# कसावा की जड़ों से चमकते मोतियों तक, जानिए तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में साबूदाना तैयार होने का पूरा सच

> उपवास में व्यापक रूप से खाया जाने वाला साबूदाना किसी पौधे का फल नहीं बल्कि कसावा की जड़ों से तैयार एक प्रसंस्कृत स्टार्च है। जानिए तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में जहरीले छिलके वाली जड़ों से 1 एमएम से 7 एमएम के चमकदार दाने बनाने की पूरी तकनीक।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-08-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/cassava-ki-jaron-se-chamakate-motiyon-taka-janie-tamil-nadu-ki-phaiktriyon-men-sabudana-taiyara-hone-ka-pura-sacha-23154 · **Language:** Hindi
**Tags:** साबूदाना, कसावा, टैपिओका, तमिलनाडु, सेलम, खाद्य प्रसंस्करण, एफएसएसएआई, साबूदाना फैक्ट्री

उपवास और धार्मिक त्योहारों के दौरान भारतीय रसोईघरों में साबूदाना का उपयोग बहुत ही चाव से किया जाता है। अधिकांश लोग इसे किसी पेड़ का बीज या प्राकृतिक अनाज मानते हैं, लेकिन सच यह है कि साबूदाना खेतों में सीधे इस रूप में नहीं उगता। यह एक विशेष जड़ वाली फसल टैपिओका, जिसे कई देशों में कसावा भी कहा जाता है, से निकाला गया परिष्कृत स्टार्च है। इस साधारण सी दिखने वाली जड़ को खाने योग्य चमकदार मोतियों में बदलने के लिए एक लंबी और जटिल औद्योगिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। भारत में मांग का एक बड़ा हिस्सा तमिलनाडु के औद्योगिक केंद्रों में तैयार किया जाता है, जहाँ वैज्ञानिक और यांत्रिक तरीकों से इसे अंतिम रूप दिया जाता है।

## कृषि से प्रसंस्करण: टैपिओका की खेती और विषैले छिलके की चुनौती
साबूदाना बनाने की प्राथमिक शुरुआत टैपिओका यानी कसावा की खेती से होती है। यह शकरकंद की प्रजाति से मिलती-जुलती एक जड़ वाली जंगली फसल है। इसकी बुआई की तकनीक गन्ने की तरह होती है, जिसमें कसावा के तने के छोटे-छोटे टुकड़ों को मिट्टी के अंदर दबा दिया जाता है। जमीन के भीतर इसकी जड़ों को विकसित होने में 9 से 11 महीने या लगभग 10 से 11 महीने का समय लगता है। जब फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो किसानों द्वारा जड़ों को खोदकर बाहर निकाला जाता है।

भारत में साबूदाना उत्पादन का ढांचा बहुत केंद्रित है। देश का लगभग 99 प्रतिशत साबूदाना अकेले तमिलनाडु राज्य में तैयार किया जाता है। तमिलनाडु के सेलम जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों में कसावा की प्रोसेसिंग करने वाली सैकड़ों औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित हैं। कसावा की ताजी कटी जड़ों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनका बाहरी छिलका विषैला होता है। इसी कारण खेत से कटाई के बाद बिना किसी देरी के इन्हें तुरंत प्रोसेसिंग इकाइयों तक पहुँचाना अनिवार्य होता है, ताकि फसल खराब न हो और विषैले तत्व गूदे में न फैलें।

## फैक्ट्री में धुलाई, छिलाई और क्रशिंग की बहु-स्तरीय प्रक्रिया
फैक्ट्री में कसावा की जड़ों के पहुँचते ही प्राथमिक सफाई प्रक्रिया शुरू की जाती है। जड़ों को मैकेनिकल बेल्ट के माध्यम से स्क्रबर मशीन में भेजा जाता है। स्क्रबर में पानी के तेज दबाव और घर्षण की मदद से जड़ों पर लगी मिट्टी, धूल और बाहरी गंदगियों को पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। इसके बाद कन्वेयर बेल्ट इन जड़ों को स्वचालित कटिंग और पीलिंग मशीनों तक ले जाती है।

