# धीमी आंच पर कढ़ती मलाई का बेजोड़ जादू, सात समंदर पार भी महक रही रामपुर की पारंपरिक खुरचन

> मध्य प्रदेश के रामपुरबघेलन में आजादी से पहले शुरू हुआ खुरचन का पारंपरिक कारोबार आज सैकड़ों परिवारों की आजीविका चला रहा है, जिसका स्वाद अब विदेशों तक पहुंच चुका है।

**Type:** article · **Category:** खानपान · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/food/dhimi-ancha-para-karhati-malai-ka-bejora-jadu-sata-samndara-para-bhi-mahaka-rahi-rampur-ki-parnparika-khurchan-40689 · **Language:** Hindi
**Tags:** रामपुरबघेलन, खुरचन, मध्य प्रदेश, पारंपरिक मिठाई, भारतीय व्यंजन, डेयरी उद्योग, कमलेश पांडे

दूध की धीमी आंच पर तैयार होने वाली पारंपरिक भारतीय मिठाइयों में मलाई की परतों से सजने वाली खुरचन का रुतबा हमेशा से खास रहा है। मध्य प्रदेश में रामपुरबघेलन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम नेमुआ वार्ड नंबर 5 के निवासी कमलेश पांडे पिछले 40 से भी अधिक वर्षों से इस मिठास को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। वह अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, जो पूरी शिद्दत के साथ इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने यह पारंपरिक कला सीधे अपने माता-पिता के सान्निध्य में सीखी थी। अपनी शुरुआत के दिनों में उन्होंने एक पक्का ढाबा संचालित करके इस मिठाई की बिक्री शुरू की थी, लेकिन आगे चलकर सड़क किनारे अन्य साथी हलवाइयों की भांति टीन शेड की छोटी सी दुकान सजा ली। आज वे अपने ही गांव में सड़क किनारे स्थापित इस टीन शेड के प्रतिष्ठान से प्रतिदिन कम से कम 5 से 10 किलोग्राम खुरचन बहुत सहजता से बेच लेते हैं, जबकि विशेष ऑर्डर पर की जाने वाली आपूर्ति इससे पूरी तरह अलग रहती है।

## आजादी से पहले का इतिहास और हाईवे पर सजा तीन किलोमीटर लंबा बाजार
इस अनूठे मिष्ठान्न का बाजार कोई नया नहीं, बल्कि 100 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है, जिसकी जड़ें देश को स्वाधीनता मिलने से पहले के दौर से जुड़ी हुई हैं। वर्तमान समय में नेशनल हाईवे के लगभग तीन किलोमीटर लंबे हिस्से में करीब 150 दुकानें पूरी भव्यता के साथ इस खुरचन बाजार को आबाद किए हुए हैं। यहां तैयार होने वाले स्वाद की ख्याति केवल स्थानीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कमलेश पांडे के हाथों से बनी खुरचन की मांग संयुक्त राज्य अमेरिका तक पहुंचती है। यदि पूरे रामपुर क्षेत्र की बात करें, तो यहां निर्मित यह खास मिठाई भारत के कई अलग-अलग प्रांतों में भेजी जाती है और वैश्विक स्तर पर भी दुनिया के अनेक मुल्कों में मिठास घोल रही है।

## कड़ाही में मलाई उतारने की पारंपरिक और सटीक विधि
इस लोकप्रिय मिष्ठान्न को तैयार करने की शैली जितनी सीधी और पारंपरिक है, उतनी ही इसमें धैर्य और हुनर की दरकार होती है। कारीगर सबसे पहले एक कतार में 6 बड़ी कड़ाहियों को भट्टी की मंद आंच पर चढ़ाते हैं। इसके बाद प्रत्येक कड़ाही के भीतर ठीक एक-एक पाव दूध डाला जाता है। दूध जैसे-जैसे आंच पकड़कर उबलने की स्थिति में आता है, उसकी ऊपरी सतह और कड़ाही की दीवारों पर गाढ़ी मलाई की सुनहरी परत जमना शुरू हो जाती है। हलवाई इस मलाईदार परत को कड़ाही के भीतरी किनारों पर चिपकाते चले जाते हैं। पर्याप्त मलाई जमा हो जाने पर खुरचनी नामक औजार से उसे खुरचकर सावधानी से अलग कर लिया जाता है और उसमें हल्की मिठास देने के लिए शक्कर मिलाई जाती है। यह पूरी प्रक्रिया लगातार बार-बार दोहराई जाती है, जिसमें खुरची हुई मलाई को एक के ऊपर एक तह बनाकर जमाया जाता है और साथ ही बीच में शक्कर का छिड़काव किया जाता है।

