बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में छा गई फलाहारी आलू जलेबी, जानिए सावन में क्यों है इसकी खास मांग और क्या है बनाने का तरीका सावन के पावन महीने में झारखंड के देवघर में कांवरियों और व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के बीच शुद्ध घी में तली आलू की खास फलाहारी जलेबी बेहद लोकप्रिय हो रही है। सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही झारखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल देवघर में चारों तरफ शिव भक्ति का अनुपम माहौल देखने को मिलता है। बाबा बैद्यनाथ धाम में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के लिए देश के कोने-कोने से लाखों कांवरिया और श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर से लेकर शहर की तमाम गलियों और बाजारों तक कांवरियों की भारी भीड़ लगी रहती है। इस धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण के बीच देवघर का खान-पान भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। सावन के इस पावन अवसर पर यहां की गलियों में एक खास मिठाई की गूंज सुनाई देती है, जो सामान्य दिनों में नहीं बल्कि विशेष रूप से सावन के मौसम में लोगों की पहली पसंद बनती है। यह खास मिठाई है आलू से बनने वाली फलाहारी जलेबी। आम तौर पर लोग मैदा या उड़द दाल से तैयार जलेबी का स्वाद लेते हैं, लेकिन देवघर में सावन के महीने में मिलने वाली आलू की जलेबी अपनी अनोखी बनावट और स्वाद के कारण श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो चुकी है। सावन के सोमवार और व्रत के दौरान बढ़ती है खास मांग देवघर के स्थानीय हलवाई और दुकानदार सावन के दौरान विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान और फलाहारी व्यंजन तैयार करते हैं। इन पकवानों का स्वाद चखने के लिए कांवरिए और स्थानीय निवासी दुकानों पर उमड़ पड़ते हैं। हालांकि, इन सभी पकवानों के बीच आलू की जलेबी का एक अलग ही मुकाम है। सावन के महीने में खास तौर पर सोमवार के दिन जब बड़ी संख्या में लोग व्रत रखते हैं, उस समय फलाहारी व्यंजनों की मांग चरम पर पहुंच जाती है। ऐसे में दुकानों पर कड़ाही से निकलती गर्मागर्म आलू की जलेबी लोगों को अपनी ओर खींच लेती है। देवघर आने वाले बाहरी श्रद्धालु भी बाबा बैद्यनाथ के दर्शन-पूजन के बाद इस अनोखी जलेबी का स्वाद चखना नहीं भूलते हैं। जानिए किस तरह तैयार की जाती है देवघर की प्रसिद्ध आलू जलेबी स्वादिष्ट और कुरकुरी आलू की जलेबी तैयार करने की प्रक्रिया भी बेहद दिलचस्प है। इसे बनाने की शुरुआत ताजा आलू उबालने से होती है। हलवाई आलू को लगभग 1 घंटे तक अच्छी तरह उबालते हैं ताकि वे भीतर तक पूरी तरह नरम और मुलायम हो जाएं। उबलने के बाद आलू को कुछ देर के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब आलू पूरी तरह ठंडे हो जाते हैं, तब उन्हें बहुत अच्छी तरह से मैश किया जाता है ताकि उसमें कोई गुठली न रहे। इसके बाद मैश किए गए आलू में अरारोट मिलाया जाता है। अरारोट का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि तलने के बाद जलेबी में सही खिंचाव और बढ़िया कुरकुरापन आ सके। इसके पश्चात आलू और अरारोट के इस मिश्रण में आवश्यकतानुसार दूध मिलाकर जलेबी का एक गाढ़ा और चिकना घोल तैयार किया जाता है। जब यह मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो इसे कपड़े या जलेबी बनाने वाले सांचे में डालकर कड़ाही में तैरते हुए गर्म शुद्ध घी में गोल-गोल जलेबी के आकार में ढाला जाता है। शुद्ध घी में धीमी और मध्यम आंच पर तलते ही यह जलेबी धीरे-धीरे सुनहरी और करारी होने लगती है। जब जलेबी दोनों तरफ से अच्छी तरह सिक जाती है और इसका रंग सुनहरा हो जाता है, तो इसे कड़ाही से निकालकर तुरंत चीनी की गाढ़ी चाशनी में डुबो दिया जाता है। चाशनी में कुछ समय तक डूबे रहने के बाद जब जलेबी मिठास को अच्छी तरह सोख लेती है, तब यह खाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। स्वाद की खासियत और स्थानीय दुकानदारों की कमाई का जरिया आलू की जलेबी का स्वाद आम मैदा या दाल वाली जलेबी से काफी अलग होता है। बाहर से बेहद करारी और कुरकुरी तथा अंदर से रसीली और नरम यह जलेबी सावन के आध्यात्मिक माहौल में लोगों का दिल जीत लेती है। बाबा धाम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए केवल दर्शन करना ही नहीं, बल्कि यहां के स्थानीय पकवानों का आनंद लेना भी उनकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। यही कारण है कि सावन के दौरान देवघर की हर छोटी-बड़ी गली में आलू की जलेबी एक प्रमुख आकर्षण बन जाती है। इसके साथ ही सावन के इस महीने में होने वाली भारी बिक्री से स्थानीय दुकानदारों और हलवाइयों को भी अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। इसका आप पर असर भारत में: सावन और व्रत के त्योहारों के दौरान श्रद्धालुओं को पारंपरिक मैदा रहित फलाहारी व्यंजनों का एक नया और स्वादिष्ट विकल्प मिलता है। देवघर (झारखंड) में: बाबा बैद्यनाथ धाम आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय हलवाइयों और छोटे व्यापारियों की सावन में बिक्री और आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है। सवाल-जवाब 1. देवघर की आलू जलेबी में मैदा या उड़द दाल का इस्तेमाल क्यों नहीं होता? सावन के दौरान अधिकांश श्रद्धालु और कांवरिए व्रत रखते हैं, इसलिए इसे बिना मैदा या उड़द दाल के केवल उबले आलू, अरारोट, दूध और शुद्ध घी से फलाहारी रूप में बनाया जाता है। 2. आलू की जलेबी को कुरकुरा बनाने के लिए क्या मिलाया जाता है? उबले और मैश किए गए आलू के मिश्रण में अरारोट (एरोरूट) मिलाया जाता है, जिससे तलने पर जलेबी करारी और कुरकुरी बनती है। 3. आलू को कितनी देर तक उबाला जाता है? आलू की जलेबी बनाने के लिए आलू को लगभग 1 घंटे तक उबाला जाता है ताकि वह पूरी तरह से नरम हो सके। 4. आलू की जलेबी किस घी या तेल में तली जाती है? इसे धार्मिक पवित्रता और स्वाद बनाए रखने के लिए शुद्ध देसी घी में ही तला जाता है। https://trendkia.com/food/baba-baidyanath-ki-nagari-deoghar-men-chha-gai-phalahari-alu-jalebi-janie-sawan-men-kyon-hai-isaki-khasa-manga-aura-kya-hai-banane-20174 TrendKia — Har trend, sabse pehle.