पीलिंग मशीन जड़ों के विषैले छिलके को सटीकता से उतार देती है। छिलका हटने के बाद जड़ों को मशीनों के जरिए छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और एक बार फिर से पानी से अच्छी तरह धोया जाता है। सफाई के इस कड़े चरण के बाद अगला कदम क्रशिंग यानी पेराई का होता है। भारी क्रशिंग मशीनों में कसावा के टुकड़ों को पीसकर एक घना गूदा तैयार किया जाता है। इस गूदे से निकलने वाले तरल पदार्थ, जिसे कसावा मिल्क कहा जाता है, को कई विशेष फिल्टरों से गुजारा जाता है ताकि उसमें मौजूद रेशे यानी फाइबर अलग हो सकें। अलग किए गए फाइबर को कन्वेयर बेल्ट की मदद से हटाकर अलग एकत्रित किया जाता है।

## कसावा मिल्क से स्टार्च केक और फर्मेंटेशन तकनीक
फाइबर हटने के बाद प्राप्त कसावा मिल्क में मुख्य रूप से पानी और शुद्ध स्टार्च का मिश्रण होता है। फाइबर अवशेषों में मौजूद पानी को हटाने के लिए विशेष ब्रश प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसके बाद स्टार्च को पानी से अलग करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू होती है। यह प्रक्रिया काफी हद तक दूध से दही जमाने या फर्मेंटेशन की तकनीक से मिलती-जुलती है।

कसावा मिल्क को बड़े-बड़े औद्योगिक टैंकों में रखा जाता है। फर्मेंटेशन प्रक्रिया के दौरान स्टार्च भारी होकर टैंक के तले में बैठने लगता है और पानी ऊपर तैरने लगता है। पानी को अलग निकालकर बह जाने दिया जाता है, जबकि तले में जमा स्टार्च एक ठोस केक की तरह बन जाता है। इस स्टार्च केक को निकालकर दोबारा फिल्टर किया जाता है। इसमें फिर से साफ पानी मिलाकर मिश्रण को पतला किया जाता है और सूक्ष्म फिल्टरों से पास कराया जाता है, जिससे यह एकदम मुलायम और बारीक पाउडर के रूप में बदल जाता है।

## 1 एमएम से 7 एमएम के मोतियों का निर्माण, रोस्टिंग और पॉलिशिंग
तैयार बारीक स्टार्च पाउडर को साबूदाना बनाने वाली विशेष स्वचालित मशीनों में डाला जाता है। इन मशीनों में स्टार्च पाउडर को एक तय तापमान पर रोस्ट यानी भुना जाता है। इसी दौरान यांत्रिक दबाव से 1 एमएम से लेकर 7 एमएम व्यास के गोल-गोल मोतियों जैसे दाने आकार लेते हैं। साबूदाने के दानों के बन जाने के बाद उन्हें दोबारा हल्की आँच पर भुना जाता है ताकि अंदर की नमी पूरी तरह खत्म हो जाए और दानों का गोल आकार स्थिर बना रहे।

इसके बाद साबूदाने के दानों को बड़े-बड़े शेड या खुली धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह नमी मुक्त होने के बाद दानों को पॉलिशिंग मशीन में भेजा जाता है। पॉलिशिंग की यह प्रक्रिया साबूदाने को वह ट्रेडमार्क सफेद चमक देती है जो बाजारों में ग्राहकों को आकर्षित करती है। यदि साबूदाने में अच्छी चमक न हो, तो उसे बाजार में उचित दाम नहीं मिलते। पॉलिशिंग के बाद मशीनों द्वारा स्वचालित तरीके से विभिन्न वजन के पैकेटों में पैकिंग की जाती है और इसे देश भर के बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है।

## पोषक तत्व, पारंपरिक बनाम आधुनिक तकनीक और एफएसएसएआई की चेतावनी
पोषण के नजरिए से देखा जाए तो साबूदाना कार्बोहाइड्रेट का एक समृद्ध स्रोत है। इसमें मौजूद स्टार्च की उच्च मात्रा हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती के लिए फायदेमंद मानी जाती है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो नियमित रूप से व्यायाम या शारीरिक श्रम करते हैं। इसके अलावा इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं।

