छतरपुर में मानसून के दौरान उगाएं ये 5 पारंपरिक भाजियां, सेहत को मिलेंगे ढेरों फायदे बारिश के मौसम में छतरपुर और आसपास के इलाकों में चौरई, चेच, कचोड़ा, नौरपा और कनकौआ जैसी भाजियों की मांग काफी बढ़ जाती है। ये हरी सब्जियां न सिर्फ आसानी से उग जाती हैं, बल्कि शरीर को वायरल संक्रमण से बचाने और खून की कमी दूर करने में बेहद असरदार होती हैं। मानसून की बारिश शुरू होते ही भारतीय रसोई में खानपान के तरीके बदलने लगते हैं। खास तौर पर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले और बुंदेलखंड क्षेत्र में लोग बारिश के दिनों में बाजार की आम सब्जियों के बजाय पारंपरिक भाजियों को अधिक प्राथमिकता देते हैं। बरसात के दिनों में मिलने वाली ये हरी भाजियां न केवल स्वाद में बेहतरीन होती हैं, बल्कि इनमें औषधीय गुण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें से कई भाजियां घर के बगीचे, गमले या छत पर आसानी से उगाई जा सकती हैं, जबकि कई भाजियां बारिश के पानी के साथ अपने आप ही खेतों और खाली मैदानों में उग आती हैं। चौरई भाजी: सर्दी और जुकाम से बचाव का प्राकृतिक उपाय बारिश के मौसम में सबसे लोकप्रिय भाजियों में चौरई का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बरसात की फुहारें पड़ते ही यह भाजी खेतों और बगीचों में प्राकृतिक रूप से उगने लगती है। इसे घर में उगाना बेहद सरल है, और लोग इसे ठंड के मौसम में भी चाव से खाते हैं। पारंपरिक तरीके से चौरई भाजी को आलू के साथ सूखी सब्जी के रूप में पकाया जाता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से चौरई भाजी की तासीर गर्म मानी जाती है। इसी गर्म तासीर के कारण यह बारिश के दौरान होने वाले वायरल बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम से शरीर की रक्षा करती है। मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए लोग इसे अपनी नियमित खुराक में शामिल करते हैं। चेच भाजी: अरहर दाल के साथ छतरपुर का खास स्वाद छतरपुर जिले में एक और विशेष भाजी बहुत चाव से खाई जाती है, जिसे स्थानीय लोग चेच भाजी के नाम से पहचानते हैं। यह भाजी मानसून के आगमन से लेकर पूरी सर्दी के मौसम तक उपलब्ध रहती है और भोजन का स्वाद बढ़ाती है। छतरपुर क्षेत्र में इस भाजी को अरहर की दाल के साथ मिलाकर पकाने की परंपरा है। यदि आप इसे अपने घर में उगाना चाहते हैं, तो यह बहुत कम देखभाल में गमले या छोटी सी जगह में आसानी से पनप जाती है। मानसून के समय में जमीन में नमी होने के कारण यह बिना किसी विशेष प्रयास के अपने आप भी उग जाती है। कचोड़ा और नौरपा भाजी: गर्म तासीर और आयरन का खजाना बरसात के दिनों में छतरपुर जिले के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कचोड़ा भाजी की मांग भी तेजी से बढ़ती है। यह भाजी भी प्राकृतिक रूप से मानसून के पानी से खुद-ब-खुद उग आती है। चौरई की तरह कचोड़ा भाजी की तासीर भी गर्म होती है, इसलिए इसे बारिश के मौसम में स्वास्थ्य के लिए बेहद गुणकारी माना जाता है। इसके अलावा, नौरपा भाजी भी इस क्षेत्र में खूब खाई जाती है। नौरपा की खेती बारिश में घर पर बहुत आसानी से की जा सकती है। नौरपा भाजी विशेष रूप से हरे और लाल दो रंगों में पाई जाती है। हरे रंग की नौरपा भाजी साल के 12 महीने उपलब्ध रहती है, जबकि लाल रंग की नौरपा भाजी केवल बरसात के दिनों में ही दिखाई देती है। छतरपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदू पंचांग के कार्तिक महीने के दौरान