिट्टी और गोबर का यह सुरक्षात्मक लेप घर को हानिकारक कीटाणुओं, संक्रमण और विषैले कीटों के प्रवेश से पूरी तरह सुरक्षित रखता है.

## कृषि संस्कृति, मवेशियों के प्रति कृतज्ञता और सादगी
तेलंगाना की सांस्कृतिक जड़ें कृषि प्रधान जीवनशैली से बेहद गहराई के साथ बंधी हुई हैं. गोब्बेम्मा की यह सुंदर परंपरा वास्तव में गोधन और घरेलू मवेशियों के प्रति समाज का आभार व्यक्त करने का एक जरिया है. खेती-किसानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशुओं का यह सम्मान संदेश देता है कि त्योहारों का सच्चा आनंद पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना उसके संसाधनों का आदर करने में छिपा है. बाज़ारी दिखावे के दौर में लाल गेरू और गोब्बेम्मा से सजे यह आंगन हमें याद दिलाते हैं कि असली सांस्कृतिक पहचान मिट्टी, सादगी और प्रकृति के संरक्षण में ही सुरक्षित रह सकती है.

## इसका आप पर असर
यह पारंपरिक जीवनशैली दर्शाती है कि बिना महंगे केमिकल और प्लास्टिक के भी त्योहारों को पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल बनाया जा सकता है.

- **तेलंगाना में:** ग्रामीण परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही यह प्रथा स्थानीय कृषि अवशेषों और प्राकृतिक सामग्रियों के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है. इसके कारण ग्रामीणों को कृत्रिम सजावट पर अतिरिक्त पैसे खर्च नहीं करने पड़ते और पारंपरिक पहचान सुरक्षित रहती है.
- **भारत में:** देश भर के लोग सिंथेटिक रंगों और प्लास्टिक कचरे से बचकर अपने घरों को पर्यावरण-अनुकूल और किफायती तरीके से सजाने की प्रेरणा ले सकते हैं. प्राकृतिक घटकों के इस्तेमाल से आंगनों में जहरीले रसायनों का फैलाव रुकता है और घरेलू बजट की बचत होती है.
- **स्वास्थ्य और स्वच्छता:** गोबर, हल्दी और चूने का लेप बारिश के बाद पनपने वाले हानिकारक कीटाणुओं और कीटों को घर में घुसने से रोकता है. इससे परिवार बिना महंगे कीटनाशक खरीदे संक्रामक बीमारियों और मौसमी संक्रमण से सुरक्षित रह सकते हैं.
- **पारिस्थितिक लाभ:** चावल के आटे की रंगोली चींटियों और सूक्ष्म जीवों के लिए भोजन का काम करती है. ऐसा करके लोग प्रकृति के सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंचाए बिना त्योहार के उल्लास को साझा कर सकते हैं.

## ऐसा क्यों हुआ
यह परंपरा दिवाली के समय प्राकृतिक परिस्थितियों, कृषि निर्भरता और धार्मिक मान्यताओं के तालमेल से विकसित हुई है. बारिश के बाद कीटों की अधिकता और मवेशियों के प्रति सम्मान ने इन प्रथाओं को ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा बना दिया.

- **बरसात के बाद कीटों का प्रकोप:** त्योहार का समय वर्षा ऋतु के ठीक बाद आता है जब वातावरण में कीड़े-मकोड़े और सूक्ष्म जीव बहुत अधिक बढ़ जाते हैं. घरों की चौखटों और दीवारों पर गोबर, गेरू और मिट्टी का लेप इन कीटों को भीतर आने से रोकने के लिए लगाया जाता है.
- **मवेशियों के प्रति कृतज्ञता:** तेलंगाना का समाज मुख्य रूप से खेती पर निर्भर रहा है जहां गाय-बैलों की भूमिका बेहद अहम होती है. गोब्बेम्मा के रूप में गाय के गोबर का पूजन करके किसान अपने पशुधन के प्रति आभार प्रकट करते हैं.
- **धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था:** लोक संस्कृति में गोबर के इन शंक्वाकार पिरामिडों को केवल मिट्टी-गोबर नहीं, बल्कि देवी लक्ष्मी और गोदा देवी का साक्षात रूप माना जाता है. हल्दी, कुमकुम और फूलों से इनका विधिवत शृंगार करके घर में सुख और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है.

## सवाल-जवाब

### 1. गोब्बेम्मा क्या हैं और इन्हें किन देवियों का रूप माना जाता है?
गोब्बेम्मा गाय के ताजे गोबर से बने छोटे शंक्वाकार पिरामिड होते हैं, जिन्हें लोक मान्यताओं में देवी लक्ष्मी और गोदा देवी का जीवंत रूप माना जाता है.

### 2. रंगोली में रासायनिक रंगों की जगह चावल के आटे का उपयोग क्यों किया जाता है?
चावल का आटा जमीन पर रेंगने वाली नन्हीं चींटियों और छोटे जीवों के लिए दिन का पहला आहार बन जाता है.

### 3. गोब्बेम्मा को सजाने के लिए किन चीजों का प्रयोग होता है?
इन पर हल्दी और कुमकुम के टीके लगाए जाते हैं तथा इनके ऊपर गेंदे, कन्नेरु या सीताफल के ताजे पीले फूल और दूर्वा घास सजाई जाती है.

### 4. घरों की चौखटों और दीवारों पर पीली मिट्टी और लाल गेरू लगाने का क्या महत्व है?
यह दक्कनी लोक वास्तुकला की सदियों पुरानी पहचान है, जो घर को उत्सवमय रूप देने के साथ-साथ प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल सुरक्षा भी प्रदान करती है.

### 5. बारिश के मौसम के बाद गोबर और गेरू का लेप किस तरह मददगार होता है?
गाय का गोबर और हल्दी बेहतरीन एंटीबैक्टीरियल एजेंट हैं, जो बारिश के बाद बढ़ने वाले कीड़े-मकोड़ों और संक्रमण से घर की रक्षा करते हैं.

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