पुराने समय में साबूदाना बनाने के लिए कसावा मिल्क को कई दिनों तक खुले गड्ढों में सड़ाया जाता था, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से असुरक्षित माना जाता था। हालांकि, आधुनिक युग में उन्नत मशीनों, बंद फिल्टर प्रणालियों और हाइजीनिक सुखाने वाले शेडों के आने से यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वच्छ और वैज्ञानिक हो चुकी है। फिर भी, विशेषज्ञों का सुझाव है कि खुले या बिना ब्रांड वाले साबूदाने की खरीद से बचना चाहिए। सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए हमेशा भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई पंजीकृत ब्रांडों का साबूदाना ही खरीदना चाहिए।

## इसका आप पर असर
यह जानकारी उपभोक्ताओं को व्रत के दौरान खाए जाने वाले साबूदाने की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के प्रति अधिक जागरूक बनाती है।

- **भारत भर में:** देश भर के उपभोक्ताओं को खुले और असुरक्षित साबूदाने की जगह प्रमाणित ब्रांड चुनने की सलाह दी जाती है। इससे मिलावट और अस्वास्थ्यकर तरीकों से बने उत्पादों से बचा जा सकता है।
- **तमिलनाडु में:** राज्य के सेलम और आसपास के जिलों में स्थित सैकड़ों इकाइयों में स्थानीय किसानों को रोजगार मिलता है। फसल की समय पर आपूर्ति से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा प्रोत्साहन मिलता है।
- **खाद्य सुरक्षा पर:** एफएसएसएआई पंजीकृत ब्रांडों की मांग बढ़ने से प्रसंस्करण इकाइयों में स्वच्छता के कड़े मानकों का पालन सुनिश्चित होता है। इससे उपभोक्ताओं तक केमिकल मुक्त साबूदाना पहुँचता है।
- **स्वास्थ्य और आहार पर:** व्यायाम करने वाले और एथलीट अपनी मांसपेशियों की मजबूती और ऊर्जा के लिए साबूदाने को सही मात्रा में आहार में शामिल कर सकते हैं। यह स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट का एक सुलभ स्रोत है।
- **बाजार मूल्य पर:** पॉलिशिंग और सही साइजिंग के कारण गुणवत्तापूर्ण साबूदाने को बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है। इससे उपभोक्ताओं को उनकी कीमत के बदले सही चमक और शुद्धता मिलती है।

## सवाल-जवाब

### 1. साबूदाना किस फसल की जड़ से बनाया जाता है?
साबूदाना टैपिओका की जड़ से बनाया जाता है, जिसे कई स्थानों पर कसावा भी कहा जाता है। यह शकरकंद जैसी दिखने वाली एक जड़ वाली फसल है।

### 2. भारत में सबसे ज्यादा साबूदाना किस राज्य में बनता है?
भारत का लगभग 99 प्रतिशत साबूदाना अकेले तमिलनाडु राज्य में तैयार किया जाता है। सेलम और उसके आसपास के जिलों में इसकी सैकड़ों प्रोसेसिंग इकाइयाँ स्थित हैं।

### 3. साबूदाने के दानों का साइज कितना होता है?
फैक्ट्रियों में मशीनों के जरिए साबूदाने के दानों को 1 एमएम से लेकर 7 एमएम व्यास के गोल मोतियों के रूप में तैयार किया जाता है।

### 4. साबूदाना खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
खुले या बिना ब्रांड वाले साबूदाने की जगह हमेशा एफएसएसएआई registered ब्रांड का साबूदाना ही खरीदना चाहिए ताकि स्वच्छता और शुद्धता सुनिश्चित हो सके।

### 5. कसावा की जड़ से साबूदाना बनाते समय छिलका तुरंत क्यों उतारा जाता है?
कसावा की जड़ का बाहरी छिलका विषैला होता है। इसलिए खेत से कटाई के बाद इसे तुरंत मशीन में डालकर छिलका उतारा जाता है ताकि विषैले तत्व गूदे में न मिलें।

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