# छतरपुर के लवकुश नगर में लकड़ी की आंच पर तैयार हो रहा खास मथुरा पेड़ा, 400 रुपये किलो बिक रही पारंपरिक मिठाई

> छतरपुर के लवकुश नगर स्थित बब्बी रेस्टोरेंट में पारंपरिक विधि और लकड़ी की धीमी आंच पर शुद्ध मथुरा पेड़ा तैयार किया जा रहा है, जिसकी कीमत 400 रुपये प्रति किलो रखी गई है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/chhatarpur-ke-lavkush-nagar-men-lakari-ki-ancha-para-taiyara-ho-raha-khasa-mathura-pera-400-rupaye-kilo-bika-rahi-parnparika-mitha-44707 · **Language:** Hindi
**Tags:** मथुरा पेड़ा, छतरपुर, लवकूश नगर, बब्बी रेस्टोरेंट, हलवाई जगपाल, भारतीय मिठाइयां, मावा पेड़ा

पारंपरिक मिष्ठान्न कला में धीमी आंच और धैर्य का बड़ा महत्व होता है, और इसी हुनर के दम पर छतरपुर के लवकुश नगर में खास मथुरा पेड़ा तैयार किया जा रहा है। यहां स्थित बब्बी रेस्टोरेंट में काम करने वाले हलवाई जगपाल इस पारंपरिक पेड़े को बनाने के लिए घंटों तक पसीना बहाते हैं। उनका कहना है कि इस स्वाद को हासिल करने के लिए सबसे पहले ताजे दूध को लोहे की एक बड़ी कढ़ाही में डाला जाता है। इसके बाद मिट्टी से बने चूल्हे पर लकड़ी की हल्की और धीमी आंच जलाकर दूध को काफी देर तक पकाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दूध को कढ़ाही में लगातार चलाना बेहद जरूरी होता है, जिससे वह तले में चिपके या जले नहीं और आहिस्ता-आहिस्ता गाढ़ा होता चला जाए। जब दूध पूरी तरह पककर मावा यानी खोवा का रूप ले लेता है, तब इस मिठाई का असल और अहम काम शुरू होता है।

## मावे की लाल भुनाई और सटीक मिठास का गणित
हलवाई जगपाल के अनुसार खोवा तैयार हो जाने के बाद पेड़े को उसका असली रंग और सौंधापन देने के लिए अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है। तैयार मावे को अलग से एक कढ़ाही में लेकर दोबारा भूना जाता है। इस भुनाई को तब तक जारी रखा जाता है जब तक कि मावा गहरा लाल न दिखने लगे। मावे के पूरी तरह लाल हो जाने के बाद ही उसमें चीनी मिलाई जाती है। मिठास के संतुलन का पैमाना बताते हुए जगपाल कहते हैं कि 1 किलो भुने हुए मावे में 200 से 250 ग्राम तक शक्कर मिलाई जा सकती है। उनका मानना है कि पेड़े में चीनी की मात्रा हमेशा सीमित रखनी चाहिए, जिससे पेड़ा खाते वक्त जरूरत से ज्यादा मीठा न लगे और खोवे का असली स्वाद बना रहे। यही संतुलित मिठास इस पारंपरिक मथुरा पेड़े का मुख्य फॉर्मूला मानी जाती है।

## घोटाई की तकनीक और इलायची की खुशबू
मावे में चीनी मिलाने के बाद उसमें खुशबू और स्वाद बढ़ाने के लिए छोटी इलायची का पाउडर मिलाया जाता है। इसके तुरंत बाद मिश्रण को अच्छी तरह एकसार करने के लिए स्टील के लोटे से लगातार घोटा जाता है। जब घोटाई के बाद यह मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब उससे गोल आकार के छोटे-छोटे पेड़े गढ़े जाते हैं। जगपाल बताते हैं कि इस पेड़े की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके मावे को लकड़ी की धीमी आंच पर घंटों तक भूना जाता है, जो इसे बाजार की अन्य मिठाइयों से अलग एक खास सौंधा स्वाद देता है। छोटी इलायची का पाउडर इस स्वाद को और ज्यादा निखार देता है, जिसके चलते लोग इसे बेहद पसंद करते हैं।

## शुद्धता की गारंटी और 400 रुपये प्रति किलो की कीमत
इस मिठाई की गुणवत्ता पर बात करते हुए हलवाई जगपाल स्पष्ट करते हैं कि यह मथुरा पेड़ा पूरी तरह शुद्ध और देसी तरीके से बनाया जाता है, जिसमें किसी भी किस्म की मिलावट नहीं की जाती। बब्बी रेस्टोरेंट में इस शुद्ध देसी पेड़े की बिक्री 400 रुपये प्रति किलो के भाव पर की जाती है। आम ग्राहकों के अलावा विशेष मौकों के लिए यह पेड़ा ऑर्डर पर भी तैयार किया जाता है। मिठाई के शौकीनों का मानना है कि एक बार इसका स्वाद चखने के बाद इसे भूलना आसान नहीं होता, यही वजह है कि लोग इसकी कीमत चुकाकर भी इसे खुशी-खुशी खरीदते हैं।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक और शुद्ध मिठाइयों की तलाश करने वाले लोगों के लिए यह खबर सीधे तौर पर प्रासंगिक है।

- **भारत में:** शुद्ध खोवे और पारंपरिक तकनीक से बनी मिठाइयों की मांग देश भर में बढ़ रही है। ऐसे में मिलावट रहित और धीमी आंच पर भुने पेड़े का विकल्प प्रामाणिक स्वाद चाहने वालों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।
- **छतरपुर में:** स्थानीय निवासी और छतरपुर आने वाले यात्री लवकुश नगर के बब्बी रेस्टोरेंट से 400 रुपये प्रति किलो की दर से ताजा मथुरा पेड़ा खरीद सकते हैं। इसके अलावा त्योहारों या पारिवारिक आयोजनों के लिए ग्राहक पहले से ऑर्डर देकर शुद्ध पेड़ा तैयार करवा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पारंपरिक मिठाई आधुनिक मशीनों के बजाय सदियों पुराने देसी तरीकों पर निर्भर करती है, जिसके कारण इसे बनाने में खास समय और श्रम लगता है। मिट्टी के चूल्हे और धीमी आंच का इस्तेमाल ही इस पेड़े के विशिष्ट स्वाद और रंग की मुख्य वजह है।

- **धीमी आंच पर पकाना:** दूध को सीधे तेज गैस चूल्हे के बजाय मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी की हल्की आग पर घंटों तक पकाया जाता है। इस धीमी प्रक्रिया से दूध जलता नहीं है और धीरे-धीरे गाढ़ा होकर शुद्ध खोवे में बदल जाता है।
- **मावे की दोहरी भुनाई:** साधारण पेड़े के मुकाबले मथुरा पेड़े के मावे को कढ़ाही में तब तक दोबारा भूना जाता है जब तक वह लाल न हो जाए। यही लाल भुनाई पेड़े को उसका गहरा रंग और खास सौंधापन प्रदान करती है।
- **सीमित मिठास और घोटाई:** प्रति किलो मावे में केवल 200 से 250 ग्राम शक्कर मिलाई जाती है ताकि प्राकृतिक स्वाद न दबे। इसके बाद स्टील के लोटे से लगातार घोटने पर मिश्रण में सही कसावट और मुलायम बनावट आती है।

## सवाल-जवाब

### 1. छतरपुर में यह खास मथुरा पेड़ा कहां तैयार किया जा रहा है?
यह पेड़ा छतरपुर के लवकुश नगर स्थित बब्बी रेस्टोरेंट में हलवाई जगपाल द्वारा तैयार किया जा रहा है।

### 2. बब्बी रेस्टोरेंट में इस मथुरा पेड़े की कीमत क्या है?
रेस्टोरेंट में यह शुद्ध पेड़ा 400 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचा जाता है।

### 3. पेड़ा बनाते समय 1 किलो मावे में कितनी चीनी मिलाई जाती है?
1 किलो भुने हुए मावे में 200 से 250 ग्राम चीनी मिलाई जाती है ताकि पेड़ा ज्यादा मीठा न लगे।

### 4. मिश्रण को एकसार करने के लिए किस बर्तन का उपयोग किया जाता है?
मावे में शक्कर और इलायची मिलाने के बाद मिश्रण को स्टील के लोटे से घोटा जाता है।

### 5. क्या इस पेड़े को अग्रिम ऑर्डर पर भी बनवाया जा सकता है?
हां, हलवाई जगपाल के अनुसार यह पेड़ा ग्राहकों की मांग पर ऑर्डर देकर भी बनवाया जा सकता है।

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