# बघेलखंड में कद्दू के कोमल पत्तों से बनती है लाजवाब देसी भाजी

> बघेलखंड के ग्रामीण अंचलों में कद्दू के ताजे पत्तों से बेहद स्वादिष्ट पारंपरिक भाजी तैयार की जाती है, जिसे गर्म रोटी या दाल-चावल के साथ खूब पसंद किया जाता है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-10-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/baghelkhand-men-kaddu-ke-komala-patton-se-banati-hai-lajavaba-desi-bhaji-43581 · **Language:** Hindi
**Tags:** बघेलखंड खानपान, कद्दू के पत्ते, देसी भाजी, सतना, पारंपरिक व्यंजन, आषाढ़ का भोजन

मध्य प्रदेश के बघेलखंड अंचल का पारंपरिक खानपान अपनी सादगी और मिट्टी से जुड़े अनूठे देसी स्वाद के लिए विशेष पहचान रखता है। ग्रामीण घरों की रसोई में ऐसी कई वनस्पतियों और पत्तों से पौष्टिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जिन्हें शहरों में अक्सर व्यर्थ समझकर छोड़ दिया जाता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में कद्दू की बेल के ताजे और कोमल पत्तों से तैयार होने वाली देसी भाजी शामिल है। ग्रामीण अंचलों में मानसून के आसपास जब खेतों और बाड़ियों में कद्दू की बेलें फैलती हैं, तब इन पत्तों को तोड़कर बनाई गई सूखी सब्जी दोपहर और रात के देसी भोजन का मुख्य आकर्षण बन जाती है।

## पत्तों के रेशे साफ करने और बारीक काटने की विधि
इस पारंपरिक भाजी को तैयार करने का तरीका बेहद सीधा और सहज है। सतना निवासी अंजलि चतुर्वेदी के अनुसार, सब्जी के लिए कद्दू की बेल से केवल मुलायम और ताजे पत्तों को ही चुना जाता है। घर लाने के बाद पत्तों के ऊपरी और पिछले हिस्से से रेशे अलग किए जाते हैं और उन्हें पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि किसी भी तरह की धूल या मिट्टी साफ हो सके। सफाई के उपरांत पत्तों को बिल्कुल बारीक काट लिया जाता है। बारीक कटे पत्ते न केवल कड़ाही में जल्दी गलते हैं, बल्कि उनका स्वाद भी निखरकर सामने आता है।

## सरसों के तेल और लहसुन-मिर्च का पारंपरिक तड़का
इस भाजी को तैयार करने के लिए कड़ाही में सरसों का तेल गर्म किया जाता है। इसके बाद कटे हुए लहसुन, तीखी हरी मिर्च और बारीक प्याज का तड़का लगाया जाता है। जब सरसों के तेल में लहसुन और मिर्च अच्छी तरह पकते हैं, तो रसोई में एक सोंधी देसी महक फैल जाती है। इसके तुरंत बाद बारीक कटी पत्तियों को कड़ाही में डाला जाता है और सामान्य घरेलू पिसे मसाले व स्वादानुसार नमक मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। आंच धीमी रखने से पत्तियां धीरे-धीरे नरम होकर मसालों का अर्क अपने भीतर पूरी तरह सोख लेती हैं।

## गर्म रोटी और दाल-चावल के साथ परोसने का रिवाज
बघेलखंड के देहाती इलाकों में यह भाजी किसी उत्सव या विशेष दावत की मोहताज नहीं है, बल्कि यह सामान्य दिनचर्या के घरेलू भोजन का हिस्सा है। चूल्हे से उतरी गरमा-गरम रोटियों के साथ इसका मेल सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त, दोपहर के समय दाल-भात के साथ भी सूखी भाजी के तौर पर इसका सेवन खूब किया जाता है। इस व्यंजन की खासियत यह है कि इसमें किसी महंगे मसाले या बाजार के अतिरिक्त सामान की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि घर और खेत की ताजी चीजों से ही यह तैयार हो जाती है।

## आषाढ़ और बारिश के दिनों में बेलों की ताजगी
कद्दू की इस भाजी का सीधा संबंध आषाढ़ के महीने और मानसूनी फुहारों से माना जाता है। इस समय खेतों की मेड़ों और घरों के पिछवाड़े लगी बेलों में नई, कोमल पत्तियां तेजी से फूटती हैं। ग्रामीण परिवार उसी दिन ताजी पत्तियां तोड़कर पकाते हैं, जिससे इसमें बाजार की बासी सब्जियों के मुकाबले खेत की शुद्ध ताजगी मिलती है। पकाने से पहले केवल पत्तों की संपूर्ण सफाई का ध्यान रखना सबसे अहम माना जाता है।

## इसका आप पर असर
यह पारंपरिक व्यंजन दर्शाता है कि कैसे खेत की आम वनस्पतियों का सदुपयोग कर बिना अतिरिक्त खर्च के पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन तैयार किया जा सकता है।

- **बघेलखंड अंचल में:** ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवार घर की बाड़ी में लगी कद्दू की बेलों से ताजी पत्तियां तोड़कर बाजार की महंगी सब्जियों पर निर्भरता कम कर सकते हैं। बरसात के आषाढ़ महीने में यह स्थानीय थाली का एक नियमित और बजट-अनुकूल विकल्प बन जाता है।
- **अन्य क्षेत्रों के पाठकों के लिए:** जो लोग गमलों या किचन गार्डन में कद्दू उगाते हैं, वे फलों के आने का इंतजार किए बिना पत्तों से भी स्वादिष्ट सूखी भाजी बना सकते हैं। इससे खाद्य अपव्यय रुकता है और दैनिक भोजन में प्राकृतिक फाइबर तथा ताजगी शामिल होती है।
- **रसोई में समय और लागत की बचत:** इस भाजी को पकाने के लिए केवल तेल, मिर्च, लहसुन और सामान्य नमक की आवश्यकता होती है। कामकाजी लोग कम समय में बिना महंगे मसालों के एक पौष्टिक पारंपरिक व्यंजन तैयार कर सकते हैं।
- **सफाई और तैयारी की सावधानी:** पत्तों के पीछे के रेशे निकालना और मिट्टी को अच्छी तरह धोना आवश्यक होता है। पकाने से पहले यदि उचित सफाई न की जाए तो किरकिरापन स्वाद बिगाड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
बघेलखंड में कद्दू के पत्तों की भाजी बनने की मुख्य वजह इस क्षेत्र की कृषि संस्कृति और मौसमी उपलब्धतता है। स्थानीय किसान और ग्रामीण परिवार मौसम के अनुसार प्रकृति से मिलने वाली हर खाद्य सामग्री का बेहतर उपयोग करने के अभ्यस्त रहे हैं।

- **प्राकृतिक उपलब्धता:** आषाढ़ और वर्षाकाल में कद्दू की बेलें स्वाभाविक रूप से बहुत तेजी से बढ़ती हैं। इन बेलों पर प्रचुर मात्रा में मुलायम पत्ते निकलते हैं, जिन्हें समय पर तोड़ना आसान और सुलभ होता है।
- **संसाधनों का पूर्ण उपयोग:** ग्रामीण जीवन में पौधों के किसी भी उपयोगी भाग को बेकार फेंकने की परंपरा नहीं है। कद्दू का फल आने से पहले ही उसके पत्तों को भोजन के रूप में उपयोग करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
- **सुलभ घरेलू सामग्री:** इस व्यंजन में केवल सरसों का तेल, लहसुन, मिर्च और प्याज जैसे बुनियादी घरेलू मसाले लगते हैं। यही कारण है कि बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक भार के यह हर आम परिवार की पहुंच में रहता है।

## सवाल-जवाब

### 1. कद्दू के पत्तों की सब्जी के लिए किस तरह के पत्ते चुने जाते हैं?
इस सब्जी के लिए केवल बेल से तोड़े गए कोमल, ताजे और मुलायम पत्तों का ही उपयोग किया जाता है।

### 2. पकाने से पहले पत्तों की सफाई कैसे की जाती है?
पत्तों से रेशे अलग किए जाते हैं और उन्हें पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि मिट्टी पूरी तरह साफ हो जाए।

### 3. इस भाजी में तड़के के लिए कौन सी सामग्री इस्तेमाल होती है?
कड़ाही में सरसों का तेल गर्म करके उसमें बारीक कटा लहसुन, हरी मिर्च और प्याज का तड़का लगाया जाता है।

### 4. कद्दू के पत्तों की सब्जी आमतौर पर किस मौसम में बनाई जाती है?
यह सब्जी खासतौर पर बारिश के दिनों और आषाढ़ के मौसम में कद्दू की बेलें बढ़ने पर बनाई जाती है।

### 5. इस पारंपरिक भाजी को किन चीजों के साथ परोसा जाता है?
इसे मुख्य रूप से गरम-गरम रोटियों के साथ या फिर दोपहर के भोजन में दाल-चावल के साथ खाया जाता है।

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