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  "type": "article",
  "title": "दीवाली के मौके पर कोटा के कड़के सेव की मांग तेज, 125 साल पुरानी इस रेसिपी का स्वाद है बेहद खास",
  "summary": "राजस्थान के कोटा में दीवाली के त्योहार पर मिठाइयों के साथ रामपुरा के मशहूर कड़के सेव की जबरदस्त मांग बनी हुई है। अलसी के तेल में बनने वाले इन कुरकुरे और तीखे सेव की कीमत कभी 9 रुपये किलो हुआ करती थी, जो अब बढ़कर 280 रुपये किलो पहुंच गई है।",
  "content": "दीवाली का जश्न हो और पकवानों या मिठाइयों की बात न हो, ऐसा सोचना भी मुश्किल है। लेकिन राजस्थान के एजुकेशन सिटी के तौर पर मशहूर कोटा में स्वाद का दायरा सिर्फ चीनी की मिठास तक सीमित नहीं है। यहाँ के खानपान की दुनिया में एक ऐसा तीखा और कुरकुरा विकल्प भी मौजूद है, जिसके आगे कई भारी-भरकम पकवान भी फीके पड़ जाते हैं। हम बात कर रहे हैं कोटा के बेहद लोकप्रिय कड़के सेव की। अलसी के तेल में तैयार किए जाने वाले ये मसालेदार और करारे सेव इतने लजीज होते हैं कि जो भी इन्हें एक बार चख लेता है, वह रामपुरा की गलियों का रुख किए बिना नहीं रह पाता। लगभग 125 साल पुरानी स्वाद की इस अनूठी विरासत को मोहन जी की चौथी पीढ़ी आज भी पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही है। दीवाली के इन दिनों में जब बाजार तरह-तरह की मिठाइयों और नमकीन से अटे पड़े हैं, तब भी कोटा के इन खास सेव की चमक फीकी नहीं पड़ी है और लोग इन्हें बड़े चाव से खरीद रहे हैं।\n\n \n\nशहर की पहचान में कड़के सेव का खास स्थान\n कोटा का जिक्र आते ही सबसे पहले यहाँ की जायकेदार कचौरी का नाम जुबाँ पर आ जाता है। इसके अलावा कोटा डोरिया साड़ी, कोटा स्टोन और यहाँ का कोचिंग उद्योग भी इस शहर को वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान दिलाते हैं। मगर जब बात स्थानीय स्वाद की होती है, तो रामपुरा के कड़के सेव का मुकाम सबसे ऊपर माना जाता है। इनका दायरा केवल कोटा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान के अन्य शहरों से लेकर देश के विभिन्न कोनों और विदेशों तक इनके दीवाने मौजूद हैं। यही मुख्य कारण है कि जो भी सैलानी या प्रवासी कोटा आते हैं, वे वापसी में इन कड़के सेव को अपने साथ ले जाना कभी नहीं भूलते।\n\n \n\nनौ रुपये से शुरू होकर 280 रुपये तक पहुँचा सफर\n कड़के सेव का इतिहास भी इनके स्वाद जितना ही रोचक और पुराना है। शुरुआती दौर की बात करें तो करीब 125 साल पहले इनकी कीमत मात्र 9 रुपये प्रति किलोग्राम हुआ करती थी। समय का पहिया घूमा, देश में महँगाई का असर बढ़ा और इसके साथ ही इन सेव के दाम भी धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते चले गए। वर्तमान समय में यही कड़के सेव बाजार में लगभग 280 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रहे हैं। इतने लंबे और उतार-चढ़ाव भरे सफर में अगर कोई एक चीज़ है जो बिल्कुल नहीं बदली, तो वह है इनका पारंपरिक स्वाद और इन्हें तैयार करने की पुरानी शैली। मोहन जी की चौथी पीढ़ी आज भी उसी ऐतिहासिक तरीके और जज्बे के साथ इस कारोबार को संभाल रही है।\n\n \n\nपारंपरिक मसालों और अलसी के तेल का कमाल\n आम तौर पर बाजार में मिलने वाली अधिकांश नमकीन और सेव को सोयाबीन या मूँफली के तेल में तला जाता है, लेकिन कोटा के कड़के सेव की सबसे बड़ी खूबी इसमें इस्तेमाल होने वाला अलसी का तेल है। यही तेल इस जायके को बाकी तमाम नमकीन से अलग और खास बनाता है। इन सेव को तैयार करने की प्रक्रिया में बेसन के साथ-साथ साबुत धनिया, हींग, काली मिर्च, मोटी कुटी हुई लाल मिर्च, सौंफ, जीरा, अजवाइन और स्वाद के मुताबिक नमक मिलाया जाता है। इन सभी मसालों का सही और सटीक संतुलन ही इन सेव को तीखा, चटपटा और बेजोड़ स्वाद प्रदान करता है।\n\n \n\nतैयार करने की अनूठी और खास प्रक्रिया\n कड़के सेव को बनाने का तरीका भी अपने आप में काफी दिलचस्प है। सबसे पहले बेसन में वे तमाम पारंपरिक मसाले मिलाए जाते हैं जिनका जिक्र किया गया है। इसके बाद पानी की सहायता से इसे एक निश्चित फेंटन के साथ गूँथा जाता है। प्रक्रिया के दूसरे चरण में एक बड़े कड़ाव में अलसी का तेल अच्छी तरह गर्म किया जाता है। फिर तैयार मसालेदार बेसन को बड़े-बड़े झारों के जरिए सीधे खौलते हुए तेल में उतारा जाता है। तेल के संपर्क में आते ही बेसन की बारीक धारियाँ सेव का रूप लेने लगती हैं। लगभग पाँच मिनट तक भूनने या तलने के बाद कोटा के ये तीखे और कुरकुरे कड़के सेव बनकर पूरी तरह तैयार हो जाते हैं।\n\n \n\nरोज़ाना की ताज़गी और मेहमाननवाज़ी की शान\n रामपुरा के इन कड़के सेव की एक और बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पहले से बनाकर डब्बों में स्टोर करके नहीं रखा जाता, बल्कि रोज ताज़ा तैयार किया जाता है। दुकानदार ग्राहकों की दैनिक माँग और खपत के अनुसार ही इनका निर्माण करते हैं, ताकि खरीदार को हमेशा फ्रेश उत्पाद मिले। यही वजह है कि यहाँ आने वाले लोगों को बासी स्टॉक के बजाय बिल्कुल ताज़ा सेव खाने को मिलते हैं। इन सेव की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई घरों में इन्हें रोजाना नाश्ते या खाने के साथ परोसा जाता है। किसी रिश्तेदार के घर जाना हो या घर पर मेहमान आ जाए, कड़के सेव से आवभगत करने का चलन आम है। कई लोग तो कोटा से बाहर रहने वाले अपने प्रियजनों के लिए इन्हें विशेष तौर पर पैक करवाकर भेजते हैं, और रामपुरा की दुकानों के सामने से गुजरने वाला शौकीन शायद ही कभी बिना खरीदे आगे बढ़ता हो।\n\nइसका आप पर असर\nकोटा के इस पारंपरिक खानपान का सीधा असर स्थानीय बाजारों और त्योहारी खरीदारी पर देखने को मिलता है।\n\n• भारत में: कोटा के कड़के सेव का यह पारंपरिक स्वाद देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों के बीच भी उपहार के रूप में लोकप्रिय है। दूर-दराज के रिश्तेदार इस खास जायके को मँगाना पसंद करते हैं।\n• कोटा में: रामपुरा क्षेत्र के स्थानीय दुकानदारों और कारीगरों के लिए दीवाली का यह सीजन कारोबार में भारी उछाल लेकर आता है। खरीदारों की भीड़ के चलते रोज़ाना बनने वाले ताजे सेव की खपत कई गुना बढ़ जाती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nइस ऐतिहासिक व्यंजन की निरंतर लोकप्रियता और कीमत में बदलाव के पीछे समय के साथ बढ़ती महँगाई और पारंपरिक रेसिपी की अनूठी विशेषताएँ मुख्य कारण हैं।\n\n• समय के साथ बढ़ती महँगाई: आज से लगभग 125 साल पहले जब यह व्यवसाय शुरू हुआ था, तब उत्पादन लागत और बाज़ार मूल्य काफी कम थे। दशकों बीतने के साथ मजदूरी, मसालों और कच्चे माल के दाम बढ़ने से कीमत 9 रुपये से बढ़कर 280 रुपये किलो तक पहुँची है।\n• पारंपरिक विधि का रखरखाव: मोहन जी की चौथी पीढ़ी ने आधुनिक दौर में भी अलसी के तेल और खास मसालों के मेल को नहीं बदला। मूल रेसिपी से छेड़छाड़ न करने के कारण ही इस जायके की माँग लगातार बनी हुई है।\n• दैनिक ताज़गी की नीति: दुकानदारों द्वारा पुराने स्टॉक को बेचने के बजाय रोज़ाना ताज़ा सेव तैयार करने की परंपरा ने ग्राहकों का भरोसा लंबे समय तक कायम रखा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कोटा के कड़के सेव का इतिहास कितना पुराना है?\nकोटा के कड़के सेव का इतिहास लगभग 125 साल पुराना है जिसे मोहन जी की चौथी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है।\n\n2. शुरुआत में कड़के सेव की कीमत क्या थी?\nकरीब 125 साल पहले कड़के सेव की कीमत मात्र 9 रुपये प्रति किलोग्राम हुआ करती थी।\n\n3. वर्तमान में कड़के सेव किस भाव बिक रहे हैं?\nआज के समय में कोटा के कड़के सेव बाजार में लगभग 280 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहे हैं।\n\n4. कड़के सेव को बनाने में किस तेल का उपयोग किया जाता है?\nइन सेव को तैयार करने के लिए आम तेलों के बजाय खास तौर पर अलसी के तेल का इस्तेमाल किया जाता है।\n\n5. कोटा में कड़के सेव मुख्य रूप से कहाँ मिलते हैं?\nकोटा के रामपुरा इलाके में कड़के सेव की पुरानी और प्रसिद्ध दुकानें स्थित हैं जहाँ ये रोज़ाना ताज़ा बनते हैं।",
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  "publishedAt": "2026-11-08",
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    "रामपुरा कोटा",
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