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  "title": "50 साल से एक ही स्वाद: छपरा की इस दुकान का कलाकंद अब दुबई तक पहुंच रहा है",
  "summary": "बिहार के छपरा जिले में 50 साल पुरानी शंभू मिष्ठान भंडार का कलाकंद अपनी शुद्धता और स्वाद के लिए मशहूर है, जिसकी मांग अब दुबई तक पहुंच चुकी है.",
  "content": "बिहार के छपरा जिले में एक ऐसी मिठाई की दुकान है, जिसका कलाकंद खाने के लिए लोग सिर्फ आसपास के गांवों से नहीं, बल्कि दुबई तक से ऑर्डर भेजते हैं. यह दुकान गरखा प्रखंड के बसंत बाजार में है और करीब 50 साल से यहां का कलाकंद अपने खास स्वाद के लिए मशहूर है.\n\n50 साल से चला आ रहा एक ही परिवार का हुनर\nइस दुकान का नाम शंभू मिष्ठान भंडार है. इसकी शुरुआत शंभू प्रसाद ने की थी और आज इसे उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते मिलकर संभाल रहे हैं. यानी यह अब दूसरी पीढ़ी के हाथों में है, लेकिन मिठाई का स्वाद पहले जैसा ही बना हुआ है. दुकान की उम्र 50 साल से ज्यादा हो चुकी है, फिर भी न रेसिपी बदली, न सामग्री की क्वालिटी में कोई कमी आई.\n\nकोयले की आंच पर तैयार होता है असली खोवा\nबबलू प्रसाद बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों से शुद्ध दूध मंगाया जाता है और उसी दूध से कोयले की आग पर खोवा तैयार किया जाता है. लोगों के सामने ही खोवा निकाला जाता है, ताकि किसी तरह का शक न रहे. इस खोवे में इलायची, किशमिश और काजू मिलाकर कलाकंद को उसका खास स्वाद दिया जाता है. उनके मुताबिक गांव से आसानी से मिलने वाला शुद्ध दूध ही इस मिठाई की असली जान है, और यही वजह है कि शुद्धता में कभी कोई कमी नहीं आती.\n\nपुराने ग्राहक आज भी वहीं लौटकर आते हैं\nग्राहक जयप्रकाश सिंह बताते हैं कि वे बचपन में अपने पिता के साथ यहां कलाकंद खाने आते थे और आज भी उसी दुकान से मिठाई खरीदते हैं. उनके मुताबिक पहले शंभू प्रसाद खुद मिठाई बनाया करते थे, अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते ने संभाल ली है, लेकिन स्वाद में कोई फर्क नहीं आया. जयप्रकाश सिंह का कहना है कि दूर-दूर से लोग सिर्फ इस दुकान का कलाकंद खाने के लिए यहां पहुंचते हैं और आज भी मिठाई में वही शुद्धता बरकरार है.\n\nदुबई तक पहुंच रही है छपरा की मिठास\nबबलू प्रसाद के मुताबिक जिले के कोने-कोने से लोग यहां मिठाई खाने आते हैं, लेकिन इसकी लोकप्रियता सिर्फ छपरा तक सीमित नहीं है. दुबई में रहने वाले लोग भी यहां से कलाकंद खरीदकर ले जाते हैं. उन्होंने बताया कि एक दिन पहले ही यहां से 3 किलो कलाकंद खरीदकर लोग दुबई ले गए हैं.\n\nछोटी दुकान, लेकिन भरोसा बड़ा\nबबलू प्रसाद कहते हैं कि उनकी दुकान भले छोटी है, लेकिन सफाई और शुद्धता को लेकर कभी कोई समझौता नहीं किया जाता. उनका दावा है कि बड़ी-बड़ी दुकानों में भी ऐसी शुद्ध और स्वादिष्ट मिठाई मिलना मुश्किल है. यही वजह है कि पुराने ग्राहकों का भरोसा आज भी इस दुकान पर बना हुआ है और नई पीढ़ी के ग्राहक भी लगातार जुड़ रहे हैं.\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह कहानी दिखाती है कि गांव-कस्बों की पुरानी और शुद्ध सामग्री वाली मिठाई की दुकानें आज भी बड़े ब्रांड्स को टक्कर दे सकती हैं और परिवार का पुश्तैनी कारोबार पीढ़ियों तक टिकाऊ बन सकता है.\n• छपरा में: गरखा प्रखंड के बसंत बाजार स्थित शंभू मिष्ठान भंडार जाने वाले लोग अब भरोसे के साथ शुद्ध और स्वादिष्ट कलाकंद खरीद सकते हैं, जिसकी क्वालिटी सालों से एक जैसी बनी हुई है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह मशहूर कलाकंद की दुकान कहां है?\nयह दुकान बिहार के छपरा जिले के गरखा प्रखंड अंतर्गत बसंत बाजार में है.\n\n2. दुकान का नाम क्या है और यह कितनी पुरानी है?\nदुकान का नाम शंभू मिष्ठान भंडार है और यह करीब 50 साल पुरानी है.\n\n3. दुकान की शुरुआत किसने की थी और अब कौन चला रहा है?\nदुकान की शुरुआत शंभू प्रसाद ने की थी, और अब इसे उनके बेटे बबलू प्रसाद और पोते मिलकर चला रहे हैं.\n\n4. कलाकंद कैसे तैयार किया जाता है?\nग्रामीण इलाकों से शुद्ध दूध लाकर कोयले की आग पर खोवा निकाला जाता है, जिसमें इलायची, किशमिश और काजू मिलाए जाते हैं.\n\n5. यह मिठाई दुबई तक कैसे पहुंचती है?\nदुबई में रहने वाले लोग यहां से कलाकंद खरीदकर ले जाते हैं, हाल ही में एक ही दिन में 3 किलो कलाकंद दुबई ले जाया गया था.\n\n6. ग्राहक इस दुकान की मिठाई पर भरोसा क्यों करते हैं?\nग्राहकों का कहना है कि दशकों पहले जो स्वाद और शुद्धता मिलती थी, वही आज भी बरकरार है, इसलिए पुराने ग्राहक बार-बार यहीं लौटते हैं.\n\nप्रेरणा और सबक\n• एक ही चीज़ को बेहतरीन तरीके से करते रहना: शंभू प्रसाद और अब बबलू प्रसाद ने रेसिपी या क्वालिटी से समझौता किए बिना करीब 50 साल तक एक ही स्वाद बनाए रखा, जिससे ग्राहकों का भरोसा कभी नहीं टूटा.\n• शुद्धता और पारदर्शिता से भरोसा बनता है: ग्राहकों के सामने ही कोयले की आंच पर खोवा तैयार करना दिखाता है कि पारदर्शी तरीके से काम करने से ग्राहक बिना किसी शक के दोबारा लौटते हैं.\n• पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाना: पिता से बेटे और अब पोते तक दुकान का हुनर पहुंचना बताता है कि पुश्तैनी कारोबार को सही तरीके से आगे बढ़ाया जाए तो वह पीढ़ियों तक टिक सकता है.\n• स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल: गांव से आसानी से मिलने वाले शुद्ध दूध का इस्तेमाल करके एक छोटी सी दुकान ने अपनी पहचान दुबई जैसे शहर तक पहुंचा दी.",
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  "category": "खानपान",
  "publishedAt": "2026-07-04",
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    "बसंत बाजार गरखा",
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