बिना बोए अपने आप उगने वाला अनोखा पसई चावल, जानिए छठ पूजा से इसका खास नाता सुल्तानपुर और अवध क्षेत्र में बिना बुवाई और रोपाई के खुद उगने वाले भूरे रंग के पसई चावल का चलन है, जिसे छठ माता की पूजा में विशेष रूप से खाया जाता है। सुल्तानपुर के इलाके में कई तरह के अनाज और चावलों के बारे में सुना जाता है, लेकिन एक ऐसा अनोखा भूरा चावल भी यहां अपनी खास पहचान रखता है जिसकी खेती के लिए किसानों को न तो बीज बोने की जरूरत पड़ती है और न ही धान की तरह रोपाई करनी पड़ती है। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर और पूरे अवध क्षेत्र में इस अनोखे अनाज को पसई या पसाढ़ी चावल के नाम से पुकारा जाता है। स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, यह चावल बंजर या खाली पड़ी जमीनों पर कुदरती तौर पर अपने आप उग आता है। इस अनूठी विशेषता के अलावा, इस चावल का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने की छठी तिथि को आने वाले छठ पर्व के दौरान देखा जाता है, जहां इसे प्रसाद या व्रत के भोजन के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। छठ पूजा और पुत्र प्राप्ति की पुरानी मान्यता क्षेत्र की रहने वाली पुष्पा देवी बताती हैं कि छठ माता के विशेष पूजन अनुष्ठान के दौरान व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए इस पसाढ़ी चावल का सेवन करना अनिवार्य माना जाता है। इस खास दिन पर किसी अन्य प्रकार के सामान्य चावल को ग्रहण करने का कोई विधान या परंपरा नहीं है। लोक-मान्यताओं में यह भी गहराई से जुड़ा हुआ है कि जिन महिलाओं को पुत्र की प्राप्ति होती है, वे विशेष रूप से इस चावल को पकाकर खाती हैं। यह अनूठी परंपरा किसी एक व्यक्ति की शुरू की हुई नहीं है, बल्कि अवध क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती है। कुदरती उपज और खेती से जुड़ी भिन्नता पसई चावल की सबसे अनोखी बात इसकी प्रकृति में ही छिपी है जो इसे सामान्य धान की खेती से बिल्कुल अलग खड़ा करती है। स्थानीय लोगों के अनुभवों के अनुसार, इस अनाज के उत्पादन के लिए किसानों को खेतों की जुताई, बुवाई या पानी भरकर रोपाई करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह धान के खेतों के आसपास या खाली पड़ी जमीन पर खुद-ब-खुद पैदा होता है। हालांकि, इस कुदरती चावल के प्राकृतिक रूप से पैदा होने की प्रक्रिया और इसके कृषि संबंधी वैज्ञानिक तथ्यों को लेकर स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण में अंतर हो सकता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी मांग और महत्व पर कोई असर नहीं पड़ता है। पकाने का अनूठा तरीका और पारंपरिक खान-पान अवध क्षेत्र में भाद्रपद महीने की छठी तिथि को होने वाली छठ माता की पूजा का सीधा संबंध इस पसाढ़ी चावल से जोड़ा जाता है। पूजा-अर्चना करने वाली महिलाएं इसी पसई चावल से बने व्यंजनों को अपने व्रत के दौरान ग्रहण करती हैं। पुष्पा देवी के अनुसार, इस चावल को तैयार करने और खाने से जुड़े भी कुछ खास नियम और परंपराएं हैं। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, इस चावल को गाय के घी में छौंकने या पकाने के बजाय भैंस के घी के साथ तैयार करके खाया जाता है। इसके साथ ही भोजन में महुआ और करमवा का साग परोसने की भी पुरानी परंपरा चली आ रही है, जो इस पूरे व्यंजन को और अधिक पारंपरिक बना देती है। पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े पहलू सुल्तानपुर मेडिकल कॉलेज से जुड़े आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. संतोष कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि पसई चावल को लेकर स्थानीय स्तर पर इसके कई पोषण संबंधी गुण बताए जाते हैं। उनके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर के बढ़ते वजन को नियंत्रित करना चाहता है, तो उसके लिए फाइबर से भरपूर और संतुलित आहार हमेशा मददगार साबित हो सकता है। हालांकि, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल किसी एक विशेष प्रकार के चावल को वजन घटाने की अचूक गारंटी नहीं माना जा सकता है। बेहतर वजन प्रबंधन के लिए संपूर्ण डाइट, नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति का होना बहुत जरूरी है। खनिजों की मौजूदगी और लोक-संस्कृति डॉ. संतोष कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, इस पसई चावल में मैग्नीशियम जैसे जरूरी खनिज पोषक तत्व भी पाए जाते हैं, जो शरीर के भीतर हड्डियों और मांसपेशियों के सामान्य संचालन में अपनी भूमिका निभाते हैं। हालांकि, वे यह भी सलाह देते हैं कि केवल एक खाद्य पदार्थ के भरोसे मजबूत हड्डियों की उम्मीद नहीं की जा सकती है, बल्कि इसके लिए कैल्शियम, विटामिन D, प्रोटीन और संतुलित आहार के साथ नियमित शारीरिक कसरत भी उतनी ही आवश्यक है। पसाढ़ी चावल की असली खूबी सिर्फ इसका रंग, बनावट या स्वाद नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी लोक-संस्कृति है जो अवध क्षेत्र की मिट्टी और खान-पान की अनूठी धरोहर को आज भी जीवित रखे हुए है। इसका आप पर असर पसई चावल और पारंपरिक खान-पान से जुड़ा यह विषय स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक आहार अपनाने वाले लोगों के लिए सीधा महत्व रखता है। • भारत में: देश के अन्य हिस्सों के लोगों और कृषि शोधकर्ताओं को यह जानने को मिलता है कि कैसे कुछ खास गैर-पारंपरिक और स्वतः उगने वाले अनाज देश के अलग-अलग कोनों में पारंपरिक उत्सवों का अहम हिस्सा बने हुए हैं। • सुल्तानपुर में: सुल्तानपुर और आसपास के अवध क्षेत्र के स्थानीय निवासियों, विशेषकर छठ व्रत रखने वाली महिलाओं और पारंपरिक भोजन पसंद करने वाले परिवारों के लिए यह जानकारी उनकी पीढ़ियों पुरानी संस्कृति और खान-पान की आदतों को नए सिरे से उजागर करती है। सवाल-जवाब 1. पसई चावल क्या होता है? पसई या पसाढ़ी एक प्रकार का भूरा चावल है जो सुल्तानपुर और अवध क्षेत्र में बिना किसी बुवाई या रोपाई के खाली पड़ी जमीनों पर अपने आप उगता है। 2. छठ पूजा से इस चावल का क्या संबंध है? भाद्रपद महीने की छठी तिथि को होने वाली छठ माता की पूजा के दौरान व्रत रखने वाली महिलाएं इस चावल से बना भोजन ही ग्रहण करती हैं। 3. क्या इस चावल की खेती की जाती है? नहीं, इस चावल के लिए खेतों में अलग से बीज बोने या धान की तरह रोपाई करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह कुदरती तौर पर उगता है। 4. इस चावल को पकाने की क्या परंपरा है? स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसे गाय के घी के बजाय भैंस के घी में पकाया जाता है और इसके साथ महुआ तथा करमवा का साग खाया जाता है। 5. पसई चावल के पोषण को लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं? सुल्तानपुर मेडिकल कॉलेज के डॉ. संतोष कुमार श्रीवास्तव के अनुसार इसमें फाइबर और मैग्नीशियम जैसे खनिज पाए जाते हैं, जो संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं। https://trendkia.com/food/a-unique-self-grown-brown-rice-in-sultanpur-and-its-deep-connection-to-chhath-puja-24232 TrendKia — Har trend, sabse pehle.