नौरपा भाजी का सेवन बड़े पैमाने पर होता है। यह भाजी आयरन से भरपूर होती है, जिसके सेवन से शरीर में खून की कमी या एनीमिया जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद मिलती है। कनकौआ भाजी और छतरपुर में भाजी खाने की समृद्ध परंपरा मानसून के दौरान छतरपुर जिले में कनकौआ नाम की भाजी भी बहुत पसंद की जाती है। छतरपुर के निवासियों की खानपान की आदतों में भाजी का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यहां के लोग सामान्य हरी सब्जियों की तुलना में भात और दाल के साथ विभिन्न प्रकार की भाजियां खाना ज्यादा पसंद करते हैं। यही कारण है कि इस जिले में वर्ष भर विविध प्रकार की भाजियों की खपत बनी रहती है। यद्यपि कुछ विशेष भाजियां केवल मौसम के अनुसार ही उगती हैं, लेकिन वे पूरे साल शरीर को आवश्यक पोषण और मजबूती प्रदान करने में सहायक साबित होती हैं। इसका आप पर असर मानसून में स्थानीय और पारंपरिक भाजियों का सेवन कम खर्च में परिवार के पोषण और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का एक प्रभावी तरीका है। • भारत भर में (पोषण और बचत): बारिश के मौसम में बाजार में आम हरी सब्जियों के दाम अक्सर बढ़ जाते हैं। ऐसे में घर पर चौरई और नौरपा जैसी भाजियां उगाने से हर महीने सब्जियों के खर्च में बचत होती है और ताजा रसायन-मुक्त पोषण मिलता है। • भारत भर में (इम्युनिटी और स्वास्थ्य): मौसमी बदलाव के दौरान वायरल बुखार, सर्दी और जुकाम का खतरा बढ़ जाता है। इन भाजियों में मौजूद गर्म तासीर और एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्राकृतिक रूप से मजबूत करते हैं। • छतरपुर और मध्य प्रदेश में (पारंपरिक खानपान): बुंदेलखंड क्षेत्र के लोग स्थानीय भाजियों को अरहर दाल और आलू के साथ मिलाकर पारंपरिक व्यंजनों का आनंद ले सकते हैं। इससे स्थानीय खाद्य संस्कृति को बढ़ावा मिलता है और भोजन में विविधता बनी रहती है। • छतरपुर और मध्य प्रदेश में (खून की कमी से राहत): ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों में आयरन की कमी एक आम समस्या है। लाल और हरी नौरपा भाजी का नियमित सेवन एनीमिया जैसी बीमारी से बचाव में बेहद मददगार साबित होता है। सवाल-जवाब 1. छतरपुर जिले में बारिश के मौसम में कौन-कौन सी भाजियां पाई जाती हैं? छतरपुर में मानसून के दौरान मुख्य रूप से चौरई, चेच, कचोड़ा, नौरपा और कनकौआ भाजी खाई और उगाई जाती हैं। 2. चौरई भाजी खाने से स्वास्थ्य को क्या लाभ मिलते हैं? चौरई भाजी की तासीर गर्म होती है, जो बारिश के मौसम में सर्दी, जुकाम और वायरल बुखार से शरीर का बचाव करने में मदद करती है। इसे आमतौर पर आलू के साथ पकाया जाता है। 3. नौरपा भाजी कितने प्रकार की होती है और इसकी क्या खासियत है? नौरपा भाजी दो प्रकार (हरी और लाल) की होती है। हरी नौरपा साल भर मिलती है जबकि लाल नौरपा केवल बारिश में उगती है; यह आयरन से भरपूर होती है और खून की कमी दूर करती है। 4. चेच भाजी को किस तरह पकाया जाता है? छतरपुर और आसपास के इलाकों में चेच भाजी को अरहर की दाल के साथ मिलाकर पकाने की परंपरा है। 5. क्या इन भाजियों को घर की छत या गमले में उगाया जा सकता है? हाँ, चौरई, चेच और नौरपा जैसी भाजियों को मानसून के मौसम में घर के गमलों या छत पर बहुत आसानी से उगाया जा सकता है। https://trendkia.com/food/chhatarpur-men-manasuna-ke-daurana-ugaen-ye-5-parnparika-bhajiyan-sehata-ko-milenge-dheron-phayade-26640 TrendKia — Har trend, sabse pehle.