## दो स्वरूपों में बिक्री और स्वाद के आधार पर तय भाव
बाजार में ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए यह खुरचन प्रमुख रूप से दो अलग-अलग रूपों में उपलब्ध कराई जाती है। पहला प्रकार रोल वाली खुरचन का है, जो 600 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। इसमें दूध की मलाई की सभी परतों को एक साथ सहेजकर गोल रोल के आकार में बांध दिया जाता है। वहीं दूसरा स्वरूप 400 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर मिलता है, जिसके निर्माण में मलाई की परतों को एक के ऊपर एक चौरस बिछाया जाता है और फिर चाकू की मदद से मिठाई के छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों में काट लिया जाता है।

## सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी और फलता-फूलता स्थानीय डेयरी तंत्र
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार की दृष्टि से यह पारंपरिक व्यापार आजीविका का एक मजबूत सहारा बन चुका है। नेशनल हाईवे पर स्थित प्रत्येक छोटी और मध्यम दुकान हर रोज कम से कम 5 किलोग्राम खुरचन आसानी से बेच लेती है, जिसके दम पर एक सामान्य दुकानदार भी महीने में करीब 60 हजार रुपये तक की आमदनी कमा लेता है। दूसरी तरफ, बाजार के कई बड़े कारोबारियों का वार्षिक लेन-देन करोड़ों रुपये के आंकड़े को भी पार कर चुका है। रामपुरबघेलन और इसके आसपास के ग्रामीण अंचलों के 150 से अधिक परिवार प्रत्यक्ष रूप से इस मिठाई के कारोबार में सक्रिय हैं। इसके साथ ही, पूरे अंचल के हजारों लोगों के लिए यह व्यापार आर्थिक उन्नति का साधन बना हुआ है, क्योंकि प्रतिदिन भारी मात्रा में दूध की खपत होने के कारण क्षेत्र का स्थानीय डेयरी कारोबार भी निरंतर नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

## इसका आप पर असर
यह खबर दर्शाती है कि पारंपरिक खानपान और हाइवे आधारित फूड क्लस्टर ग्रामीण कारीगरों और पशुपालकों के लिए कितनी बड़ी आर्थिक सुरक्षा बन सकते हैं।

- **भारत में:** राष्ट्रीय राजमार्गों पर विकसित होने वाले पारंपरिक फूड क्लस्टर्स स्थानीय कारीगरों को बिना बिचौलियों के सीधा बड़ा उपभोक्ता बाजार उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ता है और क्षेत्रीय खाद्य परंपराएं संरक्षित रहती हैं।
- **मध्य प्रदेश में:** रामपुरबघेलन और रीवा क्षेत्र के किसानों व दूध उत्पादकों को रोजमर्रा का पक्का खरीदार मिलता है। स्थानीय पशुपालकों को अपने कच्चे दूध का स्थिर और बेहतर मूल्य हासिल होता है, जिससे ग्रामीण बेरोजगारी घटाने में मदद मिलती है।
- **मिठाई प्रेमियों और यात्रियों के लिए:** नेशनल हाईवे से गुजरने वाले मुसाफिरों को बिना किसी मिलावट के ताजी और पारंपरिक मलाईदार मिठाई सुलभ होती है। 400 से 600 रुपये प्रति किलो के पारदर्शी भाव पर शुद्ध देसी मिष्ठान्न का विकल्प मिलता है।
- **छोटे कारोबारियों के लिए:** टीन शेड की छोटी सी दुकान लगाकर भी कारीगर प्रति माह 60 हजार रुपये तक की स्थिर आय अर्जित कर सकते हैं। कम लागत वाले बुनियादी ढांचे के जरिए स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भर स्वरोजगार खड़ा किया जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
रामपुरबघेलन में खुरचन का यह व्यापक बाजार एक सदी से भी अधिक समय में विकसित हुई पारंपरिक पाक शैली और अनुकूल राष्ट्रीय राजमार्ग की भौगोलिक स्थिति के कारण पनपा है।

- **कच्चे दूध की उपलब्धता और पारंपरिक कौशल:** इस क्षेत्र में पीढ़ियों से घरों में दूध को धीमी आंच पर कड़ाही में औटाकर मलाई की परतें उतारने का हस्तशिल्प मौजूद रहा है। स्थानीय परिवारों ने इस हुनर को अगली पीढ़ियों तक पूरी मौलिकता के साथ पहुंचाया।
- **हाईवे पर बढ़ता यातायात:** नेशनल हाईवे पर मुसाफिरों और वाहनों की लगातार आवाजाही ने सड़क किनारे स्थित दुकानों को एक विशाल और निरंतर ग्राहक वर्ग प्रदान किया। आने-जाने वाले यात्रियों ने इस स्वाद को दूर-दराज के शहरों और विदेशों तक फैलाया।
- **मजबूत ग्रामीण डेयरी नेटवर्क:** आसपास के गांवों में दूध उत्पादन की प्रचुरता ने मिठाई निर्माताओं को प्रतिदिन ताजा और शुद्ध दूध की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की। इसी मजबूत कच्चे माल के आधार पर 150 से अधिक दुकानों का संकुल खड़ा हो सका।

## सवाल-जवाब

### 1. रामपुर की खुरचन मुख्य रूप से कौन बनाते हैं?
रामपुरबघेलन के ग्राम नेमुआ वार्ड नंबर 5 के निवासी कमलेश पांडे पिछले 40 से अधिक वर्षों से अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के तौर पर इस मिठाई का निर्माण कर रहे हैं।

### 2. नेशनल हाईवे पर खुरचन की कितनी दुकानें संचालित हैं?
नेशनल हाईवे के लगभग तीन किलोमीटर लंबे दायरे में करीब 150 खुरचन की दुकानें सजी हुई हैं।

### 3. खुरचन बनाने की पारंपरिक विधि क्या है?
धीमी आंच पर रखी 6 कड़ाहियों में एक-एक पाव दूध डालकर उबाला जाता है, जिससे किनारों पर मलाई जमती है और उसे खुरचनी से निकालकर शक्कर की परत के साथ जमाया जाता है।

### 4. बाजार में खुरचन किन दो प्रकारों और भावों में मिलती है?
रोल वाली खुरचन 600 रुपये प्रति किलोग्राम और चौकोर टुकड़ों में कटी परतदार खुरचन 400 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर उपलब्ध होती है।

### 5. इस कारोबार से एक आम दुकानदार की कितनी कमाई हो जाती है?
रोजाना औसतन 5 किलो खुरचन बेचकर एक छोटी या मझोली दुकान महीने में लगभग 60 हजार रुपये तक कमा लेती है।

### 6. क्या रामपुर की खुरचन विदेश भी भेजी जाती है?
हां, कमलेश पांडे के अनुसार उनकी बनाई खुरचन संयुक्त राज्य अमेरिका तक जाती है और पूरे क्षेत्र की खुरचन कई देशों में सप्लाई की जाती है।

## प्रेरणा और सबक
कमलेश पांडे की जीवन यात्रा साबित करती है कि पुश्तैनी कौशल और सादगीपूर्ण उद्यम के प्रति निष्ठा किसी भी व्यवसाय को वैश्विक पहचान दिला सकती है।

- **पुश्तैनी हुनर का सम्मान:** आधुनिकता की दौड़ में अपनी पारिवारिक कला को छोड़ने के बजाय उसे गर्व से अपनाना टिकाऊ आजीविका दे सकता है। कमलेश ने अपने माता-पिता से सीखी पारंपरिक तकनीक को चार दशकों तक पूरी ईमानदारी से बनाए रखा।
- **साधन से ज्यादा काम की गुणवत्ता:** बड़ा शो-रूम न होने के बावजूद एक सामान्य टीन शेड से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई जा सकती है। गुणवत्ता और शुद्धता बरकरार हो तो ग्राहक खुद चलकर दूर-दूर से आते हैं।
- **स्थानीय संसाधनों पर भरोसा:** अपने गांव में रहकर स्थानीय दूध और पारंपरिक कड़ाही के दम पर लाखों का कारोबार खड़ा किया जा सकता है। महानगरों की ओर पलायन किए बिना भी अपनी जमीन पर आर्थिक सफलता हासिल की जा सकती